जातियों का अनूठापन निबंध- बालकृष्ण भट्ट

0
5336
jatiyo-ka-anuthapan-nibndh-balkrishna-bhatt
Jatiyo ka Anuthapan Nibndh- Balkrishna Bhatt

मनुष्य व्यक्ति के चरित्र का विचार कई एक रीति से हो सकता है। और जिस रीति पर आरूढ़ हो इसकी मीमांसा कीजिए उस ढंग के वैसे विचार होंगे। चाहे मनुष्य के धर्म अथवा सच्चरित्र संबंधी गुणों का विचार कीजिए या चाहे इसी के निकट का कोई प्रश्न उठाकर उस पर कुछ शंका समाधान कीजिए अर्थात् सच्चरित्र से सामाजिक क्या लाभ हैं इन सब बातों के विचार से हमको इस लेख में कुछ प्रयोजन नहीं है किंतु हमको यहाँ उस मुख्य बात से प्रयोजन है जो इस प्रकार की मीमांसा के भी पूर्व विचार में आनी चाहिए और वह यह बात है कि जातीयों का अनूठापन इस देश के इतिहास का फल है।

जब हम किसी एक जाति पर ध्यान देते हैं तो निश्चय उस जाति के आचरणों से कुछ ऐसी बातें लक्षित होती हैं जो खास उसी जाति में पाई जाएँगी और वे बातें ऐसी न होंगी जो मनुष्य मात्र में साधारण रीति पर पाई जाएँ क्योंकि न तो कोई जाति इतनी भली है कि उसमें कोई बुरे होंगे ही नहीं। न देश का देश इतना बुरा हो सकता है कि उस जाति में एक भी भला न हो। इसलिए उन बातों को खोजना चाहिए जो किसी जाति का एक विशेष धर्म है और इसकी मीमांसा हम दार्शनिक रीति पर करते हैं अर्थात् जब कार्य समझ में नहीं आता तब यह चिंता मन में होती है कि इसका कारण ढूढ़ैं और इस संबंध में कारण की खोज करने पर उस जाति या देश के पूर्व इतिहास से बढ़कर और क्या सहारा हो सकता है। अब पहले इस बात का ज्ञान स्पष्ट रीति पर होना चाहिए कि किसी एक काल में जो हम किसी जाति का कुछ अनूठापन पाते हैं वह निरा आकस्मिक नहीं है क्योंकि यदि आकस्मिक मान लिया जाए तो बस विचार का अंत हो गया और कारण का समझना तो दूर रहा तज्जनित जो कार्य है वह भी स्पष्ट रीति से मन में न आवेगा सुतराम ऐसी बातों का कोई आकस्मिक परिणाम भी हो सकता है यह कदापि न मानना चाहिए। इससे बस निश्चित हुआ कि जातीयों का अनूठापन तैयार करने में थोड़े से प्रधान कारक की अत्यंत आवश्यकता है तो अब खोज इसी बात की है कि विशेष जाति में किसी विशेष प्रकार का अनूठापन आ जाने के लिए कारक क्या है और उनका क्या और कैसे असर होता है।

ऊपर हमने ‘किसी एक काल में’ ऐसे वाक्य का प्रयोग किया है अब यह प्रश्न उठ सकता है कि अंत को इस रीति पर तय करने की अवधि क्या और कैसे होगी। काल तो इतिहास की सुगमता के लिए सर्वथा एक कल्पित पदार्थ है। किसी एक काल में कोई जाति का अनूठापन उस प्रकार का क्यों है यदि इसका लगाव आप उसी काल के पूर्व के इतिहास से रखते हैं तो हम पूर्व-काल के इतिहास जा दूसरे पूर्व काल के इतिहास से रखना पड़ेगा और इसी तरह यह शृंखला कभी टूटेगी ही नहीं इसलिए इस अनवस्था दोष का निराकरण होगा ही नहीं जब तक कहीं एक स्थल पर ठहर और इसी श्रृंखला में कहीं खंड कल्पित कर अपने प्रयोजनीय विषय के विचार पर आरूढ़ न हो जाएँगे अर्थात् किसी जाति के इतिहास में कोई खास वख्त से विचार चलावैं और इस उत्तम रीति को जब हम अपने मतलब पर लगाते हैं तो यह देखते हैं कि जब हमारा प्रश्न ही मनुष्य व्यक्ति के जाति का अनूठापन नितांत ऐतिहासिक है तो इसलिए जहाँ इतिहास हमको सहारा न देगा वहाँ निश्चय हम को ठहर जाना पड़ेगा और इसी बात को और स्पष्टतर रीति पर यों कह सकते हैं कि किसी एक जाति को जब से हम इतिहास में देखते हैं तब से हम उसमें वही विभेदक गुण पाते हैं जो मानों उसी जाति का लक्षण है। ऐसी बातों पर ध्यान देने से यह समझ में आता है कि किसी जाति के चरित्र के संबंध में अनूठापन का बीज कोई वस्तु है अर्थात् वे दो चार बातें किसी जाति के बिगड़ी या बनी दशा में आदि से पाई जाती हैं उन्हें आप एक जाति से दूसरी जाति को भिन्न रखने का बीज कहें तो अनुचित न होगा और उस देश के उपरांत के इतिहास का असर इसी बीज को पुष्ट करने में देखा जाता है। अथवा ज्यों-ज्यों वह जाति उन्नति करती जाय कालांतर में यही बात विविध पुष्ट रूपों में देखी जायगी और कुछ काल के उपरांत प्राकृतिक और ऐतिहासिक कारणों से जब इन्हीं बीज गुणों में एक प्रकार की पुष्टि आ गई और वह जाति वैसे ही बराबर उन्नति करती गई तो उसी प्रकार की और पुष्टि दिखाई देगी। पर यह भी देखा जाता है कि किसी संयोग से ऐसी विपरीत ऐतिहासिक घटनाएँ हुई हैं जिनसे उन्नति के बदले उस जाति में अवनति और हास की सूरत बँधी तो स्पष्ट है कि उस जाति के गुणों में भी अवनति और हानि की शकल दिखाई दे और तब से वहाँ वह जाति अपने उत्कर्ष से ढल जायगी और अच्छी बातों का होना उसमें बंद हो जायगा।

इसे भी पढ़े-

आचरण की सभ्यता निबंध- सरदार पूर्ण सिंह

यहाँ तक हमने सामान्य रीति पर जातीय उन्नति और अवनति के नियम कहे पर खूबी इन नियमों की किसी एक मुख्य जाति पर लगाने से और उनका पूरा-पूरा असर उस जाति पर दिखलाने में है। हम समझते हैं सबसे उत्तम उदाहरण हमको अपनी ही जाति पर लगाने के अतिरिक्त और कहाँ मिलेगा। बहुत आदि काल से आरंभ कर हम जब से इस जाति को लक्ष्य करते हैं तो उस विभेदक गुण का बीज पाते हैं और इसका नाम मननशीलता रखेंगे। यद्यपि संसार में बहुत से मजहब हैं जिनमें बड़ा-बड़ा उत्कर्ष किया गया है पर ‘मुनि’ और ‘आश्रम’ के जोड़ की कोई बात हम संसार के किसी मजहब में नहीं पाते। यह बीज गुण जो हमारी जाति को औरों से अलग करता है क्यों ऐसा है इसका उत्तर चाहे हम न दे सकें पर यह तो अवश्य कहेंगे कि जब से इतिहास का लेश भी इस जाति में पाया जाता है तभी से प्राकृतिक कारणों ने इस मननशीलता की जड़ डाल रखी थी। इन प्राकृतिक कारणों से हमारा प्रयोजन यहाँ के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों, बड़े लंबे चौड़े मैदानों से है। अथवा आबहवा जो अफ्रीका देश के समान न अत्यंत उष्ण या तीव्र न लापलैंड सरीखे शीत प्रधान देश के सदृश अत्यंत शीतल वर्ष में बराबर से छः ऋतु का होना, पैदावारी भी थोड़ी मेहनत में बहुत सा पैदा होना इत्यादि से है। और ये ही सब प्राकृतिक गुण ऐसे हैं जिनसे इस जाति के अनूठेपन (National Character) का बीज बोया गया है।

इसी मननशीलता के कारण हम देखते हैं कि केवल मनन करने के जो विषय हैं उनमें यह जाति इतनी उत्कर्ष प्राप्ति किए है कि जिसके जोड़ का गुण संसार भर की किसी जाति में नहीं देखा जाता और यही कारण है कि हम लोगों के यहाँ धर्म बहुत जल्द और बहुत अधिक चमका। जब और और जाति असभ्यता के अंधकार में पड़ी टटोल रही थीं हमारे वहाँ ऐसे-ऐसे सूक्ष्मानुसूक्ष्म सिद्धांत निकाले गए जिसकी बारीकियाँ योरोप की समझ में अब आने लगी हैं। पर जहाँ इस मननशीलता में सब गुण हैं वहाँ बहुत से अवगुण भी इससे पैदा हुए। इस सुक्ष्मानुसंधान के पीछे दौड़ने से बहुत सी महोपकारी पदार्थ विद्या संबंधी स्थूल बातें रह गईं। इसी मननशीलता के कारण अकर्मण्यता इनकी नस नस में घुस गई और कितने प्रकार के विज्ञान और ‘साइंस’ जिनमें भरपूर उद्यम और प्रागलभ्य (Activity) का काम पड़ता है उन्हें शांति सहयोगिनी इनकी मननशीलता ने होने ही न दिया। धर्म संबंधी उत्कर्षता निस्संदेह अति उत्तम है किंतु इसके साथ ही यह भी हुआ कि इस धर्म की उत्कर्षता और पारलौकिक चिंतन ने समाज और देश के हित की स्थूल बातों को इतना दबा दिया और उन सब हितकारी उपायों के स्थान में ऐसी टाँग अड़ाया कि उनका लेश भी न आने पाया। ‘मोरालिटी’ जिसके लिए कोई उचित शब्द हमारी भाषा में मिलता ही नहीं बिल्कुल मजहब हो गई। मजहब से कुछ सरोकार न रख स्वच्छंद ‘मोरालिटी’ की बुनियाद पाना असंभव सा हो गया। वैद्यक में मजहब जा घुसा, ज्योतिष में मजहब जा पैठा, नीतिशास्त्र उसी मजहब की एकअंग ही है।

योरोप की सी स्वच्छंद पालिटिक्स क्या है? सो हम जानते ही नहीं। इसका तो मानों बीज ही मारा पड़ा। कामन्दक और चाणक्य का नीतिशास्त्र अथवा मनु और महाभारत में जो राजधर्म लिखा गया है वह सब उससे बिल्कुल निराला है। जिसे हम पालिटिक्स के द्वारा योरोप के क्रम पर स्वत्वरक्षा ‘इंडि-विडुअल राइट’ और ‘प्रिविलेज’ की बुनियाद कहेंगे। यहाँ तक कि इन बातों का ध्यान भी कभी उनको न हुआ। एक मनुष्य या जाति केवल एक तरफ तरक्की कर सकती है जिन बातों को आप अच्छा समझते हैं और जो आपके आइडियल्स हैं उन्हीं से आपके जीवन के सब काम नियमित होंगे। इसलिए इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है कि पारलौकिक बातों के अनुसंधान में लगे हुए हमारे पूर्वजों का चित्त क्षणभर के वास्ते भी राजनैतिक तत्त्वों की ओर न झुका हो। अब इसी के तारतम्य में अंगरेजों की दशा पर ध्यान दीजिए तो यह बात देखी जाती है कि जैसा हमारे यहाँ धर्म और मजहब नस-नस में घुसा है वैसा ही आदि ही से अंगरेजों का बीज विभेदक गुण हम स्वच्छंदता पाते हैं। यही कारण है कि बहुत जल्द उनका इतिहास राजनैतिक स्वच्छंदता की लड़ाइयों के लिए प्रसिद्ध हो गया। जो लड़ाइयाँ किसी शकल में वें बराबर चलाते ही गए जब तक उन्होंने मनमानी राजनैतिक स्वच्छंदता न पा लिया। इसी स्वच्छंदता की इच्छा को यदि हम बीज मान लें तो अंगरेजों का इतिहास समझने में हमको केवल सुगमता ही ने होगी वरन् एक-एक कल-पुरजा इस इतिहास का हमको स्पष्ट हो जायेगा जिस समय से कि इंगलैंड के साक्सन लोग वहशियों की तरह रहते थे उसी समय से इस स्वच्छंदता की इच्छा को हम इस अंग्रेजी जाति में पाते हैं और उसी का परिणाम उनकी राजनैतिक स्वच्छता और उत्कर्ष है।

चाहे धर्म संबंधी आदि एकता से आप और-और तरह का लाभ मानें पर देश की उन्नति और वास्तविक भलाई करने का द्वार हम राजनैतिक एकता ही को मानेंगे। जब तक कोई जाति एक राजनैतिक समूह न होगी जिसका एक ही राजनैतिक उद्देश्य है और जिस जाति के लोग एक ही राजनैतिक खयाल से प्रोत्साहित नहीं हैं तब तक आप उस जाति की संपत्ति और वृद्धि की बुनियाद किस चीज पर कायम रखेंगे? हम देखते हैं अंगरेजों के इतिहास में बहुत जल्द राजनैतिक एक जातित्व आ गया जिसके कारण उनके जाति की उन्नति चरम सीमा को पहुँचने लगी और उसी के विपरीत हम देखते हैं कि राजनैतिक बंधन न होने से बहुत जल्द हमारी जाति तीन तेरह हो गई। मनुष्यों के संबंध में ‘प्रारब्ध’ कुछ है ऐसा आप मानते हैं, अस्तु, जाति के संबंध में तो आपको यह अवश्य मानना पड़ेगा कि अपना इतिहास कोई जाति आप स्वयं बना लेती है। हम ऊपर कह आए हैं कि अंगरेजों में राजनैतिक एकता के कारण उनके देश की वास्तविक उन्नति हुई उसी के विपरीत राजनैतिक एकता न होने से हमारा ह्रास हुआ और आगे चलकर इसका यह परिणाम हुआ कि अंगरेज जाति ने अपना इतिहास अपने अनुकूल कर लिया। वही हमारे जाति का इतिहास झक मार के हमारे प्रतिकूल हो गया और आपस की फूट से बची-खुची जो कुछ ताकत रह भी गई थी उसे विदेशीय विजेताओं ने आकर चूर चूर कर डाला। इसी कारण यह बात यहीं देखी गई कि वह देश जहाँ की संपत्ति इतनी अधिक थी जिसे लूट लूट और और मुल्क वाले बन गए और बनते जाते हैं सदा विदेशीय जेताओं का शिकार बना उनके पंजे में पड़ा रहा और कभी अपनी दशा को सोचा तक नहीं तब उससे निवृत्त होने की सामर्थ्य पाना तो बड़ा दूर रहा। जहाज चलाने की विद्या में तरक्की करना और जहाओं में चढ़कर अपने देश का वाणिज्य दूसरे दूर देश में ले जाना और वहाँ का अपने देश में लाना इत्यादि बातों में उद्यम और प्रागलभ्य (Activity) की दरकार थी इसलिए ये बातें हमारे यहाँ सपने की सी हो गईं।

दूसरे एक कारण यह भी है कि जब पेट भर खाने को होगा तो सब ओर खयालात दौड़ेंगे। इसी कारण अंगरेजों के इतिहास में हम बराबर देखते हैं कि किसी समय अंगरेजों ने किसी का कोई खयाल मँगनी माँग अपनी उन्नति नहीं किया जैसे हम उनसे उन्नति करने वाले खयालत माँगने को ललचा रहे हैं वरन् उनके इतिहास में एक से एक नवीन सोचने वाले हर एक काल में हो गए हैं। हिंदू और अंगरेज इन दो जातीयों का पूरा इतिहास दर्शाना इस लेख में हमारा उद्देश्य नहीं है पर बीज विभेदक गुणों की पुष्टि हम समझते हैं कि हम अच्छी तरह दिखा चुके और यह भी दिखा चुके कि प्रत्येक जाति किस तरह अपने अनुकूल या प्रतिकूल अपना इतिहास बना कर उन्नति अथवा अवनति करती है।

इस सब लेख का सारांश हम यों कह सकते हैं कि यदि भारत का उद्धार अब किसी तरह हो सकता है तो शांति संपादक अकर्मण्यता वाले गुणों से नहीं जिनके लिए हम अब तक प्रसिद्ध थे और जिसने हमको इस दिशाा तक गिरा दिया बरन् अंगरेजी जाति के साथ टक्कर खाने से और उनसे प्रगल्भता (Activity) संपादक उद्यमशीलता वाले गुणों के सीखने से। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठकवृंद इस लेख से जातीयों में अनूठापन क्या है भरपूर समझ गए होंगे, और यह लेख किंचित क्लिष्ट हो जाने के लिए हमारा अपमान न करेंगे।

(जनवरी, 1887 ई.)

भट्ट निबंधमाला, द्वितीय भाग, नागरीप्रचारिणी सभा, काशी

एग्जाम में पूछे जाने वाले प्रश्न:

1. ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध की समीक्षा कीजिए।

2. ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध की मूल संवेदना लिखिए।

FAQ:

Q. बालकृष्ण भट्ट किस युग के लेखक हैं?

Ans. बालकृष्ण भट्ट ‘भारतेंदु युग’ के लेखक हैं।

Q. ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध के लेखक हैं?

Ans. ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध के लेखक ‘बालकृष्ण भट्ट’ हैं।

Q. ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध कब प्रकाशित हुआ था?

Ans. बालकृष्ण भट्ट का निबंध ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध जगवरी, 1887 ई. में प्रकाशित हुआ था।

Q. ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध में बालकृष्ण भट्ट ‘जाति’ शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया है?

Ans. ‘जातियों का अनूठापन’ निबंध में बालकृष्ण भट्ट ‘जाति’ शब्द का प्रयोग ‘नेशनलिटी’ के अर्थ में किया है।

Previous articleDU BA Prog. Hindi 2nd Semester Syllabus
Next articleकरुणा निबंध- आचार्य रामचंद्र शुक्ल