हैदराबादी हिंदी:
हैदराबादी हिंदी भारत के तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद और आंध्रप्रदेश की राजधानी अमरावती में बोली जाने वाली एक बोलचाल की भाषा है। इसका प्रयोग मंडी, बाजार और व्यापार की भाषा के रूप में अधिक होता है। यह भाषा हिंदी के विभिन्न रूपों से थोड़ी भिन्न है। यह भाषा वहाँ के मूल निवासियों और प्रवासी लोगों द्वारा बोलचाल के रूप में प्रयोग की जाती है। लेकिन किसी की भी मातृभाषा नहीं है।
हैदराबाद में दकनी हिंदी का आविर्भाव कुछ सदियों पहले हुआ। उर्दू के प्रचलन के साथ उसका रूप बदलता रहा। हैदराबादी हिंदी को इसी दकनी की उत्तरी किस्म माना जाता है। परंतु पुरानी दकनी और वर्तमान हैदराबादी हिंदी में बहुत अंतर है। क्योंकि यह आधुनिक बोलचाल की मानक भाषा हिंदी-उर्दू के अधिक निकट है। इस प्रकार दक्कनी के वर्तमान रूप को ‘हैदराबादी हिंदी’ कहा जा सकता है।
जब मुहम्मद तुगलक ने 14वीं शताब्दी में दिल्ली की जगह दौलताबाद को अपनी राजधानी बनाया तो उसके साथ दिल्ली के आस-पास रहने वाले व्यापारी, सिपाही आदि भी बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर तथा आस-पास के क्षेत्रों में जाकर बस गए। जिसका परिणाम यह हुआ कि वहाँ की स्थानीय भाषा तथा खाड़ी बोली और उर्दू मिश्रित एक नयी भाषा दक्कनी का प्रदुभाव हुआ। दिल्ली से ब्रजभाषा, अवधी, हरियाणवी, अरबी, फारसी और पंजाबी भाषी लोग भी गए थे इसलिए इनका भी प्रभाव दक्कनी पर पड़ा। चूँकि यह क्षेत्र मराठी, तेलुगु और कन्नड़ भाषाओं से घिरा हुआ था इसीलिए बोलचाल की दक्कनी के कई रूप मिलते हैं। मुसलमान शासकों के संरक्षण में यह भाषा काफी फली-फूली। जो वर्तमान में हैदराबादी हिंदी कहलाती है।
‘हैदराबादी हिंदी’ और कुछ नहीं बल्कि तेलुगू, हिंदी और उर्दू आदि को मिलाकर बोली जाने वाली एक भाषा है जिसे हैदराबादी हिंदी के नाम से जाना जाता है। हैदराबादी हिंदी की विशेषता यह है कि इसमें आमतौर पर दकनी, तेलुगू, मराठी, हिंदी और उर्दू के शब्दों का प्रयोग होता है। इसमें अंग्रेजी और कन्नड़ से आयातित शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है। ‘हौला’ (पागल/मूर्ख), ‘हौ’ (हाँ) जैसे शब्द मराठी, कन्नड़ और तेलुगु से आयातित हैं, जिन्हें सदियों पहले खड़ी बोली, फ़ारसी और देहलवी (पुरानी उर्दू) के साथ मिलाकर दक्कनी बनाया गया था।
1. दकनी शब्द:
दकनी से जुड़ी होने के कारण हैदराबादी हिंदी में पुरानी भाषा के शब्द आधारभूत शब्दावली के रूप में प्रयुक्त होते हैं; जैसे- मौज (केला), दीदे (आँखें), हौला (पागल), कल्ले (गा्ल) तथा अन्य मुहावरे- दीदे मटकाना (अरबी), दीदे निकालना (फारसी) आदि हैं।
2. तेलुगु शब्द:
तेलुगु से आए शब्द हैं- तांबेल (कछुआ), जुट्टू (चोटी), पोट्टा (लड़का), पोट्टी (लड़की), पातरनी (तितली), कुप्पा (ढेर), गंपा (टोकरा), दोब्बा (मोटा), बंडी (गाड़ियों के लिए) आदि।
3. मराठी शब्द:
मराठी से आए शब्द हैं- सपोटा (चीकू), चुपके (अकारण), कमती (कम), जास्ती (ज्यादा), घट्ट (गाढ़ा), हौ (हाँ), नक्को / नको (नहीं), झाड़ (पेड़) आदि।
4. उर्दू शब्द:
उर्दू से आए शब्द हैं- रोंज (प्रतिदिन), दीदे (आँखे), गोश्त (मांस), शोरबा (रसा), बोटी (आंत के टुकड़े) आदि।
haidarabadi hindi का उपयोग आमतौर पर दैनिक जीवन में बातचीत के रूप में किया जाता है, और यह वहाँ के स्थानीय लोगों के बीच बोली जाती है। यह भाषा हैदराबाद के लोगों के बीच के साथ-साथ संगठनों, सामाजिक समुदायों, और उनके दैनिक जीवन के हिस्से के रूप में प्रमुख भाषा है, और यह उनकी स्थानीय पहचान का हिस्सा होती है।
हैदराबादी हिंदी की विशेषताएँ:
हैदराबादी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- ‘ह’ ध्वनि मध्य और शब्दांत में लुप्त हो जाती है; जैसे- उन्होंने- उनो, कहते- कते, इन्हें- इनो, नहीं- नई आदि।
- उर्दू भाषियों में ‘क’ की जगह ‘ख’ का प्रयोग मिलता है; जैसे- करीब- खरीब, कासिम- खासिम, कसम- खसम, मुकाम- मुखाम, रकम- रखम आदि।
- इसमें ऋ, ड़, ढ़ का उच्चारण नहीं मिलता है।
- ‘त’ को द्वित्त्व करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है; जैसे- इतना- इत्ता, इत्ते; कितना- कित्ता, कित्ते; उतना- उत्ता, उत्ते आदि।
- हैदराबादी हिंदी में ‘ट’, ‘प’ और ‘झ’ की जगह क्रमशः ‘त’, ‘फ’ और ‘ज’ में परिवर्तन करने की प्रवृत्ति है; जैसे- टुकड़ा- तुकड़ा, पत्थर- फत्तर, झगड़ा- जगड़ा आदि।
- अकारांत शब्दों में ‘आँ’ प्रत्यय जोड़कर बहुवचन बनाया जाता है; जैसे- आम- आमाँ, बात- बाताँ, लोग- लोगाँ, बाल- बालाँ, औरत- औरताँ, किताब- किताबाँ, कागज- कागजाँ, रेल- रेलाँ, बस- बसाँ आदि।
- अंग्रेजी के शब्दों में भी ‘आँ’ प्रत्यय जोड़कर बहुवचन बनाया जाता है; जैसे- पेन- पेनाँ, टिकट- टिकटाँ, रेल- रेलाँ, चाकू- चाकूआँ आदि।
- किसी शब्द को बहुवचन बनाने के लिए ‘लोगाँ’ जोड़ दिया जाता है; जैसे- हम लोगाँ, तुम लोगाँ, इन लोगाँ, उन लोगाँ आदि।
- आकारांत की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है; जैसे- बातचीता करता जंगल को निकाला।, मोहल्ले के लोगाँ बातें करते।, आमा के बांगा में बड़ा-बड़ा झाडां।
- ऊकारांत शब्दों में भी ‘आँ’ प्रत्यय लगता है; जैसे- चाकू- चाकुआँ, लड्डू- लड्डुआँ, जोरू- जोरुआँ आदि।
- मैं, हम, तू, तुम सर्वनाम की जगह क्रमशः मेरे, हमारे, तेरे, तुम्हारे सर्वनाम का प्रयोग चलता है। इसी तरह वह, वे, ये सर्वनाम की जगह वो, इन/इनो, उन/उनो का रूप चलता है।
- क्रिया विशेषण यहाँ, वहाँ, कहाँ आदि के स्थान पर क्रमशः इधर, उधर, किधर का प्रयोग होता है। यद्यपि याँ (यहाँ), काँ कू (कहाँ) और जा रे का प्रयोग भी मिलता है; जैसे- बाजार कू जाना, घर कू जाना, सवेरे कू पाँच बजे कू आदि।
- हैदराबादी हिंदी में ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता; जैसे- तुम खाए क्या?
- हैदराबादी हिंदी में निपात ‘ही’ के लिए ‘च’ का प्रयोग मिलता है, जिसका स्रोत मराठी भाषा है। ऊकारांत, ओकारांत तथा ईकारांत शब्दों में ‘च’ लगता है; जैसे- परसोंच (पहले ही), नकोच (नहीं ही), उनोंच (वे ही), नईंच (नहीं ही), गलीच (गली में ही) आदि। वहीं अकारांत (ह्रस्व) शब्दों में ‘ईच’ लगता है; जैसे- इधरीच (इधर ही), निश्चलीत (निश्चय ही) आदि। आकारांत और एकारांत शब्दों में ‘इच’ लगता है; एइच (यही), सुबेइच (सुबह ही), घर मेंइच (घर में ही), इत्ताइच (इतना ही) आदि।
- ‘कि/या नहीं’ की जगह क्रिया की पुनरुक्ति होती है; जैसे- तुम रमा को देखे नहीं देखे? (देखा कि नहीं?), उनों आये नईं आये? (आये कि नहीं?), तुम जाओगे नई जाओगे? (जाओगे या नहीं?)
- बहुधा प्रश्न बिना ‘क्या’ के बनते हैं; जैसे- मेरे को लेके जाते? (मुझे ले जाओगे?), कपड़ा लाते? (कपड़ा लाओगे?)
- ‘क्या’ वाक्य के अंत में आता है; जैसे- उनों भी आते क्या? (क्या वे भी आ रहे हैं?)
हैदराबादी हिंदी के प्रमुख शब्द:
यहां कुछ सामान्य हैदराबादी शब्द दिए गए हैं जो आपको अन्य स्थानों पर नहीं मिलेंगे।
हौ- हाँ | कर रई- कर रही है |
नक्को/नईं- नहीं | तांबेल- कछुआ |
कते- कहते | मौज- केला |
पिनाना- पहनना | कित्ते लोगाँ- कितने लोग |
पिचानत- जान-पहचान | मेरी बाताँ- मेरी बात |
आतूँ- आता हूँ | मेरेकु- मेरे लिए |
कर रा- कर रहा है | तेरुकु- तुम्हारे लिए |
बोल रें- बोल रहे हो | काय कू- काहें, किसलिए |
पोट्टी- लड़की | नक्को- ऐसा मत करो |
पोट्टा- लड़का | जारौं – जा रहा हूं |
मामा- यार | अरैन- आ रहा हूँ |
हल्लू- धीमा | ये / येई बास्ते- इसलिए, इसीलिए |
हाओ – हाँ | बिगर- बिना, बगैर |
हौला- मूर्ख | खाली पीली- बिना किसी कारण के |
हैदराबादी हिंदी के उदाहरण:
- मेरे कू नईं खाना। (मुझे नहीं खाना है।)
- मैं उसको बातों से गिराएगा। (मैं उसको बातों से हरा दूँगा।)
- दीदी बीमार गिर गयी थी। (दीदी बीमार पड़ गईं।)
- दूध टूट गया। (दूध फट गया।)
- अब्बू की नींद छुट गयी। (अब्बू जग गए।)
- उसको मार लगी। (उसे चोट लगी।)
- गणेश जी को पानी में फेंकते हैं। (गणेश जी को पानी में विसर्जित किया जाता है।)
- रात कू जोरों का पानी पड़ा। (रात को जोरों से पानी गिरा।)
- मैं दुल्हे के वास्ते खाना पकाई। ( मैं दूल्हे के लिए खाना पकाई।)
- वो काम पे गया। (वह काम पर गया।)
- इन तुमको क्या लगती? (यह तुम्हारी क्या लगती है?)
- इनो क्या कि बोल रे। (ये कुछ कह रहे हैं।)
- उन बच्चा है बोल के छोड़ दिया। (छोड़ दिया कि बच्चा है।)
- मैं मेरे घर कू जा रहा। (मैं अपने घर जा रहा।)
- तुम्हारी किताब बताओ। (अपनी किताब दिखाओ।)
- कौन भी नईं करे। (किसी ने नहीं किया।)
- ये कौन भी नईं खाता। (यह कोई नहीं खा सकता/खाता।)
- क्या भी नको खाओ। (कुछ मत खाओ।)
- मैं क्या भी नईं करा। (मैंने कुछ नहीं किया)
- क्या भी नईं कर रा मैं। (मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ।)
- क्या तो भी देके जाओ। (कुछ तो दे जाओ।)
- वो क्या कि बोल रा। (पता नहीं कि वह क्या कर रहा।)
- क्या भी नईं कर रहा मैं। / क्या कि नईं करा मैं। / क्या कि कर रा मैं। (मैं कुछ नहीं कर रहा।)
- क्या भी नको खाओ। (कुछ मत खाओ।)
- मारा रा उन। (वह मार रहा है।)
- सलमाँ बाताँ करते रैती। (सलमा बात करते रहती है।)
- वो क्या कि बोलते रैता। (न मालूम वह क्या कहता है / कहता रहता है।)
- याँ एइच होता रैता। (यहाँ यही होता है।)
- इन कने फूलाँ हैं देखो। (इनके पास फूल हैं, देखो।)
- घर कूच जा रा। (घर ही जा रहा।)
- तुमारे को क्या होना? (तुम्हें क्या चाहिए?
- मेरे को एक साड़ी होना। (मुझे एक साड़ी चाहिए।)
- तुम जाना। (तुम्हें जाना चाहिए।)
- तुम नको जाओ/ तुम जाना नईं। (तुम्हें नहीं जाना चाहिए।)
- मेरो को जाना। (मुझे जाना है / जाना चाहिए।)
- तुमकू भी जाना क्या? (क्या तुम्हें जाना है।)
- क्या कि बोल नईं। (कुछ मत कह।)
- कोट पैने सो आदमी। (वह आदमी जो कोट पहने है।)
- वह आतूँ बोला। (उसने कहा था कि मैं आता हौं।)
- अम्मा मेरे को जाओ बोली। (माँ ने मुझसे कहा कि आप जाएँ।)
- मैं छोड़ दिया बच्चा है बोलके। (मैंने इसलिए छोड़ दिया था कि बच्चा है।)
- मेरे को गाने को आता। (मुझे गाना आता है।)
संदर्भ ग्रंथ:
- हैदराबादी हिंदी- वशिनी शर्मा, भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा विवेचना, 2008
- हैदराबाद की दक्खिनी हिंदी- डॉ. अनीता गांगुली, समन्वय दक्षिण, 2018