हिंदी भाषा प्रयोग के विविध रूप- राजभाषा, राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा

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राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र में स्वीकृत भाषा को कहते हैं जबकि प्रशासनिक कार्यों के व्यवहारों में प्रयुक्त होने वाली भाषा को राजभाषा। जहाँ राष्ट्रभाषा का निर्धारक देश की जनता होती है वहीं राजभाषा को देश की सरकारें तय करती हैं। संपर्क भाषा का विकास प्राकृतिक और स्वैच्छिक आधार पर होता है जो सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। संपर्क भाषा ही सर्व-स्वीकृत होकर राष्ट्रभाषा बनती है। कई देशों में राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा के रूप में एक ही भाषा का प्रयोग होता है, जैसे- जापान, अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, रूस आदि। भारत में भी हिंदी का प्रयोग तीनों रूपों में होता है। हिंदी ही राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा भी है। हिंदी बोलियों के मामले में भी समृद्ध है, इसकी कुल 18 बोलियाँ हैं।

1. बोली

किसी छोटे क्षेत्र में प्रयुक्त की जाने वाली वह भाषा जिसका प्रयोग प्राय: बोलचाल के लिए किया जाता है, बोली कहलाती है। किसी भी भाषा का प्रारंभिक रूप बोली ही होती है, जो आगे विकसित होकर भाषा बनती है। कोई भाषा जब सीमित क्षेत्र में प्रयोग की जाती है तो उसे बोली कहते हैं, वहीं जब कोई बोली विस्तृत क्षेत्र में प्रयोग की जाती है तो उसे भाषा कहते हैं। जैसे-

हिंदी भाषा की 18 बोलियाँ हैं- अवधी, भोजपुरी, खड़ी बोली, ब्रज भाषा, मैथिली, हरियाणवी, मेवाती, गढ़वाली आदि।

बोली भाषा की छोटी इकाई है जिसका संबंध ग्राम या मण्डल से रहता है। इसमें देशज शब्दों तथा घरेलू शब्दावली का बाहुल्य होता है। यह मुख्य रूप से बोलचाल की ही भाषा होती है। इसमें साहित्यिक रचनाओं की जगह लोक साहित्य मिलता है। व्याकरणिक दृष्टि का भी अभाव होता है।

भाषा ओर बोली में अंतर

भाषा और बोली में मोटे तौर पर अंतर कर पाना कठिन है, क्योंकि भाषा जब सीमित क्षेत्र में प्रयुक्त होती है तो उसे बोली कहते हैं और बोली जब विस्तृत क्षेत्र में व्यवहत होने लगती है तो उसे भाषा कहते हैं। मोटे तौर पर भाषा और बोली में निम्नलिखित अन्तर हैं-

1. भाषा का मानक रूप होता है लेकिन बोली का मानक रूप नहीं होता।

2. भाषा एक बहुत बड़े भू-भाग में बोली जाती है, उसका क्षेत्र विस्तृत होता है, जबकि बोली का क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित होता है।

3. भाषा बोलने वालों की संख्या अधिक होती है, वहीं बोली बोलने वालों की संख्या सीमित होती है।

4. एक भाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ हो सकती हैं, परन्तु एक बोली के अंतर्गत कई भाषाएँ नहीं हो सकती हैं। जैसे- हिंदी की अठारह बोलियाँ हैं वहीं अवधी की चार उप बोलियाँ हैं।

5. दो भाषाओं के बोधगम्यता का अभाव होता है, वहीं एक भाषा के अंतर्गत आने वाली सभी बोलियों के बीच बोधगम्यता होता है। हिंदी बोलने वाला बंगाली और बंगाली बोलने वाला हिंदी नहीं समझ पायेगा, किंतु अवधी बोलने वाला भोजपुरी और भोजपुरी बोलने वाला अवधी समझ लेगा, क्योंकि दोनों एक ही भाषा की बोलियाँ हैं।

6. भाषा का प्रयोग शासन-प्रशासन, शिक्षा और साहित्य में होता है जबकि बोली का प्रयोग दैनिक जीवन और लोक साहित्य में होता है।

7. भाषा का प्रयोग अपने क्षेत्र से बाहर के लोगों के साथ संपर्क के लिए किया जाता है जबकि बोली का प्रयोग क्षेत्रीय लोगों के साथ बोलचाल के लिए किया जाता है।

8. प्रायः यह माना जाता है कि भाषा का प्रयोग शिक्षितों द्वारा एवं नगर निवासियों द्वारा किया जाता है जबकि बोली का प्रयोग अशिक्षितों, ग्रामीणों आदि द्वारा किया जाता है।

9. भाषा से बोली का विकास होता है, बोली से भाषा का नहीं।

10. शिक्षा एवं ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में भाषा का प्रयोग किया जाता है, बोली का नहीं।

2. मानक भाषा

विश्व की अधिकांश भाषाओं में कई क्षेत्रीय भेद / रूपांतरण पाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में उसका मानकीकरण आवश्यक हो जाता है, ताकि उस भाषा में एकरूपता स्थापित किया जा सके। अत: ऐसी भाषा जिसका मानकीकरण हो गया हो और एक परिनिष्ठित रूप निश्चित हो गया हो, मानक भाषा या परिनिष्ठित भाषा कहलाती है। मानक भाषा शब्द को अंग्रेजी में Standard language कहते हैं।

‘मानक भाषा’ में उसके क्षेत्रीय रूप (बोलियाँ) शामिल नहीं होते हैं। यह भाषा का वह रूप होता है जिसे नगरों के पढ़े-लिखे लोग प्रयोग करते हैं। जैसे- हिंदी भाषा के अनेक क्षेत्रीय रूप, बोलियाँ और उपभाषाएं हैं, जो मानक हिंदी से भिन्न हैं। क्योंकि मानक हिंदी खड़ी बोली के परिष्कृत रूप को कहा जाता है, जिसका प्रयोग शिक्षा, शासन, मीडिया और साहित्य आदि में होता है।

3. राजभाषा

राजभाषा का अर्थ है, ‘राज-काज’, सरकारी काम-काज या कार्यालय की भाषा। जो भाषा देश की राजकीय कार्यों के रूप में प्रयुक्त की जाती है वह ‘राजभाषा’ कहलाती है। ‘राजभाषा’ शब्द के लिए अंग्रेजी में Official language का प्रयोग किया जाता है। जो पहले State language कहलाता था।

राजभाषा किसी देश के प्रशासक वर्ग की भाषा होती है। जिसका प्रयोग मुख्यत: चार क्षेत्रों में होता है- शासन, विधान, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका। “सामान्यत: किसी भी देश की राजभाषा में ही वहाँ की संसद की कार्यवाही चलती है, सचिवालय का काम-काज होता है और न्यायालयों तथा प्रशासनिक इकाइयों द्वारा कार्य किया जाता है।”[1]

आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा के अनुसार सरकार के शासन, विधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका क्षेत्रों में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, उसे राजभाषा कहते हैं। संक्षेप में ‘राजभाषा’ संविधान द्वारा स्वीकृत सरकारी कम-काज की भाषा होती है। भारतीय संविधान में ‘राजभाषा’ संबंधी प्रावधान दिए गये हैं। 14 सितंबर 1949 को स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान किया। भारतीय संविधान के भाग- 17 के अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा संबंधी प्रावधान दिए गये हैं। वर्तमान में भारतीय संविधान में 23 भाषाओं को राजभाषा को दर्जा दिया गया है। इसमें हिंदी शामिल है, परन्तु अंग्रेजी भाषा शामिल नहीं है। भारत में अंग्रेजी न तो कोई आधिकारिक भाषा है और न ही कोई अनुसूचित भाषा।

भारतीय संविधान के अनुसार जहाँ हिंदी संघ सरकार की राजभाषा है वहीं राज्य सरकारों की अपनी-अपनी राज्य भाषाएँ हैं। कुछ राज्यों में दो या दो से अधिक राज्य भाषाएँ हैं। वर्तमान में 7 राज्यों की राज भाषा हिंदी है- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, हिमांचल प्रदेश।

संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव गोपाल आयंगर ने रखा था। 14 सितंबर को हिंदी को ‘राजभाषा’ का संविधानिक दर्जा मिलने के कारण पूरे देश में ‘हिंदी दिवस’ का आयोजन किया जाता है। आंध्र प्रदेश भाषाई आधार पर गठन होने वाला प्रथम राज्य है।

भारत में 12वीं शती तक संस्कृत राजभाषा के रूप में प्रचलित थी। तुर्कों एवं अफगानों के आगमन के बाद फारसी राजभाषा बनी। मुग़ल शासन में राजभाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग विभिन्न शैलियों में होने लगा था। मराठा प्रसासन में भी हिंदी का प्रयोग हो रहा था। लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद राजभाषा अंग्रेजी हो गई। देश को आजादी मिलने के बाद राजभाषा का अलग प्रावधान किया गया, परन्तु अभी भी अंग्रेजी का प्रयोग हो रहा है।

4. राष्ट्रभाषा

किसी देश की ‘राष्ट्रभाषा’ उस देश की बहुसंख्यक लोगों की भाषा को माना जाता है। जब कोई भाषा राष्ट्र के विस्तृत भू-भाग में प्रयुक्त होने लगती है तो वह स्वत: ‘राष्ट्रभाषा’ के पद पर आसीन हो जाती है। भोला नाथ तिवारी के शब्दों में, “जब कोई आदर्श भाषा बनने के बाद भी उन्नत होकर और भी महत्वपूर्ण बन जाती है तथा पूरे राष्ट्र या देश में अन्य भाषा क्षेत्र तथा अन्य भाषा परिवार क्षेत्र में भी उसका प्रयोग सार्वजनिक कामों आदि में होने लगता है तो वह राष्ट्रभाषा का पद पा जाती है।”[2] ‘राष्ट्रभाषा’ को अंग्रेजी में National language नाम से जाना जाता है।

संक्षेप में- जिस भाषा का प्रयोग हम राष्ट्रीय स्तर पर करते हैं, उसे राष्ट्रभाषा कहते हैं। जो किसी प्रांतीय भाषा का ही विकसित रूप होता है। जिसे देश की अधिकांश जनता अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करती है। जहाँ ‘राजभाषा’ संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त भाषा होती है, वहीं ‘राष्ट्रभाषा’ का देश के संविधान से कोई संबंध नहीं होता है। राष्ट्र भाषा सम्पूर्ण देश में भावनात्मक तथा सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है।

जिन देशों में किसी एक भाषा का प्रयोग होता है, उसे आसानी से ‘राष्ट्रभाषा’ का दर्जा मिल जाता है। परंतु भारत जैसे देश में जहाँ पर कई भाषाओं का प्रयोग होता है, वहाँ पर ‘राष्ट्रभाषा’ का स्वरूप उतना स्पष्ट नहीं हो पाता है। फिर भी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाता है, क्योंकि यह देश के अधिकतर भागों में प्रयुक्त होती है।

राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर

राष्ट्रभाषा राष्ट्र / देश के लोगों की संपर्क भाषा होती है जबकि राजभाषा केवल सरकार के कामकाज की भाषा होती है। अधिकतर देशों में दोनों एक ही भाषा होती है। राष्ट्रभाषा का विकास स्वतः स्फूर्त और प्रवाहमान होता है, जबकि राजभाषा शासन तंत्र की नीतियों के संयोजन का साधन।

5. संपर्क भाषा

भिन्‍न-भिन्‍न भाषा-भाषियों के मध्य परस्पर विचार-विनिमय का माध्यम बनने वाली भाषा का संपर्क भाषा कहा जाता है। संपर्क भाषा शब्द अंग्रेजी शब्द ‘लिंग्वा फ्रेंका’ (Lingua Franca) के रूप में व्यवह्रत होता है जिसका अर्थ है ‘सामान्य बोली’ या ‘लोक बोली’। डॉ. पूरनचंद टंडन के अनुसार, “संपर्क–भाषा से तात्पर्य उस भाषा रूप से है, जो समाज के विभिन्न वर्गों या निवासियों के बीच संपर्क के काम आती है। इस दृष्टि से भिन्न–भिन्न बोली बोलने वाले अनेक वर्गों के बीच हिंदी एक संपर्क-भाषा है और अन्य कई भारतीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलने वालों के बीच भी संपर्क-भाषा है।”[3]

विजयपाल सिंह के अनुसार, ‘वह भाषा जो दो भिन्न भाषा-भाषी अथवा एक भाषा के दो मित्र उपभाषाओं के मध्य अथवा अनेक बोलियाँ बोलने वाले के मध्य संपर्क का माध्यम होती हैं, जिसके माध्यम से भावों एवं विचारों का आदान-प्रदान किया जाता है, संपर्क भाषा कहलाती है।

हिंदी अपने राष्ट्रीय स्वरूप में ही पूरे देश की संपर्क भाषा बनी हुई है। वह भिन्‍न भाषा-भाषियों के बीच परस्पर संप्रेषण का माध्यम बनी हुई है। वह सरकार की राजभाषा भी है तथा सारे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली संपर्क भाषा भी है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 52 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं। विश्व के अनेक देशों में वह संपर्क भाषा बनी हुई है। कई बहुभाषा-भाषी देशों में एक से अधिक भाषाएँ संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जाती हैं। भारत में हिंदी राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा के रूप में विद्यमान है।

6. विभाषा या उपभाषा

विभाषा या उपभाषा, भाषा की पूर्व इकाई है। विभाषा को अंग्रेजी में ‘डायलेक्ट’ (Dialect) कहते हैं। जब कोई बोली धार्मिक श्रेष्ठता, भौगोलिक, विस्तार अथवा उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं के कारण समग्र प्रान्त या उपप्रान्त में प्रचलित होकर साहित्यिक रूप धारण कर लेती है, तब वह विभाषा अथवा उपभाषा कहलाती है। ‘भाषाविज्ञान कोष’ के अनुसार विभाषा या Dialect ‘किसी भाषा के उस विशिष्ट रूप को कहा जाता है, जो किसी प्रान्त विशेष अथवा सीमित भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाती है। जो अपने उच्चारण, व्याकरण रूप एवं शब्द-प्रयोग की दृष्टि से अन्य परिनिष्ठित एवं साहित्यिक भाषाओं से भिन्न होती है।’ जैसे-

अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा, पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, बंगला आदि सभी विभाषा के उदाहरण हैं। ऐतिहासिक, राजनीतिक एवं भौगोलिक कारणों से ही बोलियाँ साहित्यिक रूप धारण कर विभाषा की दृष्टि में आ जाती हैं।

निष्कर्ष रूप में विभाषा का क्षेत्र बोली की अपेक्षा अधिक विस्तृत होता है। यह एक प्रान्त या उपप्रान्त में प्रयुक्त होती है। एक विभाषा में स्थानीय भेदों के आधार पर कई बोलियाँ प्रचलित होती हैं।

भाषा और विभाषा में अंतर

1. भाषा बोली का पूर्ण विकशित रूप है, विभाषा बोली का अर्ध विकसित रूप है।

2. विभाषा के अपेक्षा भाषा में प्रचुर साहित्य मिलता है।

3. विभाषा के अपेक्षा भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है।

4. भाषा का उदाहारण हिंदी, उर्दू, बंगाली आदि हैं वहीं विभाषा का उदाहरण- मैथिली, अवधी, भोजपुरी आदि है।

7. माध्यम भाषा

जिस भाषा के द्वारा शिक्षण-प्रशिक्षण और पठन-पाठन किया जाता है, वह माध्यम भाषा कहलाती है। माध्यम भाषा को अंग्रेजी में Medium Language (मीडियम भाषा) कहा जाता है। हर देश तथा राज्य की भिन्न-भिन्न माध्यम भाषा हो सकती है। उत्तर प्रदेश, बिहार तथा छत्तीसगढ़ आदि हिंदी भाषी राज्यों में शिक्षण का माध्यम हिंदी भाषा है, परंतु इंग्लैंड, जापान, चीन, रूस आदि में क्रमश: अंग्रेजी, जापानी, चीनी, रूसी आदि भाषाएँ शिक्षण का माध्यम हैं।

भारत में उच्च स्तर पर ज्ञान-विज्ञान, मैनेजमेंट और तकनीकी की भाषा अंग्रेजी है। मेडिकल, विधि आदि का पठन-पाठन भी अंग्रेजी में हो रहा है। जबकि हिंदी का प्रयोजनमूलक शब्द भंडार लगातार समृद्धि हो रहा है। अंग्रेजी परस्त चंद शिक्षक और अध्यापक नहीं चाहते की हिंदी भाषा उच्च शिक्षा का माध्यम हो। यह मिथक रचा गया की विज्ञान एवं तकनिकी शिक्षा अंग्रेजी में ही संभव है। जबकि विज्ञान एवं तकनिकी के नए-नए हिंदी शब्द गढ़े जा रहे हैं। कम्पूटर पर हिंदी का प्रयोग करना सहज हो गया है। देवनागरी लिपि में हिंदी संगणक की भाषा बन गई है।

वर्तमान समय में हमें हिंदी शब्द भंडार को बढ़ाने की जरूरत है। प्रयोजनमूलक हिंदी को विस्तार देने की जरूरत है। इस दिशा में उच्च शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं, शिक्षक और शोधार्थी भूमिका निभा सकते हैं। हिंदी को माध्यम भाषा तभी बनाया जा सकता है जब अंग्रेजी स्कूलों और कॉलेजों से बेहतर हिंदी के स्कूलों और कॉलेजों खोले जाएँ। तभी हिंदी पूर्णतया माध्यम भाषा बन सकती है।

8. मातृभाषा

जन्म लेने के बाद बच्चा जो प्रथम भाषा सीखता है, उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। विद्यानाथ प्रसाद वर्मा के शब्दों में “बच्चा जन्म लेकर अपनी माता से जो भाषा ग्रहण करता है, उसे मातृभाषा कहते हैं।”[4] मातृभाषा का सामान्य अर्थ ‘माता की भाषा’ है; अर्थात बालक अपनी माँ से जो भाषा सीखता है वह उसकी मातृभाषा मानी जाती है। मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है।

मातृभाषा के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के मत निम्नलिखित है-

(1) भारतेंदु ने मातृभाषा के लिए ‘निज भाषा’ शब्द का प्रयोग और उसकी उन्नति की बात किया है।

(2) गांधीजी के अनुसार, ‘मनुष्य के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है, जितना कि बच्चे के शारीरिक विकास के लिए माता का दूध।’

(3) कॉलरिज के अनुसार, ‘मातृभाषा मनुष्य के शरीर में धड़कते हृदय की भाषा है। इसे हिंडोले की भाषा (Language of the Cardle) भी कहा जाता है।’

(4) पी.बी. बैलर्ड के अनुसार, ‘मातृभाषा बच्चे की वह भाषा है, जिसके द्वारा वह सोचता और सपने बुनता है।’

भिन्न-भिन्न प्रान्तों, राज्यों एवं देशों की भाषाएँ अलग-अलग होती है; वे सभी वहाँ की मातृभाषाएं होती है। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों में हिंदी का प्रयोग होता है। अंत: इन राज्यों के निवासियों की मातृभाषा हिंदी है। जनगणना 2011 के अनुसार 52,83,47,193 लोगों अर्थात 43.63 फीसदी लोगों की मातृभाषा हिंदी है। दूसरे और तीसरे स्थान पर क्रमश: बंगाली और मराठी है। हिंदी भाषा के भी कई रूप हैं- अवधी, ब्रज, भोजपुरी, गढ़वाली, ब्रजभाषा, पूर्वी हिंदी, पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, बिहारी आदि इन प्रदेशों के निवासियों की मातृभाषा हैं। इसी तरह महाराष्ट्र में मराठी, बंगाल में बंगाली, गुजरात में गुजराती, पंजाब में पंजाबी आदि उन प्रदेशों की मातृभाषा हैं।

मातृभाषा में भावों व विचारों की अभिव्यक्ति सरल और प्रभावी होती है। इसीलिए अधिकतर शिक्षाविदों ने प्राथमिक शिक्षा के लिए मातृभाषा को प्रभावी माना है।

मातृभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर

जन्म के बाद जो प्राथमिक भाषा हम अपने माता-पिता और परिवेश से सीखते हैं वह भाषा मातृभाषा कहलाती है। वहीं जो भाषा देश के अधिकतम लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है वह राष्ट्रभाषा कहलाती है। जैसे- पंजाब के निवासियों की मातृभाषा पंजाबी है लेकिन उनकी राष्ट्रभाषा हिंदी है।

मातृभाषा और राजभाषा में अंतर

जो भाषा हमें अपने माता-पिता और परिवार से विरासत में मिलती है उसे मातृभाषा कहते हैं। वहीं जो भाषा सरकारी कामकाज की भाषा होती है, उसे राजभाषा कहते हैं। जैसे- उत्तराखंड के निवासियों की मातृभाषा मुख्यत: गढ़वाली और कुमाऊँनी है लेकिन उनकी राजभाषा हिंदी है।

9. साहित्यिक भाषा

जिन भाषाओं में साहित्यिक रचनाएं लिखी जाती हैं, उन्हें साहित्यिक भाषा कहते हैं। यह परिनिष्ठित भाषा के अधिक निकट होती है। इसमें परिमार्जित शब्दों का प्रयोग होता है। कवि और लेखक अपनी-अपनी रचनाएँ साहित्यिक भाषा में ही रचते हैं। साहित्यिक भाषा परिवर्तनशील होती है। जैसे- मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी और ब्रजभाषा का विकास हुआ लेकिन आधुनिक काल में खड़ी बोली पर से बनी हिंदी भाषा पुष्पित और पल्लवित हुई।

भारतेंदु युग में गद्य की भाषा खड़ी बोली वाली हिंदी थी लेकिन पद्य की भाषा ब्रज भाषा बनी हुई थी। द्विवेदी युग में पद्य की भाषा भी खड़ी बोली हो गई, व्याकरण की दृष्टि से भी उसका परिमार्जन हुआ। छायावादी युग में हमें अत्यंत शुद्ध, तत्सम-प्रधान एवं परिष्कृत हिंदी भाषा का रूप दिखाई पड़ता है। प्रगतिवादी युग में आकर लोकभाषा एवं उर्दू-फ़ारसी के शब्दों की अधिकता दिखाई देने लगता है। वहीं प्रयोगवादी कवियों ने उसे संस्कृतनिष्ठ बनाये रखने का प्रयास किया परन्तु नई कविता में उसका नया रूप सामने आता है। इसमें अंग्रेजी के शब्द का भी प्रयोग होने लगा। अंत: साहित्यिक भाषा में समयानुसार परिवर्तन होता रहता है।

साहित्यिक भाषा का क्षेत्र किसी भूखण्ड तक सीमित नहीं रहता है। जैसे- मध्यकाल की प्रमुख साहित्यिक भाषा ब्रज भाषा थी, जिसके अधिकतर कवि ब्रजभाषा क्षेत्र के बाहर के थे। उस समय अन्य भाषा का कोई कवि जब तक ब्रजभाषा में कविता नहीं करता था तब तक उसे कवि ही नहीं माना जाता था। देश के कोने-कोने के कवियों ने ब्रजभाषा में कविताई की, भले ही उनकी मातृभाषा दूसरी क्यों न रही हो। तुलसीदास अवधी के कवि थे लेकिन उन्होंने भी ब्रजभाषा में कई महत्वपूर्ण रचनाएँ लिखीं हैं। यह ब्रजभाषा की महत्ता को दर्शाता है क्योंकि उस समय ब्रजभाषा का ही बोलबाला था।

10. संचार भाषा

संचार का सामान्य अर्थ है- संदेश को फैलाना अथवा प्रसारण करना। अर्थात किसी सूचना या जानकारी को दूसरे तक पहुँचाना संचार कहलाता है। संचार शब्द अंग्रेजी के communication (कम्युनिकेशन) शब्द का हिंदी रूपांतरण है। रॉबर्ट एंडरसन के अनुसार, ‘वाणी, लेखन या संकेतों के द्वारा विचारों, अभिमतों अथवा सूचनाओं का विनिमय कहना संचार कहलाता है।’ संचार की यह प्रक्रिया विभिन्न माध्यमों द्वारा संपन्न होती है। सामान्य वार्तालाप एवं पत्र व्यवहार से लेकर सामाचार-पत्र, मोबाईल, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन, कम्प्यूटर, इंटरनेट, टेलीप्रिंटर, टेलीग्राफ आदि संचार के माध्यम हैं।

इन संचार माध्यमों की भाषा ही संचार भाषा है। अर्थात संचार भाषा का तात्पर्य संचार के लिए प्रयुक्त होने वाली भाषा से है। संचार भाषा का रूप साहित्यिक एवं बोलचाल की भाषा से पृथक हो सकता है। इसमें परिवर्तनशीलता और हर संचार माध्यम की अपनी भाषा होती है।

संचार माध्यमों के अनुकूल हिंदी भाषा की एक नई छवि निर्मित हो रही है। समाचार पत्रों की हिंदी साहित्यिक हिंदी से भिन्न रूप ले चुकी है। अब उसमें कई देशज एवं विदेशी शब्दों का प्रयोग हो रहा है। उसके व्याकरण का अपना बीज गणित है। फिल्मों में प्रयुक्त हिंदी भी मानक हिंदी से काफी भिन्न है। रेडियो और दूरदर्शन ने भी अपनी अलग भाषाई पहचान बनाई है। यह सायास नहीं हुआ है बल्कि हर माध्यम की अपनी मांग होती है। दरअसल संचार मूलत: संप्रेषण है, इसीलिए भाषा को हर माध्यम उच्चारण, व्याकरण नियमों आदि की दृष्टि से अनुकूलित करता रहता है।

संचार माध्यमों का विकास और लोकप्रियता ने हिंदी को नया अकार दिया है। उसे वैश्विक धरातल की भाषा बना दिया है। वर्तमान समय सूचना का विस्फोट का युग है, सोशल मीडिया ने इसे और प्रभावित किया है। नई संचार भाषा में संकेताक्षरों, लिपि-चिन्हों और कूट-पदों की बहुलता है। कम से कम वर्णाक्षरों के प्रयोग का दबाव है क्योंकि संचार के लिए ऐसी भाषा को सर्वोत्तम मन जाता है। अंग्रेजी इस दृष्टि से हिंदी से आगे है। संचार भाषा हिंदी में हिन्गलीश और अंग्रेजी शब्दों का अधिक प्रयोग हिंदी भाषा के लिए एक चुनौती है। फिर भी भारत में हिंदी एक महत्वपूर्ण संचार भाषा के रूप में उभर कर सामने आई है।


[1] हिंदी भाषा- मुकेश अग्रवाल, पृष्ठ- 89

[2] वही, पृष्ठ- 77

[3] आजीविका साधक हिंदी- पूरनचंद टंडन, पृष्ठ- 151

[4] हिंदी शिक्षण पद्वति- विद्यानाथ प्रसाद वर्मा, पृष्ठ- 2

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