वाच्य की परिभाषा, प्रयोग और भेद

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vachy ki paribhasha, prayog aur bhed

वाच्य (vachy) उस रूप रचना को कहते हैं जिससे यह पता चलता है कि क्रिया को मूल रूप से चलाने वाला कर्ता है, कर्म है या भाव है। वाच्य को अंग्रेजी में voice कहा जाता है। हिंदी व्याकरण का यह महत्वपूर्ण विषय है जो प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाता है।

वाच्य की परिभाषा

“वाच्य क्रिया का वह रूप है जिससे जाना जाय कि क्रिया का मुख्य विषय कर्ता है या कर्म या भाव।”[1] अर्थात इन तीनों में किसकी प्रधानता है? इनमें किसके अनुसार क्रिया के पुरुष, वचन आदि शब्द आए हैं। “कर्ता, कर्म अथवा भाव के अनुसार क्रिया के लिंग, वचन तथा पुरुष का होना वाच्य कहलाता है।”[2] इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वाक्य में क्रिया के लिंग पुरुष, वचन आदि कर्ता, कर्म या भाव के अनुसार आते हैं, जैसे-

(क) मैं पुस्तक पढ़ता हूँ।

(ख) लड़के खेलते हैं।

प्रथम वाक्य में कर्ता ‘मैं’ के अनुसार क्रिया ‘पढ़ता हूँ’, पुंलिंग, एकवचन और प्रथम पुरुष है। वहीं दूसरे वाक्य में कर्ता ‘लड़के’ के अनुसार क्रिया ‘खेलते हैं’, पुंलिंग, बहुवचन और अन्य पुरुष है।

वाच्य के प्रयोग

वाक्य में वाच्य का प्रयोग 3 प्रकार से होता है-

1. कर्तरि प्रयोग, 2. कर्मणि प्रयोग, 3. भावे प्रयोग

1. कर्तरि प्रयोग

वाक्य में जब क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार हों तब कर्तरि प्रयोग होता है, जैसे- मुकेश अच्छी किताबें पढ़ता है।

2. कर्मणि प्रयोग

वाक्य में जब क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार हों तब कर्मणि प्रयोग होता है, जैसे- रीता ने निबंध लिखा।

3. भावे प्रयोग

वाक्य में जब क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता या कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार न होकर एकवचन, पुंलिंग तथा अन्य पुरुष हों तब भावे प्रयोग होता है, जैसे-मुझसे चला नहीं जाता।

वाच्य के भेद

वाच्य के 3 भेद हैं-

1. कर्तृवाच्य, 2. कर्मवाच्य, 3. भाववाच्य

1. कर्तृवाच्य (Active Voice)

“क्रिया के उस रूपांतरण को कर्तृवाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में कर्ता की प्रधानता का बोध हो।”[3] कर्तृवाच्य में कर्ता प्रमुख होता है, कर्म गौण। इस वाक्य में अकर्मक और सकर्मक दोनों तरह की क्रियाएँ हो सकती हैं। जैसे-

(क) गीता पुस्तक पढ़ती है।

(ख) मैंने पुस्तक पढ़ी

(ग) पिता जी आ रहे हैं।

(घ) मजदूर काम कर रहे हैं।

2. कर्मवाच्य (Passive Voice)

“क्रिया के उस रूपांतरण को कर्मवाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में कर्म की प्रधानता का बोध हो।”[4] इसके कारण वाक्य में कर्ता का लोप हो जाता है अथवा कर्ता के बाद ‘से’ या ‘द्वारा’ का प्रयोग होता है। कर्मवाच्य में सकर्मक क्रिया होती हैं। जैसे-

(क) आपका काम कर दिया गया है।

(ख) कमलेश्वर के द्वारा यह उपन्यास लिखा गया है।

(ग) संदीप से पत्र पढ़ा जाता है।

(घ) आम खाया जाता है।

कर्मवाच्य के अंतर्गत असमर्थता सूचक वाक्य भी आते हैं, किंतु इसमें ‘द्वारा’ की जगह ‘से’ परसर्ग का प्रयोग होता है। ये वाक्य केवल निषेधात्मक रूप में प्रयुक्त होते हैं, जैसे-

(क) मुझसे यह दरवाजा नहीं खोला जाता।

(ख) उससे पढ़ा नहीं जाता।

हिंदी में कर्तृवाच्य का प्रयोग अधिक होता है, कर्मवाच्य का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है-

  • जब कर्ता अज्ञात हो या उसे प्रकट करने की आवश्यकता न हो: जैसे-

(क) चोर पकड़ा गया।

(ख) मेरा सामान चोरी चला गया।

  • अधिकारियों के आदेशों मे: जैसे-

(क) कल तक इसकी रिपोर्ट की जाय।

(ख) कल निर्णय सुनाया जाएगा।

3. भाववाच्य (Impersonal Voice)

“क्रिया के उस रूपांतरण को भाववाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में क्रिया अथवा भाव की प्रधानता का बोध हो।”[5] अर्थात जिन वाक्यों में न तो कर्ता और कर्म की प्रधानता नहीं होती, केवल क्रिया या भाव प्रधान होता है, वह भाववाच्य कहलाता है। भाववाच्य में प्राय: अकर्मक क्रिया होती है। जैसे-

(क) गर्मी में उससे खेला नहीं जाता।

(ख) मुझसे बैठा नहीं जाता।

(ग) यहाँ पढ़ा नहीं जाता।

(घ) थोड़ी देर सो लिया जाए।


संदर्भ

[1] व्यावहारिक हिंदी व्याकरण तथा रचना- हरदेव बाहरी, पृष्ठ- 113

[2] सामान्य हिंदी- पृथ्वी नाथ पांडेय, पृष्ठ- 31

[3] आधुनिक हिंदी व्याकरण और रचना- वासुदेवनंदन प्रसाद, पृष्ठ- 136

[4] वही

[5] वही

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