संपर्क भाषा के रूप में हिंदी | sampark bhasha hindi

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1968
sampark bhasha ke rup me hindi
संपर्क भाषा

दो भिन्न भाषा-भाषी व्यक्ति जिस भाषा में बात-चीत करते हैं और जिसे दोनों अच्छी तरह समझ सकते हैं, उसे ‘संपर्क भाषा’ कहते हैं। ‘संपर्क भाषा’ शब्द का प्रयोग अंग्रेजी के Lingua Franca के अर्थ में किया जाता है। ‘लिंग्वा फ्रेंका’ से तात्पर्य है- लोक बोली या सामान्य बोली। सम्पर्क भाषा को Link Language, सेतु-भाषा, व्यापार भाषा, सामान्य भाषा या वाहन-भाषा के नाम से भी जाना जाता है।

भोलानाथ तिवारी के शब्दों में, ‘जो भाषा अन्य लोगों से संपर्क के कम आये, उसे संपर्क भाषा कहते हैं।’ यह दो भिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच संपर्क का कार्य करता है। आपसी संपर्क के उद्देश्य से प्रयोग करने के कारण ही इसे ‘संपर्क भाषा’ कहा जाता है। जैसे- यदि कोई जर्मनी भाषा और इटैलियन भाषा के मातृभाषी आपस में बातचीत करें तो वे आमतौर पर अंग्रेज़ी का ही प्रयोग करेंगे जबकि अंग्रेज़ी उनमें से किसी की भी मातृभाषा नहीं है।

डॉ। भोलानाथ तिवारी ने संपर्क भाषा के प्रयोग क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित किया है- पहला वह भाषा जो एक राज्य (जैसे महाराष्ट्र या केरल) से दूसरे राज्य (जैसे पंजाब या बंगाल) के राजकीय पत्र-व्यवहार में काम आए। दूसरा वह भाषा जो केन्द्र और राज्यों के बीच पत्र-व्यवहारों का माध्यम हो। और तीसरा वह भाषा जिसका प्रयोग एक क्षेत्र/प्रदेश का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र/प्रदेश के व्यक्ति से अपने निजी कामों में करें।

संपर्क भाषा के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के मत

डॉ. दंगल झाल्टे के अनुसार, “अनेक भाषाओं की उपस्थिति के कारण जिस सुविधाजनक विशिष्ट-भाषा के माध्यम से व्यक्ति-व्यक्ति, राज्य-राज्य, राज्य-केंद्र तथा देश-विदेश के बीच संपर्क स्थापित किया जाता है, उसे संपर्क-भाषा (Contact of Inter Language) की संज्ञा दी जाती है।”[1]

डॉ. पूरनचंद टंडन के अनुसार, “संपर्क–भाषा से तात्पर्य उस भाषा रूप से है, जो समाज के विभिन्न वर्गों या निवासियों के बीच संपर्क के काम आती है। इस दृष्टि से भिन्न–भिन्न बोली बोलने वाले अनेक वर्गों के बीच हिंदी एक संपर्क-भाषा है और अन्य कई भारतीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलने वालों के बीच भी संपर्क-भाषा है।”[2]

डॉ. महेन्द्र सिंह राणा के अनुसार, “परस्पर अबोधगम्य भाषा या भाषाओं की उपस्थिति के कारण जिस सुविधाजनक विशिष्ट भाषा के माध्यम से दो व्यक्ति, दो राज्य, कोई राज्य और केंद्र तथा दो देश संपर्क स्थापित कर पाते हैं, उस भाषा विशेष को संपर्क–भाषा/संपर्क साधक भाषा (Contact Language or Interlink Language) कहा जा सकता है।”[3]

संपर्क भाषा की आवश्यकता और महत्व

बहुभाषा-भाषी देशों के लिए संपर्क भाषा की आवश्यकता ज्यादा होती है, उसका विशेष महत्व होता है। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिहाज से आपसी संबंध बनाये रखने और भावनात्मक रूप में जुड़े रहने के लिए संपर्क भाषा जरूरी होता है। इसीलिए एक राष्ट्र और एक भाषा की बात होती रहती है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि दूसरी भाषाओं को पीछे धकेल दिया जाए। कई बहुभाषा-भाषी देशों में एक से अधिक भाषाएँ संपर्क भाषा के रूप में व्यवहार में लायी जाती हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत ही है जहाँ पर हिंदी के साथ–साथ अंग्रेजी भी संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त हो रही है।

संपर्क भाषा का महत्व इसलिए भी है की कोई व्यक्ति देश के किसी भी भाग में जा कर घूम सकता है, बस सकता है, उसके जीवन में कभी भी भाषा समस्या बनकर नहीं खड़ी होगी। देश के किसी भी कोने में व्यापार और रोजगार के लिए जा सकता है, लोगों से बात कर सकता है। दो भिन्न भाषा-भाषी राज्यों के लोग तब तक एक-दूसरे से संपर्क नहीं कर सकते, जब तक कि उनके बीच एक भाषाई माध्यम उपलब्ध न हो। कहना न होगा की यह माध्यम संपर्क भाषा के द्वारा ही उपलब्ध हो सकता है।

जिन देशों में बहुभाषिकता की स्थिति नहीं है, वहाँ पर संपर्क भाषा की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु बहुभाषिक संस्कृति वाले देशों में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता पड़ती ही है, जो अनेक भाषाओं के बीच संपर्क सेतु का काम करे। ऐसी भाषा जो व्यापक स्तर पर प्रचलित हो, जिसे अधिक से अधिक लोग समझते और बोलते हों। जैसे- पूर्व सोवियत संघ (अविभाजित रूस) जहाँ लगभग 66 भाषाएँ बोली जाती थीं परन्तु संपर्क-भाषा रूसी ही थी।

संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का स्वरूप व विकास

बहुभाषिकता की दृष्टि से भारत संभवत: विश्व भर में सर्वाधिक विविधताओं वाला देश है। सौकड़ों भाषाएँ यहाँ बोली जाती हैं। आदिकाल से ही हिंदी संपर्क-भाषा की भूमिका का निर्वाह करती रही है। डॉ। सूर्य प्रसाद दीक्षित के अनुसार, “हिंदी साहित्य का आरम्भ करने वाले सिद्धों, जैनियों और नाथपंथी योगियों ने आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक समस्त भारत में घूम-घूम कर ऐसी संपर्क भाषा का विकास किया, जिसमें भारत के सभी भाषाओं के बहुप्रचलित शब्दों के लिए प्रवेश द्वार खुला हुआ था। यह समन्वित भाषा थी हिंदी।”[4]

आदिकाल से ही हिंदी उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम और विभिन्न धर्मों को जोड़ने वाली कड़ी रही है। आदिकालीन हिंदी साहित्य का अधिकांश भाग हिंदीतर भागों और लोगों द्वारा रचा गया। ‘पउमचरिउ’ की रचना स्वयंभू ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में किया तो ‘संदेश रासक’ को अब्दुर्रहमान ने पंजाब में लिखा। पूर्व में सिद्ध साहित्य, पश्चिम में नाथ साहित्य और अधिकांश भक्ति साहित्य गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा तथा असम में लिखा गया।

मध्यकाल भारत में “दक्षिण के आचार्यों- वल्लभाचार्य, रामानुज, निम्बार्क और रामानंद आदि ने संपर्क भाषा के महत्व को समझा और भरसक इसे (हिंदी को) संप्रेषण का माध्यम बनाया। दक्षिण के राष्ट्रकूटों और यादवों के राज्य में हिंदी का प्रचार हुआ। विजय नगर दरबार में हिंदी को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। मछलीपट्टम के नादेल्ल पुरुषोत्तम कवि ने बत्तीस हिंदी नाटकों की रचना की। अलाउद्दीन की दक्षिण विजय तथा मुहम्मद तुगलक के राजधानी परिवर्तन से वहाँ दक्कनी हिंदी का उदय हुआ। अहमद नगर, बीजापुर, गोलकुंड, बीदर आदि इसके केंद्र बने। ख्वाजा बंदानेवाज गेसूदराज, मुल्लावजही (क़ुतुबमुश्तरी), शाह मीराबी, क़ुतुबशाह आदि वहाँ अनेक कवि-लेखक हुए।”[5] ख्वाजा बंदानेवाज गेसूदराज की ‘मिराजुल आशिकीन’ दक्खिनी और खड़ी बोली गद्य की प्रथम रचना मानी जाती है। इसकी भाषा खड़ी बोली, अरबी-फारसी और दक्षिणी भाषाओं का मिश्रित रूप है। जो उत्तर-दक्षिण और हिन्दू-मुस्लिम के बीच कड़ी का काम किया।

इसी तरह केरल के श्री राम वर्मा; महाराष्ट्र के नाथ योगियों, महानुभाव संप्रदाय, विट्ठल सम्प्रदाय, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और संत नामदेव; गुजरात के नरसी मेहता और दयाराम, मीरा तथा अष्टछाप के कवि कृष्णदास; पंजाब के गुरु गोविंद सिंह तथा ब्रजभाषा के काव्यशास्त्र ‘तुहफतुल हिंद’ के लेखक मिर्जा खां और उड़ीसा के राय रामानंद, जगन्नाथ दास, वंशीलाल मिश्र, ब्रजनाथ बड़जेना, रामदास आदि की रचनाओं में हिंदी के गद्य-पद्य मिलते हैं। जिसके वजह से हिंदी संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हुई। यह कड़ी आधुनिक काल में अंग्रजों के विरुद्ध और मजबूत हुई।

भारत एक विविधता से भरा हुआ देश है, विभिन्न समाज, संस्कृति और भाषाएँ हैं। यहाँ पर कई भाषा परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं। यहाँ तक सभी राज्यों की अपनी-अपनी भाषा है, दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश आदि राज्यों में क्रमश: तमिल, मलयालम और आदि भाषा बोली जाती है तो पूर्वी भारत में मणिपुर और मिजोरम में क्रमश: मणिपुरी और मिजो। इसी तरह कश्मीरी, पंजाबी, मराठी और गुजराती आदि भाषाओं का भी प्रचलन है। कई राज्य ऐसे भी हैं जहाँ कई भाषाएँ और बोलियाँ प्रयुक्त होती हैं। अरुणाचल में प्रत्येक आदिवासी कुनबा की अपनी-अपनी भाषाएँ हैं, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अवधी, ब्रज तथा भोजपुरी जैसे कई बोलियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं। हालाँकि इन दोनों राज्यों में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग होता है। लेकिन अधिकतर राज्यों की अभी भी संपर्क भाषा हिंदी नहीं है। सही अर्थों में भारत बहुभाषी समाज है और यह भाषाई विविधता राष्ट्र की मजबूती है न की कमजोरी।

इसी सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देश को एक सूत्रता में पिरोने के लिए संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की वकालत किया था। अधिकतर राज्यों में बोले जाने और सहज एवं सरल होने की वजह से अन्य भारतीय भाषाओं की जगह हिंदी भाषा को यह स्थान मिला। हिंदी भाषा में ही यह क्षमता थी की वह संपूर्ण देश को आपस में जोर सके। अंग्रेजी शासन के खिलाफ हुए स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हिंदी ने देशवासियों में स्वाधीनता की चेतना के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हमारे नेताओं ने भी देश की जनता से संपर्क साधने के लिए हिंदी भाषा का न केवल उपयोग किया बल्कि उसके प्रचार-प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गैर हिंदी राज्यों एवं दक्षिण भारतीय नेताओं की इसमें सबसे बड़ी भूमिका रही। यही वजह है की स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गैर हिंदी राज्यों में बहुत सारी संस्थाएं स्थापित की गयीं, जहाँ पर हिंदी भाषा का शिक्षण और कई पाठ्यक्रम संचालित हुए। जिसकी वजह से दूसरी भारतीय भाषाओं के लोगों ने न केवल हिंदी सीखा बल्कि उन्हें रोजगार के विकल्प भी मिले। हिंदी को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए अनेक संस्थाओं और नेताओं द्वारा कई बड़े आंदोलन भी किए गये। जिसके परिणाम स्वरूप हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित होने लगी।

आजादी मिलने के उपरांत जब देश का विकास तेजी से होने लगा। औद्योगीकरण, यातायात तथा संचार साधनों के विकास होने के बाद जब अंतर्देशीय प्रवास बढ़ा, तब संपर्क भाषा की तीव्र आवश्यकता महसूस हुआ। इस स्थिति में हिंदी भाषा ही काम आई, जिससे लोगों के बीच आपसी संपर्क कायम हुआ। यह इसलिए भी संभव हुआ क्योंकि देश के अधिकतर लोग इसे समझते और बोलते है, इसका प्रयोग सहज एवं सरल भी है।

दूरदर्शन, फिल्म, रेडियो और टेलीविजन जैसे संचार एवं मनोरंजन के साधनों ने हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदी फिल्में इतनी लोकप्रिय हुई की इनके दर्शक देश और विदेशों में भी पसंद की जाने लगीं, अफगानिस्तान और खाड़ी के देशों में अभी भी मनोरंजन के महत्वपूर्ण साधन हिंदी फ़िल्में ही हैं। बॉलीवुड और फिल्मों ने न केवल भाषा की सीमा को तोड़ा बल्कि देश की सीमा का भी अतिक्रमण किया। इसके गीत, संवाद और संगीत ने गैर हिंदी भाषियों में घर कर गया जिससे हिंदी के बहुत सारे शब्द उनके अपने हो गये। इसी तरह दूरदर्शन और रेडियो ने भी गैर हिंदी भाषियों में अपनी व्यापक छाप छोड़ी, जिससे लोग हिंदी को आत्मसात करते गये।

भारत में हिंदी बोलने और समझने वालों की संख्या काफी अधिक है, यह देश के सबसे बड़े भू-भाग की भाषा है। जो दस राज्यों- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तराचंल, झारखंड तथा दिल्ली की मुख्य भाषा है तथा अन्य कई राज्यों में गौड़ या द्वितीयक भाषा के रूप में व्यवह्त होती है। 1961 की जनगणना में जहाँ अंग्रेज़ी द्विभाषियों की संख्या अधिक थी, वहीं 1991 में हिंदी द्विभाषियों की संख्या अधिक हो गई। 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या का 43।63% लोगों की मातृभाषा हिंदी है। पिछले 10 वर्षों में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या में 10 करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई है, जो 25।19 फीसदी है। आंकड़ों के अनुसार भारत में 52 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं। हिंदी के संपर्क भाषा होने का इससे अधिक प्रमाण और क्या हो सकता है? हिंदी के बाद सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाएँ क्रमश: बंगाली, मराठी, तेलगू हैं।

भारत में बोली जाने वाली शीर्ष पांच भाषाएं:
भाषामातृभाषा (फीसदी)
हिंदी43।63 फीसदी
बांग्ला8।30 फीसदी
मराठी7।09 फीसदी
तेलुगू6।93 फीसदी
गुजराती4।74 फीसदी

हिंदी दूसरी भारतीय भाषाओं की अपेक्षा काफी लोचदार भाषा है, जिससे इसमें अन्य भाषाओं के शब्दों, वाक्य-संरचना और बोलचालजन्य आग्रहों को स्वीकार करने में आसानी होती है। साथ ही दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य को अनुवाद के माध्यम से लगातार हिंदी में लाया जा रहा है। जिससे हिंदी के पाठक न केवल उनके साहित्य से परिचित हैं अपितु उन लेखकों से भी परिचित हैं।

रोजगार की तलाश में बहुत सारे भारतीय देशीय और अंतर्देशीय प्रवास करते हैं और एक दूसरे से संपर्क करने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं। विदेशों में प्रवासी भारतीय अपने कामकाज तो अंग्रेजी या वहाँ की भाषा में करते हैं परन्तु जब वे अपने सांस्कृतिक परिवेश में आते हैं तो संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग करते हैं। एशिया देशों के आलावा मारिशस, सूरीनाम, फिजी, ट्रिनीडाड, केनिया, नैरोबी, ब्रिटिश, गाइना, दक्षिण–अफ्रीका, बर्मा (टांगू जिला) आदि के साथ यूरोप और अमेरिका में भी हिंदी समझने वाले लोग हैं। कहने का तात्पर्य हिंदी का अंतरराष्ट्रीय रूप भी विकसित हो रहा है। इन सभी कारणों से हिंदी का उतरोत्तर संपर्क भाषा के रूप में विकास हो रहा है। इस दृष्टि से हिंदी विभिन्न बोलियों और भाषाओं तथा अनेक वर्गों के बीच संपर्क भाषा की भूमिका निभा रही है।

हम अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी को संपर्क भाषा तो कह देते हैं लेकिन व्यवहारिक स्तर पर हम देखते हैं कि अंग्रेजी वैश्विक स्तर के साथ-साथ भारत में भी संपर्क भाषा के रूप में अभी भी महत्वपूर्ण भाषा बनी हुई है। क्योंकि यह विभिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच में संपर्क कायम करती है। हिंदी की बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आंदोलन और माँग लगातार उठ रही है, कई बोलियाँ शामिल भी हो गई है। ऐसी स्थिति में हिंदी की बहुसंख्यक दावेदारी कमज़ोर होगी। दूसरी महत्वपूर्ण बात ग़ैर-हिंदीभाषियों के लिए हिंदी समझना-बोलना ही काफ़ी नहीं है, उन्हें भी उत्तर भारतीयों की तरह हिंदी लिखना-पढ़ना भी आना चाहिए। तभी हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने का संकल्प पूरा हो पायेगा।

अब हमें यह प्रयास करना चाहिए की हम हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित करें। दूसरे राज्यों के लोग भी आपस में संपर्क बनाने के लिए हिंदी का प्रयोग करें, पढ़ने-लिखने में भी प्रयोग करें, तभी हिंदी राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त कर सकेगी। सभी हिंदी राज्यों में हिंदी के अतिरिक्त एक अन्य भारतीय भाषा की शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिए। देश का एक वर्ग अंग्रेजी को अभी भी संपर्क भाषा बनाए रखना चाहता है। लेकिन कोई भी विदेशी भाषा हमारी राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक संपदा को बनाए रखने तथा समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती।

संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर

संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा से भिन्न अर्थ में प्रयुक्त होती है। राष्ट्रभाषा में जहाँ मानक रूप को महत्व दिया जाता है, वहीं संपर्क भाषा दो या दो से अधिक भाषा-भाषियों के बीच सेतु का कार्य करती है। संपर्क भाषा का प्रमुख उद्देश्य एक दूसरे के मध्य अपनी बात को संप्रेषित करना होता है। इसीलिए इसमें हिंदी का मानक रूप नहीं दिखाई देता। इसमें व्याकरण दोष, अनगढ़ता तथा अन्य भाषाओं (पंजाबी, बंगाली, मराठी, गुजराती, तमिल, मलयालम आदि) के बहुत से शब्द मिश्रण रूप में मौजूद होते हैं।


[1] प्रयोजनमूलक हिंदी: सिद्धांत और प्रयोग- दंगल झाल्टे, पृष्ठ- 53

[2] आजीविका साधक हिंदी- पूरनचंद टंडन, पृष्ठ- 151

[3] प्रयोजनमूलक हिंदी के आधुनिक आयाम- महेन्द्र सिंह राणा, पृष्ठ- 79

[4] हिंदी भाषा- मुकेश अग्रवाल, पृष्ठ- 131

[5] वही, पृष्ठ- 132

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  1. हिंदी साहित्य का अद्भुत मंच हिंदी सारंग

    मै हिंदी सारंग से आज ही जुड़ा जुड़ने का कारण यही था कि अब तक मुझे इस तरह का दूसरा कोई बड़ा चैनल नहीं मिला सच तो यह है कि हिंदी सारंग के पास ऐसा क्या नहीं है जो हिंदी साहित्य संसार और हिंदी भाषा मे अब तक लिखा न गया हो।

    हिंदी सारंग से जुड़कर हम हिंदी भाषा और साहित्य से संबंधित कोई भी प्रतियोगी परीक्षा आसानी से पास कर सकते हैं बस मन में लगन और हिंदी सारंग के प्रति समर्पण की भावना होनी चाहिए।

    हिंदी भाषा और साहित्य से संबंधित हिंदी इतना बड़ा मंच प्रदान करने के लिए हिंदी सारंग के प्रशासकों के प्रति कोटिश नमन और हृदय तल की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूं।
    प्रवेश कुमार

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