हिंदी एकांकी का उद्भव और विकास

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हिंदी एकांकी का विकास

‘एकांकी’ साहित्य की वह विधा है, जो नाटक के समान अभिनय से संबंधित है और जिसमें किसी घटना या विषय को एक अंक में प्रस्तुत किया जाता है। कुछ आलोचक नाटक के लघु रूप को एकांकी कहते हैं, किन्तु यह भ्रान्त धारणा है। दोनों विधाएं अपना स्वतन्त्र शिल्प रखती हैं। वर्तमान हिंदी में एकांकी का शिल्प पाश्चात्य एकांकियो से प्रभावित है। संस्कृत में रूपक एवं उपरूपक के जो अनेक भेद किए गए हैं, उनमें 15 भेद ‘एकांकी’ से संबंधित हैं। एक अंक वाली इन नाट्य कृतियों को वहां व्यायोग, प्रहसन, भाण, बीथी, नाटिका, ईहामृग, रासक, माणिका आदि अनेक नामों से जाना जाता रहा है, किन्तु हिंदी एकांकी का संबंध संस्कृत के उक्त एकांकियों से किसी रूप में नहीं जोड़ा जा सकता। एकांकी (One Act Play) पश्चिम में अभिनीत किए जाने वाले उन ‘नाटकों’ को कहा जाता था, जिनमें एक अंक में ही कथा समाप्त हो जाती थी। वस्तुत: इनका प्रारम्भिक रूप लघु नाटकों जैसा ही था, किन्तु कालान्तर में शिल्पगत अन्तर आने से एकांकी स्वतन्त्र विधा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

हिंदी एकांकी लेखन का सूत्रपात करने का श्रेय किस लेखक को मिलना चाहिए- यह एक विवादास्पद प्रश्न है। कुछ आलोचकों ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की एक अंक वाली नाट्य कृतियों- ‘अन्धेर नगरी’, ‘विषस्य विषमौषधम्‌’ और ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ को हिंदी के प्रारम्भिक एकांकी माना है, किन्तु यह उचित नहीं जान पड़ता, क्योंकि भारतेन्दु जी की उक्त नाट्य कृतियां संस्कृत के एक अंक वाले रूपकों- प्रहसन, भाण, वीथी आदि के अधिक समीप हैं और वर्तमान युग की ‘एकांकी कला’ पर खरी नहीं उतरतीं। भारतेन्दु कृत इन प्रहसनों में सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य किया गया है। द्विवेदीयुगीन लेखकों ने जो नाट्य कृतियां प्रस्तुत कीं, उनमें से कुछ एकांकी के अधिक निकट हैं। सियारामशरण गुप्त कृत ‘कृष्णा’, ब्रजलाल शास्त्री कृत ‘नीला’, ‘दुर्गावती’, रामसिंह वर्मा कृत ‘रेशमी रूमाल’, रूपनारायण पाण्डेय कृत ‘मूर्ख मण्डली’ एवं पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र कृत ‘चार बेचारे’ इसी श्रेणी में रखी जा सकने योग्य नाट्य रचनाएं हैं। भारतेन्दु जी की नाट्य कृतियों की  तुलना में उक्त नाट्य रचनाएं ‘एकांकी’ के अधिक करीब हैं, क्योंकि इनमें पद्म का बहिष्कार है तथा कथानक को तीव्रगति से चरम सीमा तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। ऐसा होने पर भी इन्हें हिंदी एकांकियों में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि हिंदी एकांकी के शिल्प का अभाव उक्त नाट्य रचनाओं में भी है।

डॉ. नगेन्द्र ने ‘हिंदी एकांकी’ के विकास का श्रेय जयशंकर प्रसाद को देते हुए उनकी रचना ‘एक घूंट’ (1929 ई.) को हिंदी का प्रथम एकांकी स्वीकार किया है। इस रचना में प्रणय और विवाह की समस्या को ‘एकांकी की टेक्नीक’ का निर्वाह करते हुए प्रस्तुत किया गया है, किन्तु डॉ. जगन्नाथ शर्मा इसे एकांकी न मानकर ‘संवादात्मक निवन्ध’ मानने के पक्षधर हैं। प्रसाद के  अनन्तर अन्य कई लेखकों ने मौलिक एवं अनुदित एकांकी लिखे। 1938 ई. में ‘हंस’ का एकांकी विशेषांक प्रकाशित हुआ, जिसमें  हिंदी लेखकों को एकांकी कला के संबंध में अनेक जानकारियां प्राप्त हुई तथा नए तथ्यों का बोध हुआ।

डॉ. हरिश्चद्र वर्मा के अनुसार “हिंदी में एकांकी परम्परा को विकसित करने का श्रेय डॉ. रामकुमार वर्मा को दिया जाना चाहिए। उनका पहला एकांकी ‘बादल को मृत्यु’ 1930 ई. में प्रकाशित हुआ था।” वर्मा जी तब से निरन्तर सफल एकांकियों की रचना करते रहे हैं। इसी क्रम में भुवनेश्वर के एकांकी संग्रह ‘कारवां’ का उल्लेख करना भी आवश्यक है। यह एकांकी संग्रह 1935 ई. में प्रकाशित हुआ था और इसमें 5 एकांकी संकलित थे- श्यामा, एक साम्यहीन साम्यवादी, तान, प्रतिमा का विवाह और लाटरी। भुवनेश्वर जी के एकांकियों का विषय प्रेम का त्रिकोण है। इनमें उन्होंने अपने आसपास की जिन्दगी को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है तथा पात्र जीवन के यथार्थ प्रश्नों से जूझते दिखाई पड़ते हैं। शिल्प की दृष्टि से भी ये एकांकी उल्लेखनीय हैं। कथानक को तीव्रगति से चरम सीमा तक पहुंचाना, संकलन त्रय का निर्वाह करना एवं उक्ति वैचित्र्यपूर्ण व्यंजना प्रधान मापन के कारण भुवनेश्वर जी आधुनिक एकांकीकारों में विशेष महत्वपूर्ण बन गए हैं।

डॉ. रामकुमार वर्मा कृत ‘बादल की मृत्यु’ हिंदी का पहला एकांकी है, जिसमें कल्पना एवं काव्यात्मकता की प्रधानता है। वर्मा जी के अनेक एकांकी संग्रह बाद में प्रकाशित हुए, जिनमें उल्लेखनीय हैं- पृथ्वीराज की आंखें, रेशमी टाई, चारुमित्रा, विभूति, सप्त किरण, रूपरंग, कौमदी महोत्सव, ऋतुराज, रजत रश्मि, दीपदान, कामकन्दला, बापू, इन्द्रधनुष और रिमझिम, पांच जन्म, मयूरपंख, जूही के फूल।

डॉ. वर्मा ने ऐतिहासिक एवं समस्यामूलक एकांकियों की रचना की है। उनके एकांकियों का मूल स्वर आदर्शवादी है। उनके ऐतिहासिक एकांकियों में भारतीय आदर्श की झलक है। प्रेम, सेवा, उदारता, त्याग और बलिदान की भावनाओं से ओत-प्रोत इन ऐतिहासिक एकांकियों में भारत के अतीत गौरव को प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीयता की भावना जगाने का प्रयास किया गया है। समस्यामूलक एकांकियों में वर्माजी ने शिक्षित मध्यमवर्गीय दम्पतियों की अनेक समस्याओं- प्रेम, सैक्स, सन्देह, दम्भ आदि को कथानक का विषय बनाया है, किंतु उनकी परिणति आदर्श में ही हुई है, क्योंकि उनके एकांकियों की नायिकायें यथा- रेशमी टाई की ‘ललिता’, 18 जुलाई की शाम की ‘उषा’ और एक्ट्रेस की ‘प्रभातकुमारी’ अन्ततः अपने पति के सम्मान की रक्षा करती हुए दिखाई पड़ती हैं। अतिशय आदर्शवादिता के कारण वर्माजी के एकांकी यथार्थ से दूर हो गए जान पढ़ते हैं, किन्तु एकांकी शिल्प की दृष्टि से वे हिंदी के युग-प्रवर्तक एकांकी माने जा सकते हैं। आरम्भ, कुतूहल, संकलन त्रय, चरम सीमा आदि तत्व उनके एकांकियों में बड़ी सूक्ष्मता से अनुस्यूत किए गए हैं। वर्मा जी की एकांकी रंगमंचीयता एवं अभिनेयता के गुणों से भी संपन्न हैं तथा उसमें सरसता के साथ-साथ शिल्प की प्रौढ़ताभी विद्यमान है। वस्तुतः एकांकी कला को चरम यौवन पर पहुंचाने का श्रेय डॉ. रामकुमार को ही दिया जा सकता है।

डॉ. वर्मा के अतिरिक्त इस काल के प्रमुख एकांकीकारों में भुवनेश्वर प्रसाद मिश्र, सेठ गोविंददास, उदयशंकर भट्ट, उपेंद्रनाथ अश्क, विष्णु प्रभाकर, जगदीश चंद्र माथुर, लक्ष्मी नारायण मिश्र, सद्‌गुरुशरण अवस्थी, चंद्रगुप्त विद्यालंकार आदि उल्लेखनीय हैं। भुवनेश्वर प्रसाद मिश्र का ‘कारवां’ एकांकी संग्रह 1936 ई. में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह के एकांकियों पर अंग्रेजी नाटककार ‘इब्सन’ और ‘शा’ का प्रभाव रहा है। यथा ‘शैतान’ एकांकी पर ‘शा’ की छाया रही है। अनके अन्य एकांकियों में प्रमुख हैं- मृत्यु, स्ट्राइक, रोशनी और आग, सींकों की गाड़ी, रहस्य-रोमांच, आदमखोर, बॉबे की कीड़े, इतिहास की केंचुल आदि। भुवनेश्वर के एकांकियों में सामाजिक समस्याओं, यौन समस्याओं एवं अन्य दाम्पत्य समस्याओं को उभारा गया है। व्यंग्य का पुट भी उनके एकांकियों में दिखाई पड़ता है।

उदयशंकर भट्ट के एकांकी संकलनों में प्रमुख हैं- ‘अभिनव एकांकी’, ‘चार एकांकी’, पर्दे के पीछे, धूमशिखा, आज का आदमी, स्त्री का हृदय, समस्या का अन्त, अन्धकार और प्रकाश आदि। उनके एकांकियों में विषय वैविध्य दिखाई पड़ता है। ज्ञान बहुलता के साथ-साथ जीवन के बाद आगामी अंगों का सांगोपांग विश्लेषण करने की प्रवृत्ति भी एकांकियों में दिखाई पड़ती है। मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग की विडम्बनाओं पर उन्होंने प्रहार किया है और मध्यम वर्ग के मुखौटों को उतारने का प्रयास किया है। ‘पर्दे के पीछे’ नामक एकांकी में उन्होंने बताया है कि किस प्रकार लोग स्वतन्त्रता के बाद भी पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति को अपनाकर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के प्रति अनास्था व्यक्त कर रहे हैं। ‘आदिम युग’ ‘वैवस्वत मनु’ उनके पौराणिक एकांकी हैं। भट्ट जी को रूढ़िवादिता किसी भी रूप में स्वीकार नहीं है। उनकी एकांकी कला का चयन वैभव बाबू जी, मायोपिया, गृहदशा, पर्दे के पीछे आदि में दिखाई पड़ता है। वे आकाशवाणी से भी सम्बद्ध रहे हैं और कई सफल रेडियो रूपकों की रचना कर चुके हैं। गांधी जी का रामराज्य, एकला चलो रे, मेघदूत, वन महोत्सव, मदन दहन, अमर अर्चना उनके प्रसिद्ध रेडियो रूपक हैं।

हिंदी एकांकीकारों में उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपने एकांकियों की विषय-वस्तु जीवन के विविध क्षेत्रों से चुनी है। लक्ष्मी का स्वागत, सूखी डाली उनके पारिवारिक जीवन से संबंधित एकांकी हैं तो ‘अधिकार का रक्षक’ उनका व्यंग्य प्रधान एकांकी है, जिसमें आधुनिक नेताओं की प्रवृत्ति का पर्दाफाश किया गया है। मध्यवगीय समाज की समस्याओं, रूढ़ियों एवं कमजोरियों का यथार्थ चित्रण करने में वे अति कुशल कहे जा सकते हैं। ‘जोंक’ एकांकी में उन्होंने ऐसे निर्लज्ज लोगों को अपनी विषय वस्तु बनाया है जो जोंक की तरह दूसरों का खून चूसते रहते हैं। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की संघर्ष गाथा एवं मानसिकता के अन्तर को उन्होंने ‘सूखी डाली’ में चित्रित किया है। उनके अन्य प्रसिद्ध एकांकी है- चरवाहे, खिड़की, चिल्मन, देवताओं की छाया में, अन्धी गली, मेंमना, चमत्कार आदि। वे रंगमंच से भी जुड़े रहे। अतः उनके एकांकी अभिनेयता एवं रंगमंचीयता की दृष्टि से भी पूर्ण सफल रहे हैं।

सेठ गोविन्ददास ने ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सामयिक विषयों पर एकांकियों की रचना की है। उनके प्रमुख एकांकी हैं- नानक की नमाज, तेग बहादुर की भविष्यवाणी, स्पर्द्धा, मानव मन, मैत्री, कृषि यज्ञ, बुद्ध की एक शिष्या आदि। उनका दृष्टिकोण आदर्शवादी एवं सुधारवादी है। यही कारण है कि उनके एकांकियों में कला की सूक्ष्मता के स्थान पर विचारों की गहनता अधिक है। उनकी शैली रोचक एवं सरल रही है।

जगदीशचन्द्र माधुर के एकांकियों का हिंदी एकांकियों में गौरवपूर्ण स्थान है। उन्होंने सामाजिक समस्याओं को अपना विषय बनाकर कलात्मक एकांकियों की रचना की है। उनमें एकांगी प्रेम भावना है, जिनमें समस्याओं को प्रस्तुत करते हुए उनके समाधान देने का भी प्रयास किया गया है। भोर का तारा, कबूतरखाना, मकड़ी का जाला, घोंसले, ओ मेरे सपने, खण्डहर, खिड़की की राह, भाषण आदि उनके प्रसिद्ध एकांकी हैं। उनके एकांकियों में सामाजिक विषमाताओं , बाह्य आडम्बरों एवं दुर्बल नैतिक मान्यताओं पर भी प्रहार किया गया है। उनके सभी एकांकी रंगमंच की दृष्टि से सफल कहे जा सकते हैं। माथुर जी एकांकियों में विचार और अनुभूति, कला और मनोरंजन का सुन्दर समन्वय किया गया है।

गणेशप्रसाद द्विवेदी भुवनेश्वर की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले एकांकीकार हैं। इनके एकांकियों पर भी अंग्रेजी साहित्य का पर्याप्त प्रभाव परिलक्षित होता है। द्विवेदी जी द्वारा लिखे गए प्रमुख एकांकी हैं- सोहाग विन्दी, शर्माजी, कामरेड, गोष्ठी, परीक्षा, रिहर्सल, धरती माता, रपट आदि। इनके एकांकियों में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं- यौन आकर्षण, अनमेल विवाह, प्रेम वैषम्य आदि को विषय-वस्तु बनाया गया है। इन एकांकियों में पात्रों की मानसिक जटिलता का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी किया गया है।

गिरिजाकुमार माथुर ने कविता के साथ-साथ एकांकियों की रचना भी की है। विषय की दृष्टि से उनके एकांकी ऐतिहासिक, प्रतीकात्मक एवं सांस्कृतिक वर्गों में रखे जा सकते हैं। विक्रमादित्य, विषपान, वासवदत्ता आदि ऐतिहासिक एकांकी हैं तो रस की जीत, शान्ति विश्वदेवा को प्रततीकात्मक वर्ग में  रखा जा सकता है। इसी प्रकार कुमारसम्भव, मेघ की छाया, ‘माथुर’ जी द्वारा रचित सांस्कृतिक एकांकी हैं। वे रेडियो रूपको के भी सफल रचनाकार हैं।

सदगुरुशरण अवस्थी ने आदर्शवादी एवं नैतिकतावादी एकांकियों की रचना की है और पौराणिक कथानकों को इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एकांकियों की विषय वस्तु बनाया है। पौराणिक पात्रों को आधार बनाकर लिखे गए उनके कुछ प्रसिद्ध एकांकी हैं- सुदामा, कैकेयी, शम्बूक। उन्होंने इन पात्रों की व्याख्या आधुनिक दृष्टिकोण से नवीन परिप्रेक्ष्य में की है।

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार के एकांकियों में आधुनिक युग की विभिन्‍न समस्याओं को एकांकी की विषय-वस्तु बनाकर प्रस्तुत किया गया है। मनुष्य की कीमत, तांगेवाला, भेड़िए, हिंदुस्तान जाकर कहना, नवप्रभात आदि उनके प्रमुख एकांकी हैं। विषय-वस्तु एवं शिल्प दोनों ही दृष्टियों से चंद्रगुप्त विद्यालंकार जी का हिंदी एकांकी क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।

चतुरसेन शास्त्री ने हिंदी कथा साहित्य की श्रीवृद्धि करने के साथ-साथ एकांकीकारों में भी महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। उन्होंने प्रायः ऐतिहासिक घटनाओं को अपने एकांकियों की कथावस्तु बनाया है। पन्‍नाधाय, हाड़ारानी में उन्होंने इतिहाम के उज्ज्वल पक्ष को प्रस्तुत करते हुए त्याग एवं बलिदान के महत्व को प्रतिपादित किया है। हरिकृष्ण प्रेमी ने भी देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत ऐतिहासिक एकांकियों की रचना की है। मालव प्रेम, मान का मन्दिर, मातृ मन्दिर उनके प्रमुख एकांकी हैं। वे इतिहास के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने के लिए प्रयासरत दिखाई पड़ते हैं।

हिंदी एकांकी विधा में हुए इस क्रमिक विकास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदी एकांकी का प्रादुर्भाव उस काल में हुआ, जब अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए स्वतन्त्रता आन्दोलन तेज हो गया था। सारे देश में राष्ट्रप्रेम, अतीत गौरव एवं देशभक्ति की भावनाएं विद्यमान थीं। साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत किया जा रहा था। हिंदी एकांकीकारों ने ऐसे समय ऐतिहासिक एकांकियों की रचना करके स्वतन्त्रता, स्वाभिमान, जातीय गौरव का पाठ पढ़ाया। रामकुमार वर्मा, जगदीश चन्द्र माथुर, हरिकृष्ण प्रेमी, डॉ. सत्येद्र की एकांकी रचनाएं इस कथन के समर्थन हेतु उदाहरण रूप में प्रस्तुत की जा सकती हैं।

एकांकीकारों का दूसरा वर्ग समाज सुधार, नैतिकता, उपदेशात्मकता पर बल देते हुए एकांकी प्रस्तुत करने में लगा रहा। सामाजिक एवं वैयक्तिक समस्याओं को केन्द्र बनाकर अनेक समस्‍यात्मक एकांकी इस काल में लिखे गए। अछूतोद्धार, साम्प्रदायिक सदभावना आदि को केन्द्र में रखकर सेठ गोविंद दास जैसे एकांकीकारों ने अनेक एकांकियों की रचना की। कुछ अन्य एकांकीकारों ने स्वार्थी राजनीतिज्ञों, धर्म के ठेकेदारों एवं पदलोलुपों की प्रवृत्ति को अपने एकांकियों के माध्यम से उजागर किया। पीढ़ीगत संघर्ष, वैचारिक मतभेद, दाम्पत्य संबंध, यौनाकर्षण, मजदूर आन्दोलन, बिखरते संयुक्त परिवार भी अनेक एकांकियों की विषय-वस्तु इस काल के एकांकीकारों ने बनाया है।

आरंभ में लिखे गए एकांकी जहां शिल्प की दृष्टि से प्रौढ़ हैं, वहीं बाद में लिखे गए एकांकी शिल्प की दृष्टि से प्रौढ़ होते गए हैं। कथ्य एवं शिल्प दोनों में ही सूक्ष्मता आती गई है। रंगमंचीयता एवं अभिनेयता का ध्यान बाद में रखा जाने लगा।

आधुनिक काल में लिखे गए एकांकियों में युगीन परिवेश की झलक दिखाई पड़ती है। स्वतन्त्रता के उपरान्त जनता को मोह भंग हुआ है। स्वार्थ राजनीतिज्ञों एवं भ्रष्टाचारी व्यवस्था राज्य के सपनों को चकनाचूर कर दिया। पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के निरन्तर बढ़ते प्रभाव ने जातीय संस्कारों एवं भारतीय संस्कृति की कब्र खोदने का काम किया। एकांकीकारों ने इन सब बातों को अपनी विषय-वस्तु बनाकर एकांकी प्रस्तुत किया। कुण्ठा, संघर्ष, मानवीय संवेदनाओं की शून्यता, कोरी भावुकता एवं भावात्मक सम्बन्धों का हास भी अनेक एकांकियों का विषय-वस्तु बना है।

आधुनिक चेतना से सम्पृक्त इन एकांकीकारों में प्रमुख रूप से डॉ. जयनाथ नलिन, विष्णु प्रभाकर, डॉ. रक्ष्मीनारायण लाल, विनोद रस्तोगी, सत्येन्द्र शरत, मोहन राकेश, लक्ष्मीकान्त,  मुद्राराक्षस, चिरंजीत, के.पी. सक्सेना, रेवतीशरण शर्मा, मणि मधुकर, मृदुला गर्ग आदि।

जयनाथ नलिन के चार एकांकी संग्रह प्रकाशित हुए हैं- हांथी के दांत, नवाबी सनक, दृश्य-नए पुराने और राग-बदरंग। ‘हाथी के दांत’ नामक संग्रह में संवेदना एवं शिल्प का चरम उत्कर्ष है। प्रतीकात्मक पात्रों की योजना करके एकांकीकार ने संवादों एवं सन्दर्भों को गम्भीर व्यंजना प्रदान है। ‘नबाबी सनक’ में संकलित एकांकी हास्य-व्यंग से परिपूर्ण है। उनके एकांकियों में सामाजिक जीवन की विद्रुपताएं, जीवन मूल्यों का ह्रास और शिक्षा जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार का भी उजागर किया गया है।

हिंदी के जिन एकांकीकारों को प्रथम पंक्ति में स्थान दिया जाता है, उनमें से एक हैं- विष्णु प्रभाकर। उन्होंने इस विधा को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पाप, हत्या के बाद, मैं दोषी हूं, एक औरत: एक मां, प्रतिशोध, बंटवारा, नया समाज, भगवान, आंचल और आंसू, सरकारी नौकरी, सांवले आदि उनके प्रसिद्ध एकांकी है। इन एकांकियों की विषय-वस्तु में वैविध्य है। समाज, राजनीति, व्यक्ति, मनोविज्ञान आदि को उन्होंने अपने एकांकी की विषय-वस्तु ,में अनुस्यूत किया है। रंगमंचीयता का पूरा-पूरा ध्यान उनके  एकांकियों में रखा गया है।

डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल का नाम हिंदी एकांकी लेखकों में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। ताजमहल के आंसू, पर्वत के पीछे, नाटक बहुरंगी नाटक वहुरूपी आदि उनके प्रसिद्ध संकलन हैं। उनके कुछ एकांकियों की कथावस्तु इतिहास से ली गई है तो कुछ एकांकी सामाजिक समस्याओं एवं वैयक्तिक समस्याओं के समाधान हेतु लिखे गए हैं। उनके एकांकियों में कथानक सुगठित एवं सुसम्बद्ध है। संवाद संक्षिप्त, चुस्त एवं गठे हुए हैं। उनके कथानकों में सहज गति है। शिल्प की दृष्टि से वे एक सफल एकांकीकार माने जाते हैं।

विनोद रस्तोगी एक सफल रेडियो रूपककार एवं एकांकीकार के रूप में माने जाते हैं। बहू की विदा, पुरुष और पाप, निर्माण का देवता, कसम कुरान की आदि उनके प्रमुख संकलन हैं। दाग्पत्य जीवन की विषमताओं, शिक्षित युवकों का नौकरी पाने के लिए किया जाने वाला संघर्ष, रिश्वत की समस्या आदि उनके एकांकियों का विषय बने हैं। कमम कुरान की उनका ऐतिहासिक एकांकी है। वे रंगमंच एवं रेडियो दोनों विधाओं से जुड़े रहे हैं। अतः उनके एकांकियों का शिल्प भी बेजोड़ है।

एकांकी एक ऐसी विधा है, जिसका निरन्तर विकास हो रहा है। आधुनिक संचार माध्यमों में क्रान्ति आ जाने से एकांकी के स्वरूप में परिवर्तन हुआ है। अब रेडियो और टी.वी. के लिए भी एकांकी रिखे जा रहे हैं। रेडियो एकांकियों में विषय वस्तु का प्रस्तुतीकरण ध्वनि के माध्यम से किया जाता है। आज हिंदी में उच्च स्तर के रेडियो रूपक प्रतियोगितातमक स्पर्धा के कारण लिखे जा रहे हैं। संक्षेप में, हिंदी एकांकी विकास पथ पर अग्रसर है और उसके विकास की पर्याप्त सम्भावनाएं, दिखाई दे रही हैं। विषय-वस्तु की व्यापकता, वैचारिकिता एवं शैलीगत विविधता के कारण हिंदी एकांकी लोकप्रिय विधा के रूप में विकसित हुआ है।

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