हिंदी नाटक का उद्भव और विकास | Hindi Natak ka Vikas

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हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

हिंदी नाटक का उद्भव

हिंदी में नाटक लिखने का विकास आधुनिक युग में हुआ। क्योंकि इससे पूर्व के हिंदी नाटकों में नाट्यकला के तत्वों का अभाव है। इसमें अधिकतर नाटकीय काव्य हैं या संस्कृत नाटकों के अनुवाद। प्राणचंद चौहान कृत ‘रामायण महानाटक’ (1610 ई.) तथा कवि उदय कृत ‘हनुमान नाटक’ (1840 ई.) पद्यात्मक प्रबंध हैं, नाट्य रचनाएं नहीं। अन्य नाटककारों में भारतेंदु जी के पिता गोपालचंद्र (गिरधरदास) ने ‘नहुष’ (1857 ई.), गणेश कवि ने ‘प्रद्युम्न विजय’ (1863 ई.) तथा शीतला प्रसाद त्रिपाठी ने जानकी मंगल (1868 ई.) आदि नाटकों की रचना की। ‘जानकी मंगल’ ही नाट्यगुणों से संपन्न है, जिसका मंचन बनारस में हुआ और इसके एक अभिनेता भारतेंदु खुद थे। परंतु तब तक भारतेंदुजी का विद्यासुन्दर (1868 ई.) नाटक प्रकाशित हो चुका था जो संस्कृत की ‘चौरपंचाशिका’ कृत के बंगला संस्करण का छाया अनुवाद है। इसीलिए हिंदी में नाटक लिखने की परम्परा का आरंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र से माना जाता है।

खड़ी बोली में लिखा गया पहला नाटक राजा शिव प्रसाद सिंह का ‘शकुंतला’ (1863 ई.) है जो कालिदास के ‘अभिज्ञान शकुंतलम’ का हिंदी अनुवाद है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘कालचक्र’ में ‘नहुष’ को हिंदी का प्रथम, ‘शकुंतला’ को द्वितीय और विद्यासुंदर’ को तृतीय नाटक स्वीकार किया है। वहीं दशरथ ओझा ने 13वीं सदी के नाटक ‘गाय कुमार रास’ को हिंदी का प्रथम नाटक माना है।

भारतेंदु जी ने न केवल हिंदी में मौलिक नाटकों की रचना की अपितु उन्होंने दूसरी भाषाओं की श्रेष्ठ नाट्य रचनाओं के अनुवाद भी किए। यही नहीं उन्होंने नाट्य शिल्प पर प्रकाश डालने हेतु ‘नाटक’ नामक आलोचनात्मक रचना में नाट्यकला के तत्वों का उल्लेख करते हुए नए नाटककारों को दिशा निदेश दिया जिससे वे जनरुचि के अनुकूल नाटकों की रचना कर सके। उन्होंने युगीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऐसे नाटकों की रचना का मार्ग प्रशस्त किया जो भारतीय एवं पश्चात्य नाट्यकला का समन्वयात्मक रूप प्रस्तुत करते थे। शुक्लजी ने लिखा है- “विलक्षण बात यह कि आधुनिक गद्य साहित्य की परंपरा का प्रवर्तन नाटकों से हुआ।”[1]

हिंदी नाटक का विकास

हिंदी नाटकों के विकास की परम्परा का अध्ययन करने हेतु उसे निम्न कालों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. भारतेंदुयुगीन हिंदी नाटक (1857 ई. से 1900 ई. तक)

2. प्रसादयुगीन हिंदी नाटक (1900 ई. से 1950 ई. तक)

3. प्रसादोत्तर हिंदी नाटक (1950 ई. के उपरान्त)

1. भारतेंदुयुगीन हिंदी नाटक (1857-1900 ई.)

भारतेंदु युग में मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के नाटक बहुतायत में लिखे गये। अनूदित नाटक मुख्यत: बंगला, संस्कृत, अंग्रेजी भाषाओं की नाट्य कृतियों पर आधारित हैं। इन अनुदित नाटकों से हिंदी नाट्य साहित्य को नवीन दृष्टि प्रात हुई और हिंदी में नाट्य रचना का सूत्रपात हुआ। स्वयं भारतेंदु जी ने अनूदित नाटकों की रचना की।

भारतेंदु ने संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी के नाटकों का अनुवाद किया और मौलिक नाटकों की रचना भी की। विद्यासुंदर (1608), रत्नावली (1868), धनंजय विजय (1873), कर्पूर मंजनी (1875), पाखंड विडम्बन (1872), मुद्राराक्ष (1818), दुर्लभ बंधु (1880) आदि अनुदित और वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873), सत्य हरिश्चद्र (1875), श्री चन्द्रावली (1876), विषस्य विषमौषधम्‌ (1876), भारत दुर्दशा (1880), नील देवी (1881), अंधेर नगरी (1881), सती प्रताप (1883), प्रेम जोगिनी (1875), भारत जननी (1877) आदि मौलिक नाटकों की रचना की।

“उनके मौलिक नाटकों में अतीत का गौरव-गान भी है और युगानुरूप नयी नाट्य-परंपरा की शुरुआत भी।”[2] ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ में उन्होंने धर्म के नाम पर को जाने वाली पशुबलि का विरोध किया है तो ‘विषस्य विषमौषधम’ में उन्होंने देशी राजाओं की दुर्दशा का चित्रण किया है। ‘भारत दुर्दशा’ में अंग्रेजी राज्य में भारत की दुर्दशा का निरूपण किया गया है तथा ‘नीलदेवी’ में भारतीय नारी के आदर्श को प्रतिपादित किया गया है। अंधेर नगरी में भ्रष्ट शासन तंत्र पर प्रहार किया गया है जबकि ‘चंद्रावली नाटिका’ में प्रेमा भक्ति को प्रतिष्ठित करने का सुन्दर प्रयास है।

भारतेंदु ने अपने नाटकों के माध्यम से राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का नवोन्मेष किया और मनोरंजन के साथ जनता को शिक्षित करने का भी प्रयास किया। उन्होंने अपने नाटकों द्वारा युगीन समस्याओं को जनता तक पहुंचाने का प्रयास किया है। इन नाटकों में सुधारवादी दृष्टिकोण के साथ राष्ट्रीय चेतना की भी अभिव्यक्ति हुई है। उनके नाटक जनकल्याण की भावना से ओत-प्रोत हैं तथा उनका प्रधान स्वर उपदेशात्मक है। अतीत गौरव एवं ऐतिहासिक श्रेष्ठता का प्रतिपादन करने का बीज भारतेंदु युग में ही पड़ गया था, जिसका विकास प्रसादयुगीन नाटकों में दिखाई देता है।

भारतेंदु जी ने अपने समय में दर्शकों की रूचि को परिष्कृत करने का प्रयास किया और पारसी थियेटर की व्यावसायिक मनोवृत्ति से उत्पन्न हीन रुचियों, दृश्यों एवं गीतों का प्रबल विरोध किया। उन्होंने संस्कृत नाट्यकला के साथ-साथ पाश्चात्य नाट्यकला का समन्वय करके हिंदी नाट्यकाव्य को नवीन दिशा की ओर अग्रसर करने का स्तुत्य प्रयास किया।

भारतेंदुकाल के अन्य नाटककारों में पमुख हैं- लाला श्रीनिवासदास, राधाकृष्णदास, बालकृष्ण भट्ट, राधाचरण गोस्वामी, गोपालराम गहमरी, किशोरीलाल गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र एवं जी. पी. श्रीवास्तव आदि।  

लाला श्रीनिवासदास ने चार नाटकों की रचना की- श्री प्रहलाद चरित्र, तप्ता संवरण, रणधीर प्रेम मोहिनी और संयोगिता स्वयंवर। इनमें से ‘रणधीर प्रेम मोहिनी’ (1877) उत्कृष्ट कोटि की रचना है, यह हिंदी का प्रथम दुखांत नाटक है। ‘संयोगिता स्वयंवर’ उनका ऐतिहासिक नाटक है।

राधाकृष्णदास भारतेंदु युग के लोकप्रिय नाटककार माने जाते हैं। इन्होने महारानी पद्मावती, धर्मालाप, महाराणा प्रताप (1897 ई.) तथा दुःखिनीबाला आदि नाटकों की रचना किया। इनमें से ‘महाराणा प्रताप’ सबसे महत्वपूर्ण नाटक है जिसमें राणाप्रताप के शौर्य का वर्णन करते हुए राष्ट्रीय भावना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है।

बालकृष्ण भट्ट द्वारा रचित नाटकों में दमयन्ती स्वयंवर, वृहन्नला, वेणीसंहार, कलिराज की सभा, शिक्षा दान, रेल का विकट खेल, बाल-विवाह आदि विशेष प्रसिद्ध हुए। इन नाटकों में सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य करने के साथ-साथ अतीत गौरव का भी अभिव्यक्त किया गया।

राघाचरण गोस्वामी ने प्रहसनों की रचना में नाम कमाया। उन्होंने दो प्रहसन लिखे- ‘तन मन धन गोसांई जी के अर्पण’ और ‘बूढ़े मुंह मुंहासे लोग देखें तमासे’। प्रथम नाटक में धर्म गुरूओं की छद्म लीलाओं का भंडाफोड़ किया है तथा दूसरे नाटक में पर स्त्रीगमन की बुराइयों को उजागर किया गया है। उन्होंने ‘अमर सिंह राठौर’, ‘सती चन्द्रावली’ और ‘श्रीदामा’ (1904 ई.) जैसे ऐतिहासिक नाटकों की भी रचना की है। इनमें से ‘अमरसिंह राठौर’ को काफी प्रसिद्धि मिली।

गोपालराम गहमरी ने सामयिक विषयों को लेकर सफल नाटकों की रचना की। देशदशा में सरकारी कर्मचारियों की धांधली का वर्णन किया गया है। जैसे को तैसा तथा विद्या विनोद उनके व्यंग्यात्मक नाटक हैं। भारतेंदु युग के एक अन्य सशक्त नाटककार के रूप में जी.पी. श्रीवास्तव का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने जिन प्रहसनों की रचना की उनमें उलटफेर, दुमदार आदमी, गड़बड़झाला, कुसी मैन, न घर का न घाट का आदि उल्लेखनीय रचनाएं मानी जाती हैं। इसी परम्परा में पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के नाटकों को रखा जा सकता है। उन्होंने प्रहसनों के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों, अस्वस्थ परम्पराओं एवं विद्रूपताओं को उजागर किया। उनके प्रहसनों मे प्रमुख हैं- चार बिचारे, उजबक, आदि।

भारतेंदु युग के नाटकों में ऐतिहासिक, पौराणिक काल्पनिक कथाओं को विषयवस्तु बनाया गया। समाज सुधार, राष्ट्रीय गौरव, अतीत गौरव को नाटकों के माध्यम से दर्शकों तक संप्रेषित किया गया। प्रहसनों का मूल उद्देश्य व्यंग्य के द्वारा समाज की कुरीतियों का समापन करना था। आदर्श पात्रों की सृष्टि में इन नाटककारों का विश्वास था तथा नाट्यकला

की दृष्टि से वे हिंदी नाटकों के लिए नवीन मार्ग का अनुसंधान कर रहे थे। भारतेंदु जी नाट्यकला में पारंगत थे, क्योंकि उनके नाटक अभिनेय हैं तथा उनमें भारतीय नाट्यकला के तत्वों के साथ-साथ पाश्चात्य नाट्यकला के तत्वों यथा- अंतर्द्वंद चरित्र-चित्रण, कार्य व्यापार आदि का समावेश पाया जाता है।

भारतेंदुयुगीन नाटकों में विषयों की विविधता थी, किन्तु टेक्नीक में अभी सुधार की आवश्यकता थी। रंग-संकेत भी इन नाटकों में मिलते हैं, किन्तु वे अधिक प्रभावकारी नहीं हैं। कुल मिलाकर भारतेंदु युग हिंदी नाटकों के विकास का प्रथम पड़ाव माना जा सकता है। भारतेंदु जी इस युग के सर्वश्रेष्ठ नाटककार है उनके योगदान पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है- ‘भारतेंदु जी ने अपने मौलिक और अनूदित नाटकों के जरिए एक साथ कई काम किए। उन्होंने नाटकों के माध्यम से नई हिंदी को लोकप्रिय बनाया, पारसी रंगमंच का विरोध किया तथा प्राचीन नाटकों का उद्धार किया।’

विभिन्न भाषाओं से अनूदित नाटकों ने हिंदी नाटकों को नई दिशा प्रदान करने में सहायता की तथा हिंदी प्रेमी अन्य भाषाओं की श्रेष्ठ नाट्य कृतियों से परिचित हो सके। भारतेंदु जी ने अपने नाटकों से हिंदी के नाट्यकारों के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया और उन्हें नवीन विषयों पर नाटक लिखने की प्रेरणा भी दी।

2. प्रसादयुगीन हिंदी नाटक (1900-1950 ई.)

भारतेंदु जी ने हिंदी नाट्य साहित्य को जो साहित्यिक भूमिका प्रदान की, उसे कालान्तर में जयशंकर पसाद ने पल्‍लवित किया। हिंदी नाट्य क्षेत्र में प्रसाद जी का आगमन वस्तुतः युगांतर प्रस्तुत करता है। प्रसादजी के समय तक हिंदी रंगमंच का पूर्ण विकास नहीं हो सका था, फलत: वे ऐसे नाटकों की रचना में प्रवृत्त हुए जो पाठ्य अधिक हैं, अभिनेय कम। प्रसिद्ध समालोचक डॉ. गोपाल राय के अनुसार- ‘प्रसाद जी की कठिनाई यह थी वे जिस प्रकार के नाटक लिखना चाहते थे, उनके अनुरूप रंगमंच हिंदी में नहीं था।… हिंदी का शौकिया रंगमंच नितांत अविकसित था, फलत: प्रसाद ने साहित्यिक रंगमंच की स्वयं कल्पना की और इस मानसिक रंगमंच की पृष्ठभूमि में ही अपने नाटक लिखे। … प्रसादजी अपने काल्पनिक रंगमंच को व्यावहारिक रूप नहीं दे सके, जिसका परिणाम यह हुआ कि उनके नाटक अन्य सभी दृष्टियों से उत्कृष्ट होने पर भी अभिनय की दृष्टि में सफल न हो पाए।’

प्रसादजी ऐतिहासिक नाटकों की रचना करने वाले हिंदी के प्रमुख नाटककार माने जाते हैं। भारत के अतीत गौरव का चित्रण करने के साथ-साथ उन्होंने राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने का प्रयास अपने नाटकों के माध्यम से किया है। स्वयं प्रसादजी ने अपने नाटक ‘विशाख’ की भूमिका में स्वीकार किया है- मेरी इच्छा भारतीय इतिहास के अप्रकाशित अंश में से उन प्रकाण्ड घटनाओं का दिग्दर्शन कराने की है, जिन्होंने हमारी वर्तमान स्थिति को बनाने का बहुत कुछ प्रयत्न किया है।’ प्रसादजी ने अपने नाटकों के विषय बौद्धकाल, मौर्यकाल एवं गुप्तकाल में चुने हैं जो भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है।

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटकों का विवरण इस प्रकार है-

  • विशाख 1921 ई.
  • अजातशत्रु 1922 ई.
  • कामना 1924 ई. (प्रकाशन 1927 ई.)
  • जनमेजय का नागयज्ञ 1926 ई.
  • स्कन्दगुप्त 1928 ई.
  • एक घूंट 1930 ई.
  • चन्द्रगुप्त 1931 ई.
  • ध्रुवस्वामिनी 1933 ई.

इनमें से कलात्मक उत्कृष्टता की दृष्टि से स्कन्दगुप्त, चंद्रगुप्त और ध्रुवस्वामिनी विशेष महत्वपूर्ण हैं। अपने नाटकों में प्रसादजी ने अतीत के पट पर वर्तमान का चित्रण किया है तथा इतिहास एवं कल्पना का संतुलित समन्वय करने में उन्हें सफलता प्राप्त हुई है। ध्रुवस्वामिनी में प्रसाद जी ने नारी समस्या को प्रस्तुत किया है। तलाक (विवाह-मुक्ति) एवं पुनर्विवाह का अधिकार हिन्दू स्त्री को है या नहीं इस समस्या को बड़े कौशल से उन्होंने प्रस्तुत किया है। प्रसादजी ने अपने ऐतिहासिक नाटकों की भूमिका में नाटक की कथावस्तु के ऐतिहासिक स्रोतों तथा अन्य विवरणों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने अपने नाटकों में भारतीय संस्कृति, जातीय गौरव एवं राष्ट्रीयता के गौरवपूर्ण चित्र अंकित किए हैं नारीपात्र आदर्श भारतीय रमणी के रूप को प्रस्तुत करते हैं।

नाट्य शिल्प की दृष्टि से प्रसादजी के नाटक बेजोड़ हैं। उनमें भारतीय एवं पाश्चात्य नाट्यकला का सन्तुलित समन्वय हुआ है। एक ओर तो उनमें कथावस्तु, गीत योजना, रस योजना, उदात्त नायक, विदूषक, आदि भारतीय नाट्यकला से लिए गए हैं तो दूसरी ओर कार्य व्यापार, अंतर्द्वंद्व, संघर्ष एवं व्यक्ति वैचित्र जैसे तत्व पाश्चात्य नाट्यकला से लिए गए हैं।

प्रसाद जी के नाटक न तो सुखांत हैं और न ही दुःखांत अपितु वे प्रसादान्त हैं। नायक अन्तिम फल का भोक्‍ता नहीं बन पाता और विषाद की एक छाया पाठकों के मन पर छूट जाती है। उदाहरण के लिए, स्कन्दगुप्त नाटक को लिया जा सकता है। स्कन्दगुप्त अपने मार्ग में आने वाली सारी विघ्न बाधाओं पर विजय प्राप्त करने के उपरांत भी अन्त में नायिका देवसेना को प्राप्त नहीं कर पाता। देवसेना यह कहकर उसके विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देती है- ‘मेरे इस जीवन के देवता और उस जीवन के प्राप्य-क्षमा’।

रंगमंचीयता अभिनेयता की दृष्टि से भी प्रसादजी के नाटक दोषपूर्ण हैं। विस्तृत एवं विशृंखलित कथानक, दृश्यों की बहुलता, लंबे-लंबे स्वगत कथनों, दार्शनिक उक्तियों एवं संस्कृत गर्भित लाक्षणिक भाषा उनके नाटकों की अभिनयता में बाधक है। वस्तुतः उनके नाटक पाठ्य अधिक हैं, अभिनय कम।

प्रसादजी प्रयोगधर्मी नाटककार थे। उन्होंने अपने परवर्ती नाटकों में विषय और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से प्रयोग किए और अन्ततः ध्रुवस्वामिनी के रूप में एक ऐसा सशक्त नाटक लिखा जो पूरी तरह अभिनीत किए जाने योग्य है, क्योंकि इसमें वे त्रुटियां नहीं हैं जो उनके अन्य नाटकों की अभिनेयता में बाधक मानी गई हैं। उन्होंने न केवल ऐतिहासिक नाटक लिखे अपितु कामना नामक नाट्यकृति की रचना भी की जो संस्कृत के ‘प्रबोध चन्द्रोदय’ शैली की एक अन्योपदेशक रचना है। एक घूंट उनका सफल एकांकी है तो करुणालय (1912) को ‘गीत-नाट्य’ के अन्तर्गत रखा जा सकता है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हिंदी की ऐतिहासिक नाट्य परम्परा में प्रसादजी श्रेष्ठतम नाटककार है। प्रसाद युग के अन्य उल्लेखनीय नाटककारों में- हरिकृष्ण प्रेमी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, सेठ गोविन्ददास, गोविन्दबल्लभ पंत, उपेन्द्रनाथ अश्क, वृन्दावनलाल वर्मा, किशोरीदास वाजपेयी, वियोगी हरि, चतुरसेन शास्त्री, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ आदि के नाम लिए जा सकते है।

‘हरिकृष्ण प्रेमी’ ने मध्यकालीन इतिहास से विषय-वस्तु का चयन करते हुए भव्य ऐतिहासिक नाटकों की रचना की। रक्षाबन्धन, शिवसाधना, प्रतिशोध, स्वप्नभंग आहुतिति, विषपान, उद्धार, शपथ, विजयस्तम्भ, कीर्तिस्तम्भ, संरक्षक, विदा, आन का मान, संवत प्रवर्तन, अमृतपुत्री, छाया बन्धन आदि प्रेमीजी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक हैं। प्रेमीजी ने अपने नाटकों से हिन्दू-मुस्लिम एकता को स्थापित करने का प्रयास किया। रक्षाबन्धन (1934 ई.) में रानी कर्णवती मुगल सम्राट हुमायूं को राखी बांधकर अपना भाई बना लेती है। ‘प्रतिशोध’ (1937 ई.) नाटक में बुन्देलखंड के वीर योद्धा चम्पतराय एवं उसके पुत्र छत्रसाल के जीवन-चरित्र द्वारा राष्ट्रीयता को भावना मुखरित की गई है। स्वप्नभंग नाटक में शाहजहां के पुत्र द्वारा हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपना बलिदान कर देने की कथा है। विषपान (1945 ई.) में राजकुमारी कृष्णा देशहित के लिए विषपान कर लेती है। प्रेमीजी के नाटक राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हैं तथा रंगमंचीयता एवं अभिनेयता की दृष्टि से भी सफल हैं।

प्रसाद युग के एक अन्य प्रमुख नाटककार के रूप में लक्ष्मीनारायण मिश्र का नाम उल्लेखनीय है। उनके प्रसिद्ध नाटकों में- संन्यासी, कल्पतरू, राक्षस का मंदिर, मुक्ति का रहस्य, राजयोग, सिन्दूर की होली और आधीरात के नाम लिए जा सकते हैं। मिश्र जी समस्या प्रधान नाटकों की रचना के लिए प्रख्यात रहे हैं। संन्यासी (1929 ई.) में विदेशी शासकों की छल कपटपूर्ण नीति, गांधी जी के असहयोग आन्दोलन एवं रौलेट एक्ट को विषयवस्तु के रूप में अपनाया गया है। उन्होंने सामाजिक समस्याओं विशेषत: नारी समस्या को अपने नाटकों को कथावस्तु का आधार बनाया है। प्रेम और विवाह, काम और नैतिकता, दाम्पत्य जीवन एवं प्रणय जैसी अनेक समस्याएं उनके नाटकों की विषय वस्तु बनी हैं। मिश्रजी के नाटकों में नगरीय जीवन का निरूपण ही किया गया है तथा उनमें बौद्धिकता का समावेश अधिक है। सिन्दूर की होली (1934 ई.) में मिश्रजी ने विधवा विवाह एवं नारी उद्धार जैसे विषय चुने हैं।

मिश्रजी ने कुछ ऐतिहासिक नाटकों की रचना भी की है। इनमें गरुड़ध्वज (1945 ई.), वत्सराज (1950 ई.), दशाश्वमेध एवं बितस्ता की लहरें (1953 ई.) विशेष प्रसिद्ध हुए। मिश्रजी ने नाट्यकला के क्षेत्र में अनेक मौलिक प्रयोग किए। उनके नाटक तीन अंकों के हैं तथा अंकों को दृश्यों में विभाजित नहीं किया गया। वे यह भी मानते हैं कि उनके नाटक पाश्चात्य प्रभाव से युक्त नहीं हैं। यद्यपि उनके नाटकों में विषय प्रतिपादन भारतीय ढंग का है तथापि इन नाटकों का शिल्प पश्चिमी प्रभाव से अलग नहीं है। कुछ भी हो हिंदी नाटकों के विकास में लक्ष्मीानारायण मिश्र का महत्वपूर्ण योगफल है और वे हिंदी के एक सशक्त नाटककार के रूप में जाने जाते हैं।

सेठ गोविन्ददास ने आदर्शवादी नाटकों की रचना में उल्लेखनीय योगदान किया। उनके नाटकों में प्रमुख है- प्रकाश, स्वातन्त्य सिद्वांत, सेवापथ, संतोष कहां, त्याग और ग्रहण, बड़ा पापी कौन, सुख किसमें, महत्व किसे, गरीबी या अमीरी, आदि। इन नाटकों में सेठ जी ने अनेक समकालीन समस्याओं- छुआछूत, भ्रष्टाचार, पाखंड, नेताओं का स्वार्थपरता, आदि का निरूपण किया है। उनके नाटक रंगमंच के अनुकल हैं, किन्तु उनमें नाटकीय संघर्ष एवं कार्य व्यापार की शिथिलता है। गोविन्ददास जी के हर्ष, कुलीनता, शशिगुप्त, अशोक, शेरशाह, कर्तव्य, कर्ण आदि उनके ऐतिहासिक एवं पौराणिक नाटकों की कोटि में आने वाले नाटक हैं।

गोविन्दबल्लभ पंत ने राजनीति के साथ-साथ एक नाटककार के रूप में भी ख्याति अर्जित की। अंगूर की बेटी (1935 ई.) में उन्होंने शराब के दुर्गुणों की चर्चा की तथा ‘सिंदूर की बिन्दी’ नाटक में परित्यक्ता नारी की समस्या को चित्रित किया। उनके कुछ अन्य प्रमुख ऐतिहासिक नाटक हैं- राजमुकुट एवं अन्तःपुर का छिद्र। प्रधम नाट्यकृति में पन्नाधाय के बलिदान की गाथा है तथा ‘अन्त:पुर का छिद्र’ में राजा उदयन की दो रानियों- पदमावतती एवं मागन्धी के संघर्ष, षड्यंत्र की गाथा के माध्यम से तत्कालीन परिस्थितियों एवं नारी के अंतर्मन को उजागर किया गया है।

उपेंद्रनाथ ‘अश्क’ ने स्वर्ग की झलक, छठा बेटा, अलग-अलग रास्ते, अंजो दीदी, अन्धी गली, कैद, उड़ान एवं जय-पराजय आदि अनेक नाटकों की रचना की। इनमें से अंतिम उनका ऐतिहासिक नाटक है जो मंडावर की राजकुमारी हंसाबाई एवं मेवाड़ के राजकुमार चण्ड की गाथा है। अश्कजी के नाटकों में नारी मनोवृत्ति का यथार्थ निरूपण हुआ है तथा समसामयिक् समस्याओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। छठा बेटा (1940 ई.) उनका प्रसिद्ध नाटक है जिसमें पुत्रों की स्वार्थपरता का हास्य-व्यंग्यपूर्ण शैली में यथार्थ चित्र अंकित किया गया है।

अंजो दीदी (1954) अश्कजी को सर्वाधिक प्रौढ़ नाट्यकृति है जिसमें नाटककार ने अहंवादिता एवं प्राचीन संस्कारों के दुष्प्रभाव का वर्णन किया है। नाटक की नायिका अंजों दीदी (अंजली) कठोर नियन्त्रण लगाकर परिवार का विनाश कर लेती है। वह टूट जाती है, किन्तु झुक नहीं पाती। दो अंकों का यह लघु नाटक रंगमंच की दृष्टि से पूर्ण सफल रहा है।

प्रसादयुगीन नाटककारों में उदयशंकर भट्ट ने पर्याप्त यश अर्जित किया। उन्होंने ऐतिहासिक एवं समस्यामूलक नाटकों की रचना की। अम्बा, सगर विजय उनके पौराणिक नाटक हैं। जिनके कथानक का श्रोत क्रमशः महाभारत एवं पुराण हैं। इन नाटकों के माध्यम से लेखक ने प्राचीन कथानक को नवीन सन्दर्भ दिए हैं। भट्टजी ने जिन ऐतिहासिक नाटकों की रचना की उनमें दाहर (1938 ई.), शक विजय, मुक्तिपथ विशेष उल्लेखनीय हैं। मुक्तिपथ में बुद्ध के जीवन चरित्र को कथा का आधार बनाया गया है जबकि शक विजय में ब्राह्मण और जैन संघर्ष का चित्रण किया गया है।

वृन्दावनलाल वर्मा हिंदी के ऐतिहासिक उपन्यासकार ही नही अपितु ऐतिहासिक नाटककार के रूप में भी प्रसिद्ध रहे हैं। फूलों की बोली, पूर्व की ओर, बीरबल, ललितविक्रम (1953 ई.) उनके प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक हैं। ऐतिहासिक नाटकों के अतिरिक्त उन्होंने समस्या प्रधान नाटक भी लिखे जिनमें विवाह, छुआछूत, ऊच-नीच, सामाजिक विषमता, आदि का निरूपण किया गया है। इन नाटकों में प्रमुख हैं- राखी की लाज, सगुन, नीलकण्ठ, केवट (1951 ई.), निस्तार और देखा-देखी। हिंदी के ऐतिहासिक नाटकों की परम्परा को समृद्ध बनाने में अनेक नाटककारों ने योगदान किया। रामबृक्ष बेनीपुरी ने अम्बपाली, कृष्णचंद्र, भिक्‍खु ने रूपलक्ष्मी, विष्णु प्रभाकर ने समाधि, चतुरसेन शास्त्री ने धर्मराज, दशरथ ओझा ने प्रियदर्शी सम्राट अशोक आदि अनेक नाटकों की रचना करके अपनी प्रतिभा की परिचय दिया। इस काल में समस्यामूलक नाटकों की रचना भी पर्याप्त मात्रा में हुई।

प्रसाद युग में यद्यपि समाज सुधार की प्रवृत्ति को आधार बनाकर नाटकों की रचना की गई। बाल-विवाह, अनमेल विवाह, छुआछूत, वर्ण व्यवस्था, नारी-स्वातन्त्य, धार्मिक अंध-विश्वास जैसी अनेक समस्याओं का चित्रण तत्कालीन नाटकों में हुआ, किंतु इस काल में ऐतिहासिक नाटकों की रचना करने की ओर विशेष ध्यान दिया गया। प्रसादजी ने जिन ऐतिहासिक नाटकों की रचना की वे विषयवस्तु एवं शिल्प की दृष्टि से अत्यन्त प्रभावशाली हैं। वस्तुत: प्रसादजी हिंदी के श्रेष्ठतम ऐतिहासिक नाटककार हैं। इस काल के नाटककारों ने राष्ट्रीय गौरव एवं राष्ट्रीयता की भावना जगाने का स्तुत्य प्रयास किया।

प्रसाद युग के कुछ अन्य नाटककारों ने समस्यामूलक नाटकों की रचना में भी विशेष ख्याति अर्जित की। इस काल में समस्याओं के यथार्थ चित्रण की प्रवृत्ति विकसित हुई और अनेक सामाजिक तथा वैयक्तिक समस्याओं का निरूपण नाटकों के माध्यम से हुआ। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रसाद युग हिंदी नाटकों को प्रौढ़ता की ओर ले जाने वाला काल सिद्ध हुआ तथा यह प्रौढ़ता विषय एवं शिल्प दोनों ही दृष्टियों से है।

3. प्रसादोत्तर हिंदी नाटक (1950 के उपरान्त)

प्रसादोत्तर नाटकों का प्रारम्भ सन्‌ 1950 ई. से माना जाता है। इस काल के नाटक जीवन के यथार्थ से अधिक जुड़े हुए हैं तथा उनमें रंगमंचीयता एवं अभिनेयता का विशेष ध्यान रखा गया है। देश में स्वतंत्रता के उपरान्त एक नई चेतना का विकास हुआ तथा जनमानस ने जो अपेक्षाएं की थीं वे भी पूरी नहीं हो सकीं। सर्वत्र स्वार्थपरता, छल-कपट, भ्रष्टाचार, अवसरवादिता का बोलबाला हो गया। युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित हो गई। बढ़ती हुई बेरोजगारी ने तनाव, संघर्ष एवं आपराधिक प्रवृत्तियों को जन्म दिया। मूल्यों में परिवर्तन हुआ और समाज का ढांचा बिखरने लगा। महानगरीय जीवन, यांत्रिकता, औद्योगीकरण के कारण जीवन और जगत में अनेक नई समस्याओं का विकास हुआ। नवीन परिवेश, नवीन भावबोध एवं नवीन मान्यताओं ने नाटकों की विषय-वस्तु को भी बदल दिया। नाटक ने पुरानी लीक छोड़कर नवीन मार्ग ग्रहण किया।

यद्यपि इस काल में भी नाटकों की विषय-वस्तु का चयन इतिहास-पुराण के साथ-साथ समसामयिक जीवन से किया गया तथापि अब विषय-वस्तु एवं शिल्प में बदलाव नजर आने लगा। जटिल जीवनानुभूतियों को अब नाटक में प्रस्तुत किया जाने लगा तथा अंतर्द्वंद्व चित्रण की प्रमुखता रहने लगी।

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प्रसादोत्तर नाटककारों में विष्णु प्रभाकर, जगदीशचंद माथुर, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीनारायण लाल, रामकुमार वर्मा, मोहन राकेश, नरेश मेहता, विनोद रस्तोगी, सुरेन्द्र वर्मा, डॉ. शंकर शेष रमेश वक्षी, मुद्राराक्षस, नरेद्र कोहली, गिरिराज किशोर, गोविन्द चातक, जयनाथ नलिन, डॉ. शिवप्रसाद सिंह, आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

विष्णु प्रभाकर ने अपने नाटकों में आधुनिक भावबोध से उत्पन्न तनाव एवं जीवन संघर्ष को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया है। इनके लिखे प्रसिद्ध नाटकों के डॉक्टर (1958 ई.), युगे-युगे क्रान्ति और टूटते परिवेश के नाम लिए जा सकते हैं। ‘युगे-युगे क्रान्ति’ में पीढ़ीगत संघर्ष की अभिव्यक्ति है तथा ‘टूटत परिवेश’ में पारिवारिक विघटन को यथार्थ अभिव्यक्ति मिली है। ‘डॉक्टर’ एक मनोवैज्ञानिक नाटक है जिसमें भावना और कर्तव्य के अंतर्द्वंद्व को चित्रित किया गया है।

जगदीशचन्द्र माथुर ने हिंदी रंगमंच को नई दिशा देने का प्रयास अपने बहुचर्चित नाटकों के माध्यम से किया। कोणार्क (1951 ई.), शारदीया (1950 ई.), पहला राजा (1969 ई.) तथा दशरथनंदन (1974 ई.) उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। ‘कोणार्क’ नाटक की कथा भुवनेश्वर (उड़ीसा) के कोणार्क मंदिर के साथ जुड़ी हुई है। शिल्पी विशु और महामन्त्री चालुक्य के संघर्ष की कथा वस्तुत: प्रभुता संपन्न शासक एवं गरीब शिल्पी की संघर्ष गाथा है। शिल्पी अपनी कला उस आतंकी महामंत्री चालुक्य के हाथ सौंपना नहीं चाहता और अन्त:संघर्ष से प्रेरित होकर अपनी रचना का स्वयं विध्वंस कर देता है। ‘शारदीया’ उनका ऐतिहासिक नाटक है जो मराठों और निजाम के बीच हुए युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधृत है। राजनीतिक हथकण्डों से युक्त इस नाटक की कथावस्तु बसी हुई है तथा शिल्प में पाश्चात्य एवं भारतीय नाट्यकला का समन्वय किया गया है। ‘पहला राजा’ पौराणिक पृष्ठभूमि से युक्त होने पर भी समसामयिक युगीन संदर्भों से जुड़ा हुआ प्रतीकात्मक नाटक है। इस नाटक से लेखक ने विषमतापूर्ण राजनीति एवं शासनतंत्र की असफलताओं को व्यक्त किया है। ‘दशरथनन्दन’ रामकथा पर आधृत नाट्य कृति है।

मोहन राकेश आधुनिक काल के सशक्त नाटककार माने जाते हैं। यद्यपि उन्होंने केवल तीन नाटकों की रचना की तथापि संख्या में कम होने पर भी उनके नाटक हिंदी में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनके नाटकों के नाम हैं- आषाढ़ का एक दिन (1958 ई.), लहरों के राजहंस (1963 ई.) तथा आधे-अधूरे (1960 ई.)। ‘आषाढ़ का एक दिन’ महाकवि कालिदास के परिवेश रचना प्रक्रिया, प्रेरणा श्रोत और उनके चुक जाने से सम्बद्ध कथा को प्रस्तुत करने वाला नाटक है। कालिदास को रचना की प्रेरणा अपने गांव से परिवेश और प्रकृति से प्राप्त होती है। इस प्रेरणा का सबसे प्रभावी स्रोत है मल्लिका, किन्तु राज्याश्रय प्राप्त होने पर कालिदास अपने परिवेश से उखड़ गया। एक परिवेश से कटकर दूसरे से जुड़ पाने का अंतर्द्वंद्व साहित्यकार की पीड़ा को उभारता है। विलोम इस नाटक का प्रभावशाली खल पात्र है। यह नाटक रंगमंचीयता की दृष्टि से पूर्ण उपयुक्त है। ‘लहरों के राजहंस’ में नंद और सुन्दरी की कथा महात्मा बुद्ध के परिपेक्ष्य में प्रस्तुत की गई है। राग-विराग और श्रेय-प्रेय के अंतर्द्वंद्व की सफल अभिव्यक्ति इस नाटक में प्रस्तुत की गयी है। सुन्दरी, नारी सौंदर्य को आकर्षण का चरम बिंदु मानती है और सौंदर्य के अंह से ग्रस्त है। नंद अपनी अनिद्य सुंदरी पत्नी के प्रति आकृष्ट है, किन्तु वह बौद्ध धर्म के पति भी आकृष्ट है। अन्तत: जब नंद बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर मृण्डित मस्तक लिए हुए घर आता है तो उस सौंदर्य गर्विता ‘सुन्दरी’ का अहं चूर-चूर हो जाता है। इस नाटक में चित्रित नन्द का व्यक्तित्व आधुनिक भावबोध से युक्त संशयशील मानव का प्रतीक है, जो अनिर्णय की स्थिति में रहने के लिए विवश है।

‘आधे-अधूरे’ मध्यमवर्गीय जीवन की विडम्बना को प्रस्तुत करने वाला एक सशक्त नाटक है। नायक ‘महेद्रनाथ’ अपने अधूरेपन को भरने के लिए विवाह करता है, परंतु नायिका ‘सावित्री’ जिस पूर्ण पुरुष की तलाश में है, वह महेन्द्रनाथ में नहीं खोज पाती। वह जिन चार पुरुषों के सम्पर्क में आती है, सबको अधूरा ही पाती है और अन्तत: यह सोचने को बाध्य हो जाती है- ‘सबके सब एक-से हैं।’

मोहन राकेश के नाटकों का शिल्प बेजोड़ है। रंगमंच की दृष्टि से ये पूर्ण सफल नाटक हैं। संवाद, भाषा, प्रस्तुतीकरण, दृश्य संकेत, रंग निर्देश, छाया प्रकाश, आदि सभी दृष्टियों से वे रंगमंच पर सफलतापूर्वक अभिनीत किए जाने योग्य हैं।

विनोद रस्तोगी ने नए हाथ, बर्फ की दीवार में नवीन मान्यताओं का निरूपण किया है। वे एक सफल रेडियो नाटककार भी मान जाते हैं।

लक्ष्मीनारायण लाल एक बहुचर्चित नाटककार हैं। अंधा कुआं (1955), दर्पण (1963), मादा-कैक्टस (1958 ई.), सूर्यमुख (1968), मिस्टर अभिमन्यु (1971), कर्फ्यू (1972), अब्दुल्ला दीवाना, व्यक्तिगत (1975 ई.), एक सत्य हरिश्चन्द्र, सगुन पंछी और सबरंग मोह भंग (1977 ई.) उनकी प्रसिद्ध नाट्यकृतियां हैं। पूंजीवाद और भ्रष्टाचार न किस प्रकार से व्यक्ति को ‘चक्रव्युह’ में अभिमन्यु की भांति घेर रखा है, इसका चित्रण मिस्टर अभिमन्यु में हुआ है। डॉ. लाल के नाटकों में भौतिकवादी अन्धी दौड़ का चित्रण हुआ है और मानवीय जीवन की विसंगतियों का यथार्थ चित्रण हुआ है।

धर्मवीर भारती कृत ‘अन्धा युग’ (1954 ई.) आधुनिक भावबोध को प्रस्तुत करने वाला गीत-नाट्य है। व्यक्ति को वाह्य संघर्ष ही नहीं आन्तरिक संघर्ष भी झेलने पड़ते हैं और ये आन्तरिक संघर्ष अधिक भयावह होते हैं। ‘अन्धा युग’ एक सशक्त कृति है जिसमें महाभारत के पात्रों के माध्यम से आधुनिक युग के संत्रास, तनाव, कुंठा, अंतर्द्वंद्व, आवेश एवं अभिशप्त जीवन को अभिव्यक्त किया गया है।

प्रसादोत्तर काल के कुछ अन्य नाटककारों में सुरेंद्र वर्मा के सेतुवन्ध, द्रोपदी, सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, नायक खलनायक, विदूषक, आठवां सर्ग आदि विशिष्ट नाटक हैं। डॉ. शंकर शेष- बिन बाती के दीप, फन्दी बंधन अपने अपने, एक और द्रोणाचार्य। इसी तरह मणि मधुकर के रस गन्धर्व, बुलबुल तथा सराय नामक नाटक उल्लेखनीय हैं। तिलचट्टा, तेंदुआ, मरजीवा योर्स फेथफुली आदि मुद्राराक्ष के बहुचर्चित नाटक हैं।

इन नाटकों के अलावा देवयानी का कहना है तथा तीसरा हाथी (रमेश बक्षी), समय सन्दर्भ, उलझी आकृतियां तथा दरिंदे (हमीदुल्ला), शताब्दी तथा हम लोग (अमृतराय), बकरी तथा अब गरीबी हटाओ (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना), रोशनी एक नदी है तथा अपना-अपना जूता (लक्ष्मीकान्त वर्मा), प्रजा ही रहने दो तथा नरमेध (गिरिराज किशोर), नेफा की एक शाम तथा शुतुरमुर्ग (ज्ञानदेव), अपने-अपने खूंटे (गोविन्द चातक), घाटियां गूंजती हैं (शिवप्रसाद सिंह), बिना दीवार का घर (मन्‍नू भण्डारी), सुरेन्द्र वर्मा- द्रोपदी, पेपर वेट (रमेश उपाध्याय), कबिरा खड़ा बाजार में (भीष्म साहनी)।

हिंदी नाटक का विकास किस युग में हुआ?

हिंदी नाटक का विकास भारतेंदु युग में हुआ। भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के अन्य साहित्यकारों ने गद्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा नाट्य विधा पर जमकर लिखा और उन्हें आशातीत सफलता भी मिली। संस्कृत साहित्य में समृद्धि नाट्य परंपरा थी लेकिन हिंदी नाटक का विकास आधुनिक युग से ही संभव हो सका।


[1] हिंदी साहित्य का इतिहास- रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-

[2] हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास- बच्चन सिंह, पृष्ठ- 299

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