हिन्दी आचार्यों एवं समीक्षकों की रस विषयक दृष्टि

2
1792
hindi-aacharyon-ki-ras-drishti
हिन्दी आचार्यों की रस विषयक दृष्टि

हिन्दी आचार्यों की रस विषयक दृष्टि

हिन्दी के रीतिकालीन आचार्यों की रस-दृष्टि संस्कृत आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट रस-सिद्धान्त पर ही आधारित है। वे अभिनव गुप्त, मम्मट, विश्वनाथ आदि आचार्यों से विशेष रूप से प्रभावित है। इनके यहाँ कोई मौलिक चिंतन नहीं दिखाई देता।

आधुनिक हिन्दी समीक्षकों में रामचन्द्र शुक्ल ने व्यापक रूप से रस-सिद्धान्त की मीमांसा किया है। उन्होंने ‘रस मीमांसा’ तथा ‘चिन्तामणि’ (भाग 1 – 2) में रस की चर्चा करते हुए रस को आधुनिक संदर्भों, में शब्द-भेद के द्वारा नये लक्षण दिए हैं-

§  ‘हृदय की अनुभूति ही साहित्य में रस और भाव कहलाती है।’

§  ‘जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है।’

§  ‘लोक हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशा है।’

§  ‘हृदय के प्रभावित होने का नाम ही रसानुभूति है।’

§  शुक्ल जी रसानुभूति को लौकिक मानते हैं।

§  शुक्ल जी ने रस को काव्य की आत्मा माना है।

§  आचार्य शुक्ल ने विरोध और अविरोध के आधार पर संचारियों के चार वर्ग किए हैं- सुखात्मक, दुखातमक, उभयात्मक और उदासीन

श्यामसुन्दर दास ने ‘साहित्यलोचन’ तथा ‘रूपक-रहस्य’ में रस-सिद्धान्त का विवेचन किया है। उनकी प्रमुख स्थापनाएं निम्न हैं-

§  वे रस की अभिव्यक्ति को भावों से मानते हैं।

§  ‘इन्हीं भावों के उद्दीप्त और उद्बुद्व होने पर रस की निष्पत्ति होती है।’

§  ‘रस का मूल आधार स्थायी भाव हैं और विभाव, अनुभाव और संचारी भाव, स्थायी भाव को रस की अवस्था तक पहुचाने में सहायक हैं।’

गुलाब राय ने ‘सिद्वांत और अध्यन’ में काव्य का मुख्य उद्देश्य आनंद को माना हैं। गुलाब जी की दृष्टि में रस आनंद रूप है, इसीलिए वे भी ‘काव्य की आत्मा’ रस को मानते हैं।

इसे भी पढ़ सकते हैं-
भारतीय काव्यशास्त्र के प्रमुख आचार्य एवं उनके ग्रंथ कालक्रमानुसार
रस सिद्धांत | भरत मुनि का रस सूत्र और उसके प्रमुख व्याख्याकार
मूल रस | सुखात्मक और दुखात्मक रस | विरोधी रस
रस का स्वरूप और प्रमुख अंग
साधारणीकरण
लिंक

नंदुलारे वाजपेयी के अनुसार “काव्य तो प्रकृत मानव अनुभूतियों का, नैसर्गिक कल्पना के सहारे, ऐसा सौन्दर्यमय चित्रण है, जो मनुष्य मात्र में स्वभावत: अनुरूप भावोच्छवास् और सौन्दर्य-संवेदन उत्पन्न करता है। इसी सौन्दर्य-संवेदन को भारतीय परिभाषिक शब्दावली में रस कहते हैं।”

लक्ष्मीनारायण सुधांशु ने ‘काव्य में अभिव्यंजनावाद’ में काव्यानुभूति की स्थिति कलाकार में और रसानुभूति की स्थिति श्रोता में माना है।
नगेन्द्र के अनुसार “साहित्य का चरम मान रस ही है”

आधुनिक काल में रस विवेचन संबंधी प्रमुख ग्रंथ

लेखकग्रंथ
कन्हैयालाल पोद्दाररसमंजरी
गुलाब रायनवरस
रामदहिन मिश्रकाव्यदर्पण
राममूर्ति त्रिपाठीरस-विमर्श
रामचंद्र शुक्लरस-मीमांसा
नगेन्द्ररस-सिद्धांत
आधुनिक काल के रस विवेचन संबंधी ग्रंथ
Previous articleसाधारणीकरण सिद्धान्त | saadhaaraneekaran sidhant
Next articleरीतिकालीन प्रबंध एवं मुक्तक काव्य तथा अलंकार, छंद, रस एवं काव्यांग निरूपक ग्रंथ

Comments are closed.