वैष्णवता और भारतवर्ष निबंध- भारतेन्दु हरिश्चंद्र

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⁠इस लेख का उल्लेख ‘रामायण का समय’ नामक लेख में पहले ही आ चुका है जो सन् 1884 की रचना है। अतः यह उसके पहले की ही रचना होनी चाहिये।– सं.

यदि विचार करके देखा जायगा तो स्पष्ट प्रकट होगा कि भारतवर्ष का सबसे प्राचीन मत वैष्णव है। हमारे आर्य लोगों ने सबसे प्राचीनकाल में सभ्यता का अवलंबन किया और इसी हेतु क्या धर्म क्या नीति सब विषय के संसार मात्र के ये दीक्षागुरु हैं। आर्यों ने आदिकाल से सूर्य ही को अपने जगत् का सब से उपकारी और प्राणदाता समझ कर ब्रह्म माना और इन का मूल मंत्र गायत्री इसी से इन्हीं सूर्य नारायण की उपासना में कहा गया है। सूर्य की किरणैं ‘आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः’ जलों में और मनुष्यों में व्याप्त रहती हैं और इस द्वारा ही जीवन प्राप्त होता है इसी से सूर्य का नाम नारायण है। हम लोगों के जगत् के ग्रह मात्र, जो सब प्रत्येक ब्रह्‌माण्ड हैं, इन्हीं की आकर्षण शक्ति से स्थिर हैं, इसी से नारायण का नाम अनंत कोटिब्रह्‌मांडनायक है। इसी सूर्य का वेद में नाम विष्णु है, क्योंकि इन्हीं की व्यापकता से जगत् स्थित है। इसी से आर्यों में सबसे प्राचीन एक ही देवता थे और इसी से उस काल के भी आर्य वैष्णव थे। कालांतर में सूर्य में चतुर्भज देव की कल्पना हुई। ‘ध्येयः सदा सवितृ मंडल मध्यवर्ती नारायणःसरसिजासनसनिविष्ट’, ‘तद्विष्णोः परमं पदम्’, ‘विष्णो: कर्माणि पश्यत’, ‘यत्र गावो भूरिशृंगाः’, ‘इदंविष्णुर्विचक्रमे’ इत्यादि श्रुति जो सूर्यनारायण के आधिभौतिक ऐश्वर्य की प्रतिपादक थीं, आधिदैविक सूर्य की विष्णुमूर्ति के वर्णन में व्याख्यात हुई। चाहे जिस रूप से हो वेदों ने प्राचीनकाल से विष्णुमहिमा गाई। उस के पीछे उस सूर्य की एक प्रतिमूर्ति पृथ्वी पर मानी गई, अर्थात् अग्नि। आर्यों का दूसरा देवता अग्नि है। अग्नि यज्ञ है और ‘यज्ञो वै विष्णुः’ यज्ञ ही से रुद्र देवता माने गये। आर्यों के एक छोड़ कर दो देवता हुए। फिर तीन और तीन से ग्यारह को त्रिविध करने से तैंतीस और इसी तैंतीस से तैंतीस करोड़ देवता हुए। इस विषय का विशेष वर्णन अन्य प्रसंग में करेंगे। यहाँ केवल इस बात को दिखलाते हैं कि वर्तमान समय में भी भारतवर्ष से और वैष्णवता से कितना घनिष्ठ संबंध है। किन्तु योरप के पूर्वीविद्या जाननेवाले विद्वानों का मत है कि रुद्र आदि आर्यों के देवता नहीं हैं[1] वह अनार्यों (Non-Aryan or Tamalian) के देवता हैं। इस के वे लोग आठ कारण देते हैं। प्रथम वेदों में लिंगपूजा का निषेध है। यथा वशिष्ठ इंद्र से विनती करते हैं कि हमारी वस्तुओं को ‘शिश्नदेवा’ (लिंगपूजक) से बचाओ इत्यादि[2]। ऋग्वेद और अन्यान्य ऋचाओं में भी शिश्नदेवालोगों को असुर, दस्यु इत्यादि कहा है और रुद्री में भी रुद्र की स्तुति भयंकर भाव से की है। दूसरी युक्ति यह है कि स्मृतियों में लिंगपूजा का निषेध है।[3] प्रोफेसर मैक्समूलर ने वशिष्ठस्मृति के अनुवाद के स्थल में यह विषय बहुत स्पष्ट लिखा है। तीसरी युक्ति वे यह कहते हैं कि लिंगपूजक और दुर्गाभैरवादिकों के पूजक ब्राहमण को पंक्ति से बाहर करना लिखा है। (मिताक्षरावृत्त ब्रह्‌मांडपुराण के वाक्य, चतुर्विंशतिमत पराशर व्याख्या में माधव श्लोक 29, आपस्तम्ब, भागवत चतुर्थस्कंध द्वितीयाध्याय 28 श्लोक और धर्माब्धिसार के तीसरे परिच्छेद का पूर्वार्द्ध देखो।) चौथी युक्ति यह कहते हैं कि लिंग का तथा दुर्गा भैरवादि का निर्माल्य खाने में पाप लिखा है। [ 1016 ] कमलाकरान्हिक, निर्णयसिंधु (आचारंमाधवादि ग्रंथों में सैकड़ों वाक्य हैं, देख लो)। पाँचवें शास्त्रों में शिवमंदिर और भैरवादिकों के मंदिर को नगर के बाहर बनाना लिखा है। छठवें वे लोग कहते हैं कि शैव बीजमंत्र से दीक्षित और शिव को छोड़ कर और देवता को न माननेवाले ऐसे शुद्ध शैव भारतवर्ष में बहुत ही थोड़े हैं। या तो शिवोपासक स्मार्त्त हैं या शाक्त हैं। शाक्त भी शिव को पार्वती के पति समझकर विशेष आदर देते हैं, कुछ सर्वेश्वर समझ कर नहीं। जंगमादिक दक्षिण में जो दीक्षित शैव हैं वे बहुत ही थोड़े हैं। शाक्त तो जो दीक्षित होते हैं वे प्रायः कौलही हो जाते हैं। सौर गाणपत्य की तो कुछ गिनती ही नहीं। किन्तु वैष्णवों में मध्य और रामानुज को छोड़कर और इन में भी जो निरे आग्रही हैं वे ही तो साधारण स्मार्तों से कुछ भिन्न हैं, नहीं तो दीक्षित वैष्णव भी साधारण जनसमाज से कुछ भिन्न नहीं और एक प्रकार के अदीक्षित वैष्णव तो सभी हैं। सातवीं युक्ति इन लोगों की यह है कि जो अनार्यलोग प्राचीन काल में भारतवर्ष में रहते थे और जिन को आर्यलोगों ने जीता था वही शिल्पविद्या नहीं जानते थे और इसी हेतु लिंग, ढोंका सिद्धपीठ इत्यादि पूजा उन्हीं लोगों की है जो अनार्य हैं। आठवें शिव, काली, भैरव इत्यादि के वस्त्र, निवास, आभूषण आदिक सभी आर्यों से भिन्न हैं। स्मशान में वास, अस्थि की माला आदि जैसी इन लोगों की वेषभूषा शास्त्रों में लिखी है वह आर्योचित नहीं है। इसी कारण शास्त्रों में शिव का, भृगु और दक्ष आदि का विवाद कई स्थल पर लिखा है और रुद्रभाग इसी हेतु यज्ञ के बाहर है। यद्यपि ये पूर्वोक्त युक्तियाँ योरोपीय विद्वानों की हैं, हमलोगों से कोई संबंध नहीं किन्तु इस विषय में बाहरवाले क्या कहते हैं, केवल यह दिखलाने को यहाँ लिखी गई है।

पाश्चिमात्य विद्वानों का मत है कि आर्य लोग (Aryans) जब मध्य एशिया (Central Asia) में थे तभी से लोग विष्णु का नाम जानते हैं। जोरौस्ट्रियन (Zorastrian) ग्रंथ जो ईरानी और आर्य शाखाओं के भिन्न होने के पूर्व के लिखे हैं उन में भी विष्णु का वर्णन है। वेदों के आरंभकाल से पुराणों के समय तक तो विष्णुमहिमा आर्यग्रंथों में पूर्ण है। वरंच तंत्र और आधुनिक भाषा ग्रंथों में उसी भाँति एकछत्र विष्णु महिमा का राज्य है।

पंडितवर बाबू राजेन्द्रलाल मित्र ने वैष्णवता के काल को पाँच भाग में विभक्त किया है। यथा 1. वेदों के आदि समय की वैष्णवता, 2. ब्राहमण के समय की वैष्णवता, 3. पाणिनि के और इतिहासों के समय की वैष्णवता, 4. पुराणों के समय की वैष्णवता, 5. आधुनिक समय की वैष्णवता।

वेदों के आदि समय से विष्णु की ईश्वरता कही गई है। ऋग्वेद संहिता में विष्णु की बहुत सी स्तुति है। विष्णु को किसी विशेष स्थान का नायक या किसी विशेष तत्व वा कर्म का स्वामी नहीं कहा है, वरंच सर्वेश्वर की भाँति स्तुति किया है। यथा विष्णु पृथ्वी के सातों तहों पर फैला है। विष्णु ने जगत् को अपने तीन घर के भीतर किया। जगत उसी के रज में लिपटा है। विष्णु के कर्मों को देखो जो कि इंद्र का सखा है। ऋषियो! विष्णु के ऊँचे पद को देखो, जो एक आँख की भाँति आकाश में स्थिर है । पंड़ितों! स्तुति गाकर विष्णु के ऊँचे पद को खोजो। इत्यादि। ब्राह्‌मणों ने इन्हीं मंत्रों का बड़ा विस्तार किया है और अब तक यज्ञ, होम, श्राद्ध आदि सभी कर्मों में ये मंत्र पढ़े जाते हैं। ऐसे ही और स्थानों में विष्णु को जगत् का रक्षक, स्वर्ग और पृथ्वी का बनाने वाला, सूर्य और अँधेरे का उत्पन्न करने वाला इत्यादि लिखा है। इन मंत्रों में विष्णु के विषय में रूप का परिचय इतना ही मिलता है कि उस ने अपने तीन पदों से जगत् को व्याप्त कर रखा है। यास्क ने निरुक्त में अपने से पूर्व के दो ऋषियों का मत इस के अर्थ में लिखा है। यथा शाक्यमुनि लिखते हैं कि ईश्वर का पृथ्वी पर रूप अग्नि है, घन में विद्युत् है और आकाश में सूर्य है। सूर्य की पूजा किसी समय समस्त पृथ्वी में होती थी यह अनुमान होता है। सब भाषाओं में अद्यापि यह कहावत प्रसिद्ध है कि ‘उठते हुए सूर्य को सब पूजता है।’ (अरुणभाव सर्य के उदय, मध्य और अस्त की अवस्था को तीन पद मानते हैं।) दुर्गाचार्य अपनी टीका में उसी मत को पुष्ट करते हैं। सायणाचार्य विष्णु के बावन-अवतार पर इस मंत्र को लगाते हैं। किन्तु यज्ञ और आदित्य ही विष्णु हैं, इस बात को बहुत लोगों ने एक मत होकर माना है। अस्तु, विष्णु उस समय आदित्य ही को नामांतर से पुकारा है कि स्वयं विष्णु देवता आदित्य से भिन्न थे, इस का झगड़ा हम यहाँ नहीं करते। यहाँ यह सब लिखने से हमारा केवल यह आशय है कि अति प्राचीनकाल से विष्णु हमारे देवता है। अग्नि, वायु और सूर्य यह तीनों रूप विष्णु के हैं; इन्हीं से ब्रह्‌मा, शिव और विष्णु यह तीन मूर्तिमान् देव हुए हैं।

ब्राह्‌मणों के समय में विष्णु की महिमा सूर्य से भिन्न कह कर विस्तर रूप से वर्णित है और शतपथ ऐतरेय और तैत्तिरीय ब्राह्‌मण में देवताओं का द्वारपाल, देवताओं के हेतु जगत् का राज्य बचानेवाला इत्यादि कह कर लिखा है।

इतिहासों में रामायण और भारत में विष्णु की महिमा स्पष्ट है, वरंच इतिहासों के समय में विष्णु के अवतारों का पृथ्वी पर माना जाना भी प्रकट है। पाणिनि के समय के बहुत पूर्व कृष्णावतार, कृष्ण पूजा और कृष्णभक्ति प्रचलित थी, यह उन के सूत्र ही से स्पष्ट है। यथा, जीविकार्थे चापण्ये वासुदेवेः ॥५॥३॥९९॥० कृष्णं नमेच्चेतसुखं यायात् ।३।३।१५ इ. वासुदेवे भक्तिरस्य वासुदेवकः ॥४॥३॥९८॥० और प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और सुभद्रा नाम इत्यादि के पाणिनि के लिखने ही से सिद्ध है कि उस समय के अति पूर्व कृष्णावतार की कथा भारतवर्ष में फैल गई थी। यूनानियों के उदय के पूर्व पाणिनि का समय सभी मानते हैं। विद्वानों का मत है कि क्रम से पूजा के नियम भी बदले यथा पूर्व में यज्ञाहुति, फिर बलि और अष्टांग पूजा आदि हुई और देवविषयक ज्ञान की वृद्धि के अंत में सब पूजन आदि से उस की भक्ति श्रेष्ठ मानी गई।

पुराणों के समय में तो विधिपूर्वक वैष्णव मत फैला हुआ था, यह सब पर विदित ही है। वैष्णव पुराणों की कौन कहे, शाक्त और शैव पुराणों में भी उन देवताओं की स्तुति उन को विष्णु से संपूर्ण भिन्न कर के नहीं कर सके हैं। अब जैसा वैष्णव मत माना जाता है उस के बहुत से नियम पुराणों के समय से और फिर तंत्रों के समय से चले हैं। दो हजार वर्ष की पुरानी मूर्तियाँ वाराह, राम, लक्ष्मण और वासुदेव की मिली हैं और उन पर भी खुदा हुआ है कि उन मूर्तियों की स्थापना करने वालों का वंश भागवत अर्थात् वैष्णव था राजतरंगिणी के ही देखने से राम, केशव आदि मूर्तियों की पूजा यहाँ बहुत दिन से प्रचलित है, यह स्पष्ट हो जाता है। इस से इस की नवीनता या प्राचीनता का झगड़ा न करके यहाँ थोड़ा सा इस अदल बदल का कारण निरूपण करते हैं।

मनुष्य के स्वभाव ही में यह बात है कि जब वह किसी बात पर प्रवृत्त होता है तो क्रमशः उस की उन्नति करता जाता है और उस विषय को जब तक वह एक अंत तक नहीं पहुँचा लेता संतुष्ट नहीं होता। सूर्य के मानने की ओर जब मनुष्यों की प्रवृत्ति हुई तो इस विषय को भी वे लोग ऐसी ही सूक्ष्म दृष्टि से देखते गये।

प्रथमतः कर्म मार्ग में फँसकर लोग अनेक देवी देवों को पूजते हैं, किन्तु बुद्धि का यह प्रकृत धर्म है कि यह ज्यों ज्यों समुज्ज्वल होती है अपने विषय मात्र को उज्ज्वल करती जाती है। थोड़ी बुद्धि बढ़ने ही से यह विचार चित्त में उत्पन्न होता है कि इतने देवी देव इस अनंत सृष्टि के नियामक नहीं हो सकते, इन का कर्त्ता स्वतंत्र कोई विशेष शक्ति संपन्न ईश्वर है। तब उस का स्वरूप जानने की इच्छा होती है, अर्थात् मनुष्य कर्मकांड से ज्ञानकांड में आता है। ज्ञानकांड में सोचते-सोचते संगति और रुचि के अनुसार या तो मनुष्य फिर निरीश्वरवादी हो जाता है या उपासना में प्रवृत्त होता है। उस उपासना की भी विचित्र गति है। यद्यपि ज्ञान वृद्धि के कारण प्रथम मनुष्य साकार उपासना छोड़कर निराकार की ओर रुचि करता है, किन्तु उपासना करते-करते जहाँ भक्ति का प्राबल्य हुआ वहीं अपने उस निराकार उपास्य को भक्त फिर साकार कहने लगता है। बड़े बड़े निराकारवादियों ने भी “प्रभो दर्श दो! अपने चरणकमलों को हमारे सिर पर स्थान दो, अपनी सुधामयी वाणी श्रवण कराओ” इत्यादि प्रयोग किया है वैसे ही प्रथम सूर्य पृथ्वी वासियों को सब से विशेष आश्चर्य और गुणकारी वस्तु बोध हुई, उस से फिर उन में देव बुद्धि हुई। देव बुद्धि होने ही से आधिभौतिक सूर्य मंडल के भीतर एक आधिदैविक नारायण माने गये। फिर अंत में यह कहा गया कि नारायण एक सूर्य ही में नहीं, सर्वत्र हैं, और अनंत कोटि सूर्य, चंद्र, तारा उन्हीं के प्रकाश से प्रकाशित हैं। अर्थात् आध्यात्मिक नारायण की उपासना में लोगों की प्रवृत्ति हुई।

इन्हीं कारणों से वैष्णवमत की प्रवृत्ति भारतवर्ष में स्वाभाविकी है। जगत् में उपासना मार्ग ही मुख्य धर्म मार्ग समझा जाता है। कृस्तान, मुसलमान, ब्राह्‌म, बौद्ध उपासना सब के यहाँ मुख्य है। किन्तु बौद्धों में अनेक सिद्धों की उपासना और तप आदि शुभ कर्मों के प्राधान्य से वह मत हम लोगों के स्मार्त मत के सदृश है और कृस्तान, ब्राह्‌म, मुसलमान आदि के धर्म में भक्ति की प्रधानता से ये सब वैष्णवों के सदृश हैं। इंजील में वैष्णवों के ग्रंथों से बहुत सा विषय लिया है और ईसा के चरित्र में श्री कृष्ण के चरित्र का सादृश्य बहुत है, यह विषय सविस्तर भिन्न प्रबंध में लिखा गया है। तो जब ईसाइयों के मत को ही हम वैष्णवों का अनुगामी सिद्ध [ 1018 ] कर सके हैं, फिर मुसलमान जो कृस्तानों के अनुगामी हैं वे हमारे अन्वनुगामी हो चुके।

यद्यपि यह निर्णय करना अब अति कठिन है कि अतिप्राचीन के ध्रुव, प्रह्‌लाद आदि, मध्यावस्था के ऊद्धव, आरुणि, परीक्षितादिक और नवीन काल के वैष्णवाचार्यों के खान-पान, रहन-सहन, उपासनारीति, वाह्‌य चिन्ह आदि में कितना अंतर पड़ा है, किन्तु इतना ही कहा जा सकता है कि विष्णु-उपासना का मूल सूत्र अति प्राचीनकाल से अनवच्छिन्न चला आता है। ध्रुव, प्रह्‌लादादि वैष्णव तो थे, किन्तु अब के वैष्णवों की भाँति कंठी, तिलक, मुद्रा लगाते थे और मांस आदि नहीं खाते थे, इन बातों का विश्वस्त प्रमाण नहीं मिलता। ऐसे ही भारतवर्ष में जैसी धर्मरुचि अब है उस से स्पष्ट होता है कि आगे चलकर वैष्णवमत में खाने पीने का विचार छूट कर बहुत सा अदल बदल अवश्य होगा। यद्यपि अनेक आचार्यों ने इसी आशा से मत प्रवृत्त किया कि इसमें सब मनुष्य समानता लाभ कर और परस्पर खानपानादि से लोगों में ऐक्य बढ़े और किसी जाति, वर्ण, देश का मनुष्य क्यों न हो वैष्णव पंक्ति में आ सकै, किन्तु उन लोगों की यह उदार इच्छा भली भाँति पूरी नहीं हुई, क्योंकि स्मार्त मत की और ब्राह्‌मणों की विशेष हानि के कारण इस मत के लोगों ने उस समुन्नत भाव से उन्नति को रोक दिया, जिस से अब वैष्णवों में छूआछूत सब से बढ़ गया। बहुदेवोपासकों की घृणा देने के अर्थ वैष्णवातिरिक्त और किसी का स्पर्श बचाते वहाँ तक एक बात थी, किन्तु अब तो वैष्णवों ही में ऐसा उपद्रव फैला है कि एक संप्रदाय के वैष्णव दूसरे संप्रदाय वाले को अपने मंदिर में और अपने खान पान में नहीं लेते और ‘सात कनौजिया नौ चूल्हे’ वाली मसल हो गई है। किन्तु काल की वर्तमान गति के अनुसार यह लक्षण उनकी अवनति के हैं। इस काल में तो इस की तभी उन्नति होगी जब इस के वाह्‌यव्यवहार और आडंबर में न्यूनता होगी और एकता बढ़ाई जायगी और आंतरिक उपासना की उन्नति की जायगी। यह काल ऐसा है कि लोग उसी मत को विशेष मानेंगे जिस में वाह्य देह-कष्ट न्यून हो। यद्यपि वैष्णवधर्म भारतवर्ष का प्रकृत धर्म है इस हेतु उस की ओर लोगों की रुचि होगी, किन्तु उसमें अनेक संस्कारों की अतिशय आवश्यकता है। प्रथम तो गोस्वामीगण अपना रजोगुणी-तमोगुणी स्वभाव छोड़ेंगे तब काम चलेगा। गुरु लोगों में एक तो विद्या ही नहीं होती, जिसके न होने से शील, नम्रता आदि उनमें कुछ नहीं होते। दूसरे या तो वे अति रूखे क्रोधी होते हैं या अति बिलासलालस होकर स्त्रियों की भाँति सदा दर्पण ही देखा करते हैं। अब वह सब स्वभाव उनको छोड़ देना चाहिए, क्योंकि इस उन्नीसवीं शताब्दी में वह श्रद्धाजाड्‌य अब नहीं बाकी है। अब कुकर्मी गुरु का भी चरणामृत लिया जाय वह दिन छप्पर पर गए। जितने बूढ़े लोग अभी तक जीते हैं उन्हीं के शील संकोच से प्राचीनधर्म इतना भी चल रहा है, बीस पचीस बरस पीछे फिर कुछ नहीं है। अब तो गुरु गोसाईं का चरित्र ऐसा होना चाहिए कि जिस को देख सुन कर लोगों में श्रद्धा से स्वयं चित्त आकृष्ट हो। स्त्रीजनों का मंदिरों से सहवास निवृत्त किया जाय। केवल इतना ही नहीं, भगवान श्री कृष्णचन्द्र की केलिकथा जो अतिरहस्य होने पर भी बहुत परिमाण से जगत् में प्रचलित है वह केवल अंतरंग उपासकों पर छोड़ दी जाय, उनके माहात्म्य मत विशद चरित्र का महत्व यथार्थ रूप से व्याख्या कर के सब को समझाया जाय। रास क्या है, गोपी कौन है, यह सब रूपक अलंकार स्पष्ट कर के श्रुतिसम्मत उनका ज्ञान वैराग्य भक्तिबोधक अर्थ किया जाय। यह भी दबी जीभ से हम डरते डरते कहते हैं कि व्रत, स्नान आदि भी वहीं तक रहैं जहाँ तक शरीर को अति कष्ट न हो। जिस उत्तम उदाहरण के द्वारा स्थापक आचार्यगण ने आत्मसुख विसर्जन कर के भक्ति सुधा से लोगों को प्लावित कर दिया था उसी उदाहरण से अब भी गुरु लोग धर्म प्रचार करैं। वाह्‌य आग्रहों को छोड़ कर केवल आंतरिक उन्नत प्रेममय भक्ति का प्रचार करैं, देखैं कि दिग्दिगंत से हरिनाम की कैसी ध्वनि उठती है और विधर्मीगण भी इसको सिर झुकाते हैं कि नहीं और सिक्ख, कबीरपंथी आदि अनेक दल के हिन्दूगण भी सब आप से आप बैर छोड़ कर इस उन्नतसमाज में मिल जाते हैं कि नहीं।

जो कोई कहै कि यह तुम कैसे कहते हो कि वैष्णवमत ही भारतवर्ष का प्रकृत मत है तो उस के उत्तर में हम स्पष्ट कहेंगे कि वैष्णव मत ही भारतवर्ष का मत है और वह भारतवर्ष कह हड्डी लहू में मिल गया है। इस के अनेक प्रमाण हैं, क्रम से सुनिए (1) पहले तो कबीर, दादू, सिक्ख, बाउल आदि जितने पंथ हैं सब वैष्णवों की शाखा प्रशाखायें हैं और सारा भारतवर्ष इन पंथों से छाया हुआ है। (2) अवतार और किसी देव का नहीं, क्योंकि इतना उपकार ही [दस्यु दलन आदि] और किसी से नहीं साधित हुआ है। (3) नामों को लीजिए तो क्या स्त्री, क्या पुरुष, आधे नाम भारतवर्ष के विष्णुसंबंधी हैं और आधे में जगत् है। कृष्णभट्ट, रामसिंह, [ 1019 ] गोपालदास, हरिदास, रामगोपाल, राधा, लक्ष्मी, रुक्मिन, गोपी, जानकी आदि। विश्वास न हो कलेक्टरी के दफ्तर से मर्दुमशुमारी के काग़ज़ निकाल कर देख लीजिए वा एक दिन डाँकघर में बैठकर चिट्ठियों के लिफाफों की सैर कीजिए। (4) ग्रंथ, काव्य, नाटक आदि के, संस्कृत या भाषा के, जो प्रचलित हैं उन को देखिए। रघुवंश, माघ, रामायण आदि ग्रंथ विष्णुचरित्र के ही बहुत हैं। (5) पुराण में भारत, भागवत, वाल्मीकिरामायण यही बहुत प्रसिद्ध हैं और यह तीनों वैष्णवग्रंथ हैं। (6) व्रतों में सब से मुख्य एकादशी है वह वैष्णव व्रत है और भी जितने व्रत हैं उन में आधे वैष्णव हैं। (7) भारतवर्ष में जितने मेले हैं उन में आधे से विशेष विष्णुलीला, विष्णुपर्व या विष्णुतीर्थों के कारण हैं। (8) तिहवारों की भी यही दशा है। वरंच होली आदि साधारण तिहवारों में भी विष्णुचरित्र ही गाया जाता है। (9) गीत, छंद चौदह आना विष्णुपरत्व हैं, दो आना और देवताओं के। किसी का व्याह हो, रामजानकी के व्याह के गीत सुन लीजिए। किसी के बेटा हो नंद बधाई गाई जायगी। (10) तीर्थों में भी विष्णुसंबंधी ही बहुत हैं। अयोध्या, हरिद्वार मथुरा, वृंदावन, जगन्नाथ, रामनाथ, रंगनाथ, द्वारका, बदरीनाथ आदि भली भाँति याद कर के देख लीजिए। (11) नदियों में गंगा, यमुना मुख्य हैं, सो इन का माहात्म्य केवल विष्णुसंबंध से है। (12) गया में हिंदू मात्र को पिंडदान करना होता है, वहाँ भी विष्णुपद है। (13) मरने के पीछे ‘रामरामसत्य है’ इसी की पुकार होती है और अंत में शुद्ध श्राद्ध तक ‘प्रेतमुक्ति प्रदोभव’ आदि वाक्य से केवल जनार्दन ही पूजे जाते हैं। यहाँ तक कि पितृरूपी जनार्दन ही कहलाते हैं। (14) नाटकों और तमाशों में रामलीला, रास ही अति प्रचलित है। (15) सब वेद पुस्तकों के आदि और अंत में लिखा रहता है ‘हरिः ॐ’। (16) संकल्प कीजिए तो विष्णुः विष्णुः। (17) आचमन में विष्णु विष्णु। (18) शुद्ध होना हो तो यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं। (19) सुग्गे को भी राम ही राम पढ़ाते है। (20) जो कोई वृत्तांत कहै तो उसको राम कहानी कहते हैं। (21) लड़कों को बाल गोपाल कहते है। (22) छपने में जितने भागवत, रामायण, प्रेमसागर, ब्रजविलास छापी जाती है और देवताओं के चरित्र उतने नहीं छपते। (23) आर्यलोगों के शिष्टाचार में रामराम, जय श्रीकृष्ण, जय गोपाल ही प्रचलित है। (24) ब्राह्‌मणों के पीछे बैरागी ही को हाथ जोड़ते हैं और भोजन कराते हैं। (25) विष्णु के साला होने के कारण चंद्रमा को सभी चंदा मामा कहते हैं। (26) गृहस्थ के घर घर तुलसी का थाला, ठाकुर की मूर्ति, रसोई भोग लगाने को रहती है। (27) कथा घाट बाट में भागवत ही रामायण की होती है। (28) नगरों के नाम में भी रामपुर,[4] गोविंदगढ़, रघुनाथपुर, गोपालपुर[5] आदि ही विशेष हैं। (29) मिठाई में गोविंदबड़ी, मोहनभोग आदि नाम हैं, अन्य देवताओं का कहीं कुछ नाम नहीं है। (30) सूर्यचंद्रवंशी क्षत्री लोग श्री राम कृष्ण के वंश में होने का अब तक अभिमान करते हैं। (31) ब्राह्‌मणगण ब्रह्‌मण्य देव कह कर अब तक कहते हैं ‘ब्राह्‌मणो मामकीतनुः’। (32) औषधियों में भी रामबाण, नारायणचूर्ण आदि नाम मिलते हैं। (33) कार्तिकस्नान, राधा दामोदर की पूजा, देखिए, भारतवर्ष में कैसी है। (34) तारकमंत्र लोग श्रीरामनाम ही को कहते हैं। (35) किसी हौस में चले जाइए तूल के थान निकलवा कर देखिए उस पर जितने चित्र विष्णुलीला संबंधी मिलैंगे अन्य नहीं। (36) बारहो महीने के देवता विष्णु हैं। ऐसी ही अनेक अनेक बातें हैं। विष्णु संबंधी नाम बहुत वस्तुओं के हैं, कहाँ तक लिखे जायँ। विष्णुपद (आकाश), विष्णुरात (परीक्षित), रामदाना, रामधेनु, रामजी की गैया, रामधनु (आकाश धनु), रामफल, सीताफल, रामतरोई, श्रीफल, हरिगीती, रामकली, रामकपूर, रामगिरी, रामचंदन, रामगंगा, हरिचंदन, हरिसिंगार, हरिकेला, हरिनेत्र (कमल), हरिकेली (बंगल देश), हरिप्रिय (सफेद चंदन), हरिवासर (एकादशी), हरिबीज (बंगनीबू), हरिवर्षखंड, कृष्णकली, कृष्णकंद कृष्णकांता, विष्णुक्रांता (फूल), सीतामऊ, सीतावलदी, सीताकुण्ड, सीतामढ़ी, सीता की रसोई, हरिपर्वत, हरि का पत्तन, रामगढ़, रामबाग, रामशिला, रामजी की घोड़ी, हरिपदा (आकाश गंगा), नारायणी, कन्हैया आदि नगर नद नदी पर्वत फल-फूल के सैकड़ों नाम हैं। (जले विष्णुः स्थले विष्णुः) सब स्थान पर विष्णु के नाम ही का संबंध विशेष है। आग्रह छोड़ कर तनिक ध्यान देकर देखिए कि विष्णु से भारतवर्ष से क्या संबंध है, फिर हमारी बात स्वयं प्रमाणित होती है कि नहीं कि भारतवर्ष का प्रकृत मत वैष्णव ही है।

अब वैष्णवों से यह निवेदन है कि आप लोगों का मत कैसी दृढ़ भित्ति पर स्थापित है और कैसे सार्वजनीन उदारभाव से परिपूर्ण है, यह कुछ कुछ हम आपलोगों को समझा चुके। उसी भाव से आपलोग भी उस में स्थिर रहिये, यही कहना है। जिस भाव से हिंदूमत अब चलता है उस भाव से आगे नहीं चलेगा। अब हमलोगों के शरीर का बल न्यून हो गया, विदेशी शिक्षाओं से मनोवृत्ति बदल गई, जीविका और धन उपार्जन के हेतु अब हम लोगों को पाँच-पाँच, छ-छ पहर पसीना चुआना पड़ेगा, रेल पर इधर से उधर कलकत्ते से लाहौर और बंबई से शिमला दौड़ना पड़ैगा, सिविल सर्विस का, बैरिस्टरी का, इंजिनियरी का इम्‌तिहान देने को विलायत जाना होगा, बिना यह सब किए काम नहीं चलेगा, क्योंकि देखिए, कृस्तान, मुसल्मान, पारसी यही हाकिम हुए जाते हैं, हम लोगों की दशा दिन-दिन हीन हुई जाती है। जब पेट भर खाने ही को न मिलेगा तो धर्म कहाँ बाकी रहेगा, इस से जीवमात्र के सहज धर्म उदरपूरण पर अब ध्यान दीजिए। परस्पर का बैर छोड़िए। शैव, शाक्त, सिक्ख जो हो, सब से मिलो। उपासना एक हृदय की रत्न वस्तु है उस को आर्यक्षेत्र में फैलाने की कोई आवश्यकता नहीं। वैष्णव, शैव, ब्राह्‌म, आर्यसमाजी सब अलग अलग पतली पतली डोरी हो रहे हैं, इसी से ऐश्वर्य रूपी मस्तहाथी उन से नहीं बँधता। इन सब डोरी को एक में बाँध कर मोटा रस्सा बनाओ, तब यह हाथी दिगदिगंत भागने से रुकैगा। अर्थात् अब वह काल नहीं है कि हम लोग भिन्न-भिन्न अपनी-अपनी खिचड़ी अलग पकाया करैं। अब महाघोर काल उपस्थित है। चारो ओर आग लगी हुई है। दरिद्रता के मारे देश जला जाता है। अँगरेजों से जो नौकरी बच जाती है उन पर मुसल्मान आदि विधर्मी भरती होते जाते हैं। आमदनी वाणिज्य की थी ही नहीं, केवल नौकरी की थी सो भी धीरे-धीरे खसकी। तो अब कैसे काम चलैगा। कदाचित् ब्राहमण और गोसाई लोग कहैं कि हमको तो मुफ्त का मिलता है, हम को क्या? इस पर हम कहते हैं कि विशेष उन्हीं को रोना है। जो करालकाल चला आता है उस को आँख खोल कर देखो। कुछ दिन पीछे आप लोगों के मानने वाले बहुत ही थोड़े रहेंगे, अब सब लोग एकत्र हो। हिंदू नामधारी वेद से ले कर तंत्र, वरंच भाषाग्रंथ मानने वाले तक सब एक होकर अब अपना परमधर्म यह रक्खो कि आर्य जाति में एका हो। इसी में धर्म की रक्षा है। भीतर तुम्हारे चाहे जो भाव और जैसी उपासना हो ऊपर से सब आर्यमात्र एक रहो। धर्म संबंधी उपाधियों को छोड़ कर प्रकृत धर्म की उन्नति करो।

भारतेन्दु समग्र (1987)


[1]. ऐंटिक्किटीज अव उड़ीसा १ जिल्द १३६ पेज देखो।

[2]. Rigveda, IV., P. 6 and Dr. Wilson’s Vedic Comments

[3]. Professor Max Muller’s Ancient Sanskrit Literature, P. 55

[4]. विष्णु संबंधी अनेक गाँव हैं, कई एक यहाँ पर लिखे जाते हैं। जिला गया के जहानाबाद थाना के इलाके में विसुनगंज गाँव है। जिला गया के नबीनगर थाना के इलाके में किसुनपुर बटाने के किनारे पर है, यहाँ मेला लगता है। जिला गया के दाऊदनगर थाना के इलाके में गोपालपुर गाँव है। जिला गया के शहरघाटी थाना के इलाके में नारायणपुर गाँव है। बरेव से तीन कोस पूरब सकरी नदी के बायें किनारे गोविंदपुर बैजनाथ जी की कच्ची सड़क पर भारी बाजार है। यहाँ लकड़ी और बहुत सी जंगली चीज बिकती हैं। यहाँ से दो कोस नैऋत्यकोन में एक तारा गाँव से आध कोस दक्खिन महभर पहाड़ में ककीलत बड़ा भारी और प्रसिद्ध झरना है, इस में सदा पानी मोटी धार से गिरा करता है। पानी गिरते नीचे एक अथाह कुंड बन गया है। पानी इस झरने का बहुत निर्मल और ठंढा रहता है। यह स्थान परम रम्य और मनोहर लगता है। मेष की संक्रांति में (बिसुआ) बड़ा मेला लगता है। गोविंदपुर के आस पास बिसुनपुर, सुंघड़ी और पहाड़ के पार सिऊर रपऊ आदि बड़े बड़े गाँव है। सिऊर में दो बड़े तालाब हैं और एक पुराने राजगृह का चिन्ह देख पड़ता है। सीतापुर के वायु कोन। सदर मुकाम दरयाबाद लखनऊ से ४५ मील वायुकोन उत्तर को झुकता हुआ है।

[5]. एक गाँव असनीगोपालपुर है। वहाँ के नरहरि कवि ने अपने परिचय में कहा है:

⁠कवित्त! नाम नरहरि है प्रशंसा सब लोग करैं हंसहू से उज्वल जगु व्यापे हैं। गंगा के तीर ग्राम असनीगोपालपुर मंदिरगोपाल जी को करत मंत्र जापे हैं। कबि बादशाही मौज पावै बादशाही वो जगावै बादशाही जाते अरिगन कांपे हैं। जब्बर गनीमन के तोरिबे को गब्बर हुमायूं के बब्बर अकब्बर के थापे हैं॥१॥

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