संयुक्त राष्ट्र में हिंदी | sanyukt rashtra men hindi

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United Nations men Hindi

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की छह आधिकारिक भाषाएँ– अंग्रेज़ी, अरबी, चीनी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश हैं। भारत काफी समय से यह प्रयास कर रहा है कि हिंदी भाषा को भी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल किया जाए। भारत का यह तर्क इस आधार पर है कि हिंदी विश्व में बोली जाने वाली तीसरी बड़ी भाषा है और विश्व के कई देशों में बोली-समझी जाती है।

संयुक्त राष्ट्र क्या है?

द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के बाद 25 अप्रैल 1945 को अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को में अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ़्रांस, चीन और स्पेन के प्रतिनिधियों की एक बैठक हुई, जिसमें संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रारूप पर सहमति बनी। 26 जून 1945 ई. को 51 देशों ने उसे स्वीकार किया और 24 अक्तूबर 1945 ई. को चार्टर (संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र) पर हस्ताक्षर कर किया था। 26 अक्तूबर 1945 ई. को राष्ट्रसंघ का प्राधिकार (चार्टर) लागू कर दिया गया। उपरोक्त पाँचों देश संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य बने और उन्हें विशेषाधिकार (वीटो) प्राप्त हुआ।

संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के समय इसके सदस्य देशों की संख्या 51 थी जिसमें भारत भी एक था। UN में सदस्य देशों की संख्या अब बढ़कर 196 हो गई है। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क, अमेरिका में अवस्थित है। पहले इसका नाम संयुक्त राष्ट्र संघ था, जो बदल कर संयुक्त राष्ट्र हो गया है। संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख उद्देश्य विश्व में शांति स्थापित करना है। संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की आधिकारिक भाषाएँ छह (6) हैं, जिनमें इसका कार्य होता है।

संयुक्त राष्ट्र के कुछ प्रमुख अंग

सचिवालय (Secretariat), आम सभा (General Assembly), सुरक्षा परिषद् (Security Council), अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of justice-ICJ), आर्थिक व सामाजिक परिषद् (Economic and Social Council), न्यास परिषद (Trusteeship Council) आदि हैं, जिनके माध्यम से यह कार्य करता है। संयुक्त राष्ट्र के अपने कई कार्यक्रमों और एजेंसियों के अलावा 14 स्वतंत्र संस्थाएं हैं, इन स्वतंत्र संस्थाओं में ‘विश्व बैंक’ (World Bank), ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (International Monetary Fund- IMF) और ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (World Health Organization) आदि प्रमुख हैं।

संयुक्त राष्ट्र और भारत

भारत, संयुक्त राष्ट्र के उन प्रारंभिक सदस्यों में शामिल है जिन्होंने 01 जनवरी, 1942 को वाशिंगटन में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे तथा 25 अप्रैल से 26 जून, 1945 तक सैन फ्रांसिस्को में ऐतिहासिक संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन सम्मेलन में भी भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत, संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पुरजोर समर्थन करता है और चार्टर के उद्देश्यों को लागू करने तथा संयुक्त राष्ट्र के विशिष्ट कार्यक्रमों और एजेंसियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की अधिकारिक भाषाओं का इतिहास

“संयुक्त राष्ट्र की कार्यविधि नियमावली के आठवें भाग में नियम 51 से 57 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं के संबंध में प्रावधान दिया गया है। इन नियमों में संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा इसकी विभिन्न समितियों एवं उपसमितियों के लिए आधिकारिक तथा कार्य संचालन की भाषाओं की व्यवस्था की गई है।”[1] संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रथम अधिवेशन में ही (अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय को छोड़कर) इसके सभी संगठनों के लिए अंग्रेज़ी, फ्रेंच, रूसी, चीनी और स्पेनिश को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिया गया था, परन्तु ‘अंग्रेज़ी’ और ‘फ्रेंच’ को ही कार्यसंचालन भाषा के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई गई थी।

UN में वर्ष 1948 में स्पेनिश को कार्यसंचालन की भाषा के रूप में आधिकारिक मान्यता प्रदान किया गया था। वहीं चीनी और रूसी भाषाओं को यह मान्यता मिलने में काफी प्रयास एवं इंतज़ार करना पड़ा था। “स्पेनिश को संयुक्त राष्ट्र के कार्यसंचालन की भाषा के रूप में मान्यता दिए जाने के 20 वर्षों बाद 21 दिसम्बर 1968 को संयुक्त राष्ट्र के 23वें अधिवेशन में संकल्प पारित कर रूसी भाषा को कार्यसंचालन की भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई।”[2] वहीं 18 दिसम्बर 1973 में चीनी भाषा को संयुक्त राष्ट्र के 28वें अधिवेशन में संकल्प पारित कर कार्यसंचालन की भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किया गया था।

इसी अधिवेशन में, उसी संकल्प के अंतर्गत ही अरबी को भी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक और कार्यसंचालन की छठवीं भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किया गया था। अरबी को अन्य भाषाओं की तरह लंबा इंतजार और संघर्ष नहीं करना पड़ा। क्योंकि अरबी भाषी सभी राष्ट्र आर्थिक रूप से काफी संपन्न हैं और विश्व की राजनीति और अर्थव्यवस्था में काफी प्रभाव है। जिसकी वजह से इन देशों ने संयुक्त राष्ट्र में कार्यान्वित किए जाने पर होने वाले शुरूआती तीन वर्षों के खर्चों को वहन भी कर लिया।

जर्मन, जापानी आदि भाषाएँ जो कभी वैश्विक भाषाएँ थीं या उनमें विश्व भाषा बनने की संभावना थी, परंतु उन्हें मान्यता नहीं मिली। क्योंकि ये भाषाएँ पराजित राष्ट्रों की भाषाएँ थीं। जहाँ तक हिंदी का प्रश्न है, भारत उस समय गुलाम था। वह पराजित राष्ट्रों से भी गई गुजरी हालात में था। ऐसे में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में जगह मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अर्थात जिन राष्ट्रों के पास ताकत और पैसा था, उनकी भाषा इस विश्व संस्था की भाषा बन गई।

संयुक्त राष्ट्र में किसी भाषा को शामिल करने की प्रक्रिया

किसी भाषा को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किए जाने की प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा में साधारण बहुमत द्वारा एक संकल्प को स्वीकार करना और संयुक्त राष्ट्र की कुल सदस्यता के दो-तिहाई बहुमत द्वारा उसे अंतिम रूप से पारित करना होता है। जनरल असेंबली के दो-तिहाई सदस्यों के अनुमोदन मिलने के बाद ही किसी भी भाषा को संयुक्त राष्ट्र की भाषा का दर्जा मिल सकता है।

हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की कार्यविधि नियमावली 51 में संशोधन करना होगा। इस संशोधन के लिए संयुक्त राष्ट्र के दो-तिहाई देशों की सहमति की आवश्यकता होगी। यदि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया जाता है तो भारत को संयुक्त राष्ट्र के सचिवालय में अनुमान के अनुसार, हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किए जाने पर भारत को प्रत्येक वर्ष लगभग 14 मिलियन डॉलर (लगभग 66 करोड़ रुपए) का खर्च वहन करना होगा। सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो, नेपाल, मॉरीशस, फिजी जैसे देशों में जहाँ हिंदी बोली और समझी जाती है, वे राजनीतिक और आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं की निरन्तर होने वाले खर्चों के वहन में भारत की कुछ ज्यादा मदद कर सकें।

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या 196 है। भारत के लिए 196 देशों में से 131 की सहमति हासिल करना कोई कठिन बात नहीं है। भारत इसे आसानी से हासिल कर सकता है, बस उसे योग दिवस की तरह एक प्रस्ताव लाना होगा। ताकि संयुक्त राष्ट्र के विधान की धारा 51 में संशोधन हो सके।

दो-तिहाई देशों के समर्थन के बाद भारत को वित्तीय रूप से भी सहायता प्रदान करना होगा। लेकिन सारा मामला यहीं आकर फंस जाता है। भारत हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए पूरा खर्च वहन करने को तैयार है, मगर यू.एन. के नियम इसमें दिक्कतें पैदा कर रहे हैं। भारत ही नहीं जर्मनी और जापान भी अपनी-अपनी भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्ज दिलाने का पूरा खर्च उठाने के लिए तैयार बैठे हैं। उन्हें भी यू.एन. के यही नियम रोक रहे हैं।

अब तक के हुए प्रयास

हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की मुहिम की शुरूआत भारत के नागपुर शहर में 10 जनवरी 1975 को आयोजित ‘प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन’ से हुई थी। इस सम्मेलन की अध्यक्षता प्रधानमंत्री ‘इंदिरा गांधी’ ने किया था। इस सम्मेलन में उन्होंने हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था- हिंदी विश्व की महान भाषाओं में से एक है, करोड़ों लोगों की मातृ भाषा है और करोड़ों लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं।

इसी सम्मेलन में ही मॉरीशस के प्रतिनिधि मंडल के नेता “श्री दयानंद वसंत राय ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए प्रस्ताव रखा था जिसका समर्थन सोवियत संघ (रूस) के प्रतिनिधि मंडल के नेता डॉ. ई.पी. चेलिषोव सहित विश्व भर के देशों से आए प्रतिनिधियों ने किया था। इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. शिवसागर रामगुलाम ने कहा था कि मॉरीशस संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाने के लिए सदैव तत्पर रहेगा।”[3]

उसके बाद जितने भी विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुए सब में प्रथम सम्मेलन में पारित मंतव्य को दुहराया जाता रहा कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित किया जाए।

जब संयुक्त राष्ट्र में पहली बार गूंजी थी हिंदी

वर्ष 1977 में जब संयुक्त राष्ट्र महासभा का 32वां सत्र चल रहा था, तब इतिहास रचा गया। मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे। संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनका पहला संबोधन था जिसे उन्होंने हिंदी में कहने का फैसला लिया। पहली बार संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की गूंज सुनाई पड़ी थी जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ। वहीं कुछ आलोचकों ने ‘हिंदी का दुराग्रही’ कह कर आलोचना भी किया। इस प्रकार वर्ष 1978 में संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देने वाले पहले भारतीय नेता वाजपेयी जी थे जिन्होंने विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया था।

वाजपेयी का अनुसरण करते हुए बाद के विदेश मंत्री श्री श्याम नंदन मिश्र तथा श्री पी.वी. नरसिंह राव ने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में अपना भाषण दिया। वाजपेयी ने लिखा है “विदेश मंत्री श्री नरसिंह राव ने संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली में हिंदी में अपने विचार व्यक्त करके भारत देश की अदम्य आकांक्षा को वाणी प्रदान की… जहाँ  तक हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में एक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का प्रश्न है, यह कार्य उतना कठिन नहीं है, जितना की ऊपर से दिखाई देता है।”[4] वर्ष 2010 में श्री राज नाथ सिंह ने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में अपना भाषण दिया और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से अपील किया कि हिंदी को महासभा की आधिकारिक भाषा के तौर पर शामिल किया जाए।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा किया गया सकरात्मक पहल

हर साल 10 दिसंबर को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी दिवस पर देश-दुनिया में कई कार्यक्रम आयोजित होते हैं लेकिन वर्ष 2019 का हिंदी दिवस बेहद ही खास रहा। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने हिंदी प्रेमियों को हिंदी दिवस का तोहफा देते हुए हिंदी में न्यूज वेबसाइट लांच किया। इस वेबसाइट की लांचिंग के साथ ही हिंदी एशिया की पहली ऐसी भाषा के रूप में स्थापित हो गई है जिसे संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा न होने के बावजूद यह सम्मान मिला है। 

संयुक्त राष्ट्र पहले से ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म- ट्विट्टर आदि पर हिंदी का प्रयोग कर रहा है। लेकिन उसने वर्ष 2009 से हिंदी न्यूज बुलेटिन की शुरुआत कर दी है। वहीं भारत सरकार भी हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषा बनाने की कोशिश लगातार कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के इस कदम से संभावना व्यक्त की जा रही है कि हिंदी को जल्द ही संयुक्त राष्ट्र की सातवीं अधिकृत भाषा के रूप में मान्यता मिल जाएगी।

इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र हिंदी में रेडियो बुलेटिन का प्रसारण भी पहले से कर रहा है। यू.एन. ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत अपने मंच से हिंदी में साप्ताहिक समाचार बुलेटिन का प्रसारण 22 जुलाई से प्रारम्भ कर दिया है। जो हर सप्ताह यू.एन. के रेडियो पर प्रसारित होगा और जिसकी अवधि 10 मिनट की होगी। यह बुलेटिन भारतीय सरकार की मदद से प्रसारित किया जा रहा है जिसका पूरा खर्च भारत सरकार उठा रही है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशनों में विदेश मंत्री या महासभा में शामिल भारतीय प्रतिनिधि मंडल का कोई सदस्य हिंदी भाषा में बोलना चाहे तो उसे अनुवाद की सुविधा मिल सकती है। जिसकी व्यवस्था UN करेगा, लेकिन इस व्यवस्था का लाभ कम ही उठाया गया है। क्योंकि भारतीय प्रतिनिधि अमूमन हिंदी के प्रयोग से बचते हैं।

UN का ही एक सहायक संगठन यूनेस्को है जिसकी स्थापना वर्ष 1947 में हुआ था। इसमें हिंदी को सीमित प्रवेश मिला हुआ है। अपनी स्थापना के बाद दूसरे सत्र में ही हिंदी को शासकीय भाषा के रूप में स्वीकार करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया था। तब से हिंदी अन्य सात भाषाओँ के रूप में प्रयोग की जा रही है।

हिंदी UN की भाषा क्यों होनी चाहिए?

संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को शामिल करने के ठोस कारण हैं। सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण विश्व स्तर पर हिंदी को बोलने वालों की संख्या है। विश्व स्तर पर सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा ‘चीनी’ है। वहीं हिंदी को कुछ विद्वान् दूसरे तो कुछ तीसरे स्थान पर मानते हैं।

हिंदी भाषा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि उसको व्यवहृत करने वाले लोग कई देशों में फैले हुए हैं। सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो, नेपाल, गयाना, मॉरीशस, फिजी, भूटान, इंडोनेशिया, बाली, सुमात्रा जैसे देशों में हिंदी महत्वपूर्ण भाषा है ही, विश्व के अन्य देशों में भी बोलने-समझने वालों की अच्छी-खासी संख्या विद्यमान है। यदि उर्दू भाषा को भी शामिल कर लिया जाए (जो है ही) तो इसमें पड़ोसी देश पाकिस्तान भी जुड़ जाता है। इतने व्यापक स्तर पर प्रयोग होने वाली भाषा, यू.एन. की आधिकारिक भाषा क्यों नहीं होनी चाहिए?

हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता भी इसकी सबसे बड़ी मजबूती है। जैसी बोली जाती है, उसी रूप में ही लिखी भी जाती है। कई वैश्विक भाषाओँ की अपेक्षा प्रयोग करने तथा सीखने-सीखाने में सरल और सहज है। हिंदी का शब्द भंडार भी दिन-प्रतिदिन समृद्ध हो रहा है। हर वर्ष कुछ न कुछ हिंदी शब्दों को अंग्रेजी अपने शब्द कोष में शामिल करती रहती है। माने अंग्रेजी का आकर्षण भी हिंदी के प्रति बना हुआ है।

औद्योगीकरण और भूमंडलीकरण के परिणाम स्वरूप समूचे विश्व के लिए भारत एक बाजार के रूप में उभरा है। जिसकी वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने उत्पाद को बेचने और व्यापारिक संबंध मजबूत करने के लिए अपने कर्मचारियों को हिंदी सिखा-पढ़ा रही हैं। ताकि भारतीय उपभोक्ताओं और उनकी भाषा तथा संस्कृति को समझा जा सके। यही वजह है की विश्व के अधिकांश देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है। भारत में भी कई संस्थाएं विदेशी विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों को हिंदी भाषा सिखा-पढ़ा रहीं हैं, जहाँ पर हर वर्ष लोग हिंदी सीखने आते हैं। एस रूप में हिंदी का प्रचार-प्रसार लगा तार हो रहा है।

निष्कर्ष

दिल्ली में आयोजित तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन समारोह में महादेवी वर्मा ने कहा था कि, “अंतर्राष्ट्रीय वही हो सकता है, जिसकी राष्ट्र में जड़ें हों। जिसके राष्ट्र में जड़ ही नहीं है, वह क्या अंतर्राष्ट्रीय होगा?”[5] उनकी यह सलाह महत्वपूर्ण है। जब तक हम भारतीय हिंदी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत नहीं करते तब तक उसे वह स्थान नहीं मिलेगा जो अन्य वैश्विक भाषाओं को मिला हुआ है। हमें हिंदी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाना होगा। “जब तक श्रेष्ठम् विचार, श्रेष्ठम् कर्म, श्रेष्ठम् दर्शन, श्रेष्ठम् वैज्ञानिक खोज, श्रेष्ठम् तकनीक हिंदी में प्रगट नहीं होगी, हिंदी विश्व भाषा कैसे बनेगी?”[6] केवल साहित्यिक विकास से कोई भी भाषा विश्व भाषा नहीं बन सकती, उसका चहुमुखी विकास होना चाहिए। जब तक हिंदी रोजगार की भाषा नहीं बनती तब तक वह विश्व भाषा क्या, राष्ट्र भाषा भी नहीं बन सकेगी।

खैर हमें सकरात्मक होकर इस दिशा में पहल करते रहना होगा ताकि हिंदी संयुक्त राष्ट्र की अधिकारिक भाषा बन सके। जापान, जर्मनी और इजराइल आदि कई देश भी अपनी-अपनी भाषा को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलवाने के लिए कई वर्षों से प्रयासरत हैं। साथ में भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने का भी प्रयास करते रहना चाहिए। क्योंकि ये दोनों लक्ष्य कहीं न कहीं एक-दूसरे के पूरक हैं।


[1] संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी– डॉ. सुनील भूटानी, साहित्य सहचर पत्रिका

[2] वही

[3] वही

[4] स्मारिका (11वाँ विश्व हिंदी सम्मलेन)- डॉ. सुशीला गुप्ता, पृष्ठ-167

[5] वही, पृष्ठ- 169

[6] स्मारिका (11वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन)- वीरेंद्र सिंह यादव, पृष्ठ- 172

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