कवि कर्तव्य निबंध- महावीर प्रसाद द्विवेदी | kavi kartavya

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कवि-कर्तव्य से हमारा अभिप्राय हिंदी के कवियों के कर्तव्य से है। समय और समाज की रुचि के अनुसार सब बातों का विचार करके हम यह लिखना चाहते हैं कि कवि का कर्तव्य क्या है। अपने मनोगत विचारों को हम थोड़े ही लिखना चाहते हैं।

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अत: इस लेख को हम चार ही भागों में विभक्त करेंगे अर्थात्‌- छंद, भाषा, अर्थ और विषय। इन्हीं की यथाक्रम हम समीक्षा आरम्भ करते हैं।

छंद

गद्य और पद्य दोनों ही में कविता हो सकती है। यह समझना अज्ञानता की पराकाष्ठा है कि जो छन्दोबद्ध है सभी काव्य है। कविता का लक्षण जहाँ कहीं पाया जाय, चाहे वह गद्य में हो चाहे पद्य में वही काव्य है। लक्षणहीन होने से कोई भी छंदोंबद्ध लेख काव्य नहीं कहलाए जा सकते और लक्षणयुक्त होने से सभी गद्य-बन्ध काव्य-कक्ष में सन्निविष्ट किये जा सकते हैं, गद्य के विषय में कोई विशेष निर्दिष्ट करने की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी पद्य के विषय में है। इसलिए हम यहाँ पर पद्य ही का विचार करेंगे। भाषा, अर्थ और विषय के संबंध में जो कुछ हम कहेंगे वह गद्य के संबंध में भी, प्राय: समानभाव में प्रयुक्त हो सकेगा।

जिन पंक्तियों में वर्णों या मात्राओं की संख्या नियमित होती है, वे छंद कहाती हैं, और छंदों में जो कुछ कहा जाता है, वह पद्य कहलाता है। कोई-कोई छंद और पद्य दोनों को एक ही अर्थ का वाचक मानते हैं।

जो सिद्ध कवि हैं वे चाहे जिस छंद का प्रयोग करें, उनका पद्य अच्छा ही होता है, परन्तु सामान्य कवियों के विषय के अनुकूल छंद योजना करनी चाहिए। जैसे समयविशेष में रागविशेष के गाये जाने से चित्त अधिक चमत्कृत होता है, वैसे ही वर्णन के अनुकूल वृत्त-प्रयोग करने से कविता का आस्वादन करने वालों को अधिक आनन्द मिलता है। गले में डाली हुई मेखला के समान वृत्त-रूपिणी हार-लता को अनुचित स्थान में विनिवेशित करने से कवि की अज्ञानता दर्शित होती है। इस लेख में हम इस बात का विवेचन नहीं करना चाहते कि किस विषय के लिए कौन-सा छंद प्रयोग में लाना चाहिए। काव्य के मर्मज्ञ निपुण कवि स्वयमेव जान सकते हैं कि कौन-सा छंद कहाँ विशेष शोभावर्धक होगा। प्राचीन संस्कृत कवि इसका पूरा-पूरा विचार रखते थे। उन्होंने ऋतुओं का वर्णन प्राय: उपजाति छंद में किया है, नीति का वंशस्थ में किया है, चन्द्रोदयादि का रथोद्वता में किया है, वर्षा और प्रवास का मन्दाक्रान्ता में किया हैं और स्तुति, शौर्य आदि का शार्दूल-विक्रीडि़त और शिखरिणी में किया है। यही नहीं वृत्त-रचना में छंदशास्त्र के नियमों के अतिरिक्त वे लोग और-और विषयों का भी ध्यान रखते थे। दोधक-वृत्त का लक्षण तीन भगण और दो गुरु हैं। इस नियम का प्रतिपालन करते हुए वे तीन ही तीन अक्षर वाले

शब्द-प्रयोग करते थे, जिससे छंद की शोभा विशेष बढ़ जाती थी। तोटक में वे रूखे अक्षर वाले ही शब्द रखते थे; क्योंकि ऐसे अक्षर वाले शब्दों से संगठित हुआ तोटक, ताल की द्रुतगति के समान, मन को सविशेष आनन्द प्रदान करता है। हिंदी के कवियों को भी इन बातों का विचार करना चाहिए।

दोहा, चौपाई, सोरठा, घनाक्षरी, छप्पय और सवैया आदि का प्रयोग हिंदी में बहुत हो चुका। कवियों को चाहिए कि यदि वे लिख सकते हैं, तो इन्हें अतिरिक्त और-और भी छंद भी लिखा करें। हम यह नहीं कहते कि ये छंद नितान्त परित्यक्त ही कर दिए जाएँ। हमारा अभिप्राय यह है कि इनके साथ-साथ संस्कृत-काव्यों में प्रयोग किए गए वृत्तों में से दो-चार उत्तमोत्तम वृत्तों का भी प्रचार हिंदी में किया जाय। इन वृत्तों में द्रुतविलम्बित, वंशस्थ और वसन्‍ततिलका आदि वृत्त ऐसे हैं, जिनका प्रचार हिंदी में होने से हिंदी-काव्य की विशेष शोभा बढ़ेगी। किसी-किसी ने इन वृत्तों का प्रयोग भी आरम्भ कर दिया है। यह सूचना उन्हीं लोगों के लिए है जो सब प्रकार के छंद लिखने में समर्थ है, जो घनाक्षरी और दोहे अथवा चौपाई की सीमा उल्लंघन करने में असमर्थ है, उनके लिए नहीं।

आजकल की बोलचाल की हिंदी की कविता उर्दू के विशेष प्रकार के छंदों में अधिक खुलती है, अतः ऐसी कविता लिखने में तदनुकूल छंद प्रयुक्त होने चाहिए।

कुछ-कुछ कवियों को एक ही प्रकार का छंद सध जाता है, उसे ही वे अच्छा लिख सकते हैं। उनको दूसरे प्रकार का छंद लिखने का प्रयत्न भी नहीं करना चाहिए। यदि कविता सरस और मनोहारिणी है, तो चाहे वह एक ही अथवा बुरे सें बुरे छंद में क्यों न हो उससे आनन्द अवश्य ही मिलता है। तुलसीदास ने चौपाई और बिहारीलाल ने दोहा लिखकर ही इतनी कीर्ति सम्पादन की है। प्राचीन कवियों को भी किसी-किसी वृत्त से समधिक स्नेह था। वे अपने आदृत वृत्त ही को अधिक काम में लाते थे और उनमें उनकी कविता खुलती भी अधिक थी। भारवि का वंशस्थ, र॒त्नाकर की वसन्ततिलका, भवभूति और जगन्नाथराय, की शिखरिणी, कालिदास की मन्दाक्रान्ता और राज़शेखर का शार्दूलविक्रीड़ित इस विषय में प्रमाण हैं।

पादान्त में अनुप्रास-हीन छंद भी हिंदी में लिखे जाने चाहिए। इस प्रकार के छंद जब संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला में विद्यमान हैं, तब कोई कारण नहीं कि हमारी भाषा में वे न लिखे जाएँ। संस्कृत ही हिंदी की माता है। संस्कृत का सारा कविता साहित्य इन तुकबन्दी बखेड़े से बहिर्गत-सा है। अतएव इस विषय में यदि हम संस्कृत का अनुकरण करें, तो सफलता की पूरी-पूरी आशा है। अनुप्रासयुक्त पादान्त सुनते-सुनते हमारे कान उस प्रकार की पंक्तियों के पक्षपाती हो गए हैं। इसलिए अनुप्रास-हीन रचना अच्छी नहीं लगती। बिना तुकवाली कविता के लिखने अथवा सुनने का अभ्यास होते ही वह भी अच्छी लगने लगेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं। अनुप्रास और यमक आदि शब्दाडम्बर कविता के आधार नहीं, जो उनके न होने से कविता निर्जीव हो जाय, या उससे कोई अपरिमेय हानि पहुँचे, कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषत: अच्छे अर्थ और रस-बाहुल्य पर अवलम्बित है। परन्तु अनुप्रासों के ढूँढ़ने। का प्रयास उठाने में समुचित शब्द न मिलने से अर्थांश की हानि हो जाया करती है, इससे कविता की चारुता नष्ट हो जाती है। अनुप्रासों का विचार न करने से कविता लिखने में सुगमता भी होती है और मनोऽभिलषित अर्थ व्यक्त करने में विशेष कठिनाई भी नहीं पड़ती। अतएव पादान्त में अनुप्रास-हीन छंद हिंदी में लिखे जाने की बड़ी आवश्यकता है। संस्कृत में प्रयोग किए गए शिखरिणी, वंशस्थ और वसन्ततिलका आदि वृत्त ऐसे हैं, जिनमें अनुप्रास का न होना काव्य-रसिकों को बहुत ही कम खटकेगा। पहले-पहल इन्हीं वृत्तों का प्रयोग होना चाहिए।

किसी भी प्रचलित परिपाटी का क्रम-भंग होता देख प्राचीनता के पक्षपाती खड़े होते हैं और नई चाल के विषय में नाना प्रकार की कुचेष्टाएँ और दोषोद्भावनाएँ करने लगते हैं, यह स्वाभाविक बात है। परन्तु यदि इस प्रसार की टीकाओं से लोग डरते, तो संसार से नवीनता का लोप हो जाता। हमारा यह मतलब नहीं कि पादान्त में अनुप्रास वाले छंद लिखे ही न जाया करें। हमारा कथन इतना ही है कि इस प्रकार के छंदों के साथ अनुप्रासहीन छंद भी लिखे जाएँ, बस।

भाषा:

कवि को ऐसी भाषा लिखनी चाहिए जिसे सब कोई सहज में समझ ले और अर्थ को हृदयंगम कर सके। पद्य पढ़ते ही उसका अर्थ बुद्धिस्थ हो जाने से विशेष आनन्द प्राप्त होता है, पढ़ने में जी लगता है। परन्तु जिस वाक्य का भावार्थ कठिनता से समझ में आता है, उसके अवलोकन में जी नहीं लगता और बराबर अर्थ का विचार करते-करते उससे विरक्ति हो जाती है। जो कुछ लिखा जाता है, वह इसी अभिप्राय से लिखा जाता है कि लेखक का हृद्गत भाव दूसरे समझ जाएँ। यंदि इस उद्देश्य की ही सफलता न हुई तो लिखना ही व्यर्थ हुआ। अतएव क्लिष्ट की अपेक्षा सरल लिखना ही सब प्रकार से वांछनीय है। कालिदास, भवभूति और तुलसीदास के काव्य सरलता के आकार हैं; परम विद्वान होकर भी उन्होंने सरलता ही को- विशेष मान दिया है, इसलिए उनके काव्यों का इतना आदर है। जो काव्य सर्वसाधारण की समझ के बाहर होता है, वह बहुत कम लोकमान्य होता है। कवियों की इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए।

कविता खिलने में व्याकरण के नियमों की अवहेलना न करनी चाहिए। शुद्ध भाषा का जितना मान होता है अशुद्ध का उतना नहीं होता। व्याकरण का विचार न करना कवि की तद्विषयक अज्ञानता का सूचक है। कोई-कोई कवि व्याकरण के नियमों की ओर दृक्‍पात तक नहीं करते। यह बड़े खेद और लज्जा की बात है। ब्रजभाषा की कविता में कविजन मनमानी निरंकुशता दिखलाते हैं। यह उचित नहीं। जहाँ तक सम्भव हो, शब्दों का मूल रूप न बिगड़ना चाहिए।

मुहाविरे का भी विचार रखना चाहिए। बेमुहाविरा-भाषा अच्छी नहीं लगती। ‘क्रोध क्षमा कीजिए’ इत्यादि वाक्य कान को अतिशय पीड़ा पहुँचाते हैं। मुहाविरा भी भाषा का प्राण है; उसे जिसने नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना। उसकी भाषा कदापि आदरणीय नहीं हो सकती।

विषय के अनुकूल शब्द स्थापना करनी चाहिए। कविता एक अपूर्व रसायन है। उसके रस की सिद्धि के लिए बड़ी सावधानी, बड़ी मनोयोगिता और बड़ी चतुराई आवश्यक होती है। रसायन सिद्ध करने में आँच के न्यूनाधिक होने से जैसे रस बिगड़ जाता है, वैसे ही यथोचित शब्दों का उपयोग न करने से काव्यरूपी रस भी बिगड़ जाता है। किसी-किसी स्थल-विशेष पर रुक्षाक्षर वाले शब्द अच्छे लगते हैं, परन्तु और सर्वत्र ललित और मधुर शब्दों का ही प्रयोग करना उचित है। शब्द चुनने में अक्षर-मैत्री का विशेष विचार रखना चाहिए। अच्छे अर्थ का द्योतक न होकर भी कोई-कोई पद्य केवल अपनी मधुरता ही से पढ़ने वालों के अन्तःकरण को द्रवीभूत कर देता है। ‘टूटत उडु बैठे तरु जाई’ इत्यादि वाक्य लिखना हिंदी की कविता को कलंकित करना है।

शब्दों का यथा-स्थान रखना चाहिए। शब्द-स्थापना ठीक न होने से कविता की दुर्दशा होती है और अर्थांश में जो क्लिष्टता आ जाती है, उसके उदाहरण ‘हिंदी-कालिदास की समालोचना’ में दिए जा चुके हैं।

गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक्‌ न होनी चाहिए। हिंदी ही एक ऐसी भाषा है, जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य-समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए। गद्य का प्रचार हिंदी में थोड़े दिनों से हुआ है। पहले गद्य प्राय: न था, हमारा साहित्य केवल पद्यमय था। गद्य-साहित्य की उत्पत्ति के पहले पद्य में ब्रजभाषा का ही सार्वदेशिक प्रयोग होता था। अब कुछ अन्तर होने लगा है। पद्य की इस समय उन्नति हो रही है। अतएव अब यह सम्भव नहीं कि गद्य की भाषा का प्रभाव पद्य पर न पड़े। जो प्रबल होता है वह निर्बल को अवश्य अपने वशीभूत कर लेता है। यह बात भाषा के संबंध में भी तद्वत्‌ पाई जाती है। पचास वर्ष पहले के कवियों की भाषा इस समय के कवियों की भाषा से मिलाकर देखिए। देखने से तत्काल विदित हो जायगा कि आधुनिक कवियों पर बोल-चाल की हिंदी भाषा ने अपना प्रभाव डालना आरम्भ कर दिया है; उनकी लिखी ब्रजभाषा की कविता में बोल-चाल (खड़ी बोली) के जितने शब्द और मुहाविरे मिलेंगे उतने 50 वर्ष पहले कवियों की कविता में कदापि न मिलेंगे। यह निश्चित है कि किसी समय बोलचाल की हिंदी-भाषा, ब्रजभाषा की कविता के स्थान को अवश्य छीन लेंगी। इसलिए कवियों को चाहिए कि वे क्रम-क्रम से गद्य की भाषा में भी कविता करना आरम्भ करें- बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। जो लोग हिंदी बोलते हैं और हिंदी ही के गद्य-साहित्य की सेवा करते हैं, उनके पद में ब्रज की भाषा का आधिपत्य बहुत दिनों तक नहीं रह सकता।

अर्थ:

सौरस्य ही कविता का प्राण है। जिस पद्य में अर्थ का चमत्कार नहीं वह कविता नहीं। कवि जिस विषय का वर्णन करे उस विषय से उसका तादात्म्य हो जाना चाहिए, ऐसा न होने से अर्थ-सौरस्य नहीं आ सकता। विलाप-वर्णन करने में कवि के मन में यह भावना होनी चाहिए कि वह स्वयं विलाप कर रहा है और वर्णित दुःख का स्वयं अनुभव कर रहा है। प्राकृतिक वर्णन लिखने के समय उसके अन्तःकरण में यह दृढ़ संस्कार होना चाहिए कि वर्ण्यमान नदी, पर्वत अथवा मन के सम्मुख वह स्वयं उपस्थित होकर उनकी शोभा देख रहा है। जब कवि की आत्मा का वर्ण्यविषयों से इस प्रकार निकट संबंध हो जाता है, तभी उसका किया हुआ वर्णन यथार्थ होता है और तभी उसकी कविता पढ़कर पढ़ने वालों के हृदय पर तद्वत्‌ भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। कविता करने में, हमारी समझ में, अलंकारों को बलात्‌ लाने का प्रयत्न न करना चाहिए। विषय-वर्णन के झोंक में जो कुछ मुख से निकले उसे ही रहने देना चाहिए। बलात्‌ किसी अर्थ के लाने की चेष्टा करने की अपेक्षा प्रकृत भाव से जो कुछ आ जाय उसे ही पद्य-बद्ध कर देना अधिक सरल और आह्लादकारक होता है। अपने मनोनीत अर्थ को इस प्रकार व्यक्त करना चाहिए कि पद्य पढ़ते ही पढ़ने वाले उसे तत्क्षण हृदयंगमन कर सकें, क्लिष्ट कल्पना अथवा सोच-विचार करने की आवश्यकता न पड़े।

बहुत-से शब्द ऐसे हैं जो सामान्य रीति से सब एक ही अर्थ के व्यंजक हैं, परन्तु विशेष ध्यानपूर्वक देखने अथवा धातु के अर्थ का विचार करने से पृथक्-पृथक्‌ शब्दों में पृथक्-पृथक् शक्तियों का गर्भित रहना प्रकट होता है। ‘तन्वी’ शब्द का सामान्य अर्थ स्थल विशेष में स्त्री होता है। परन्तु ‘तनु’ शब्द का अर्थ कृश होने के कारण ‘तन्वी’ का विशेष अर्थ दुर्बल है। यदि कहें कि “यह ‘तन्वी’ अपने पति के साथ सुख से अपने घर में रहती है” तो यहाँ ‘तन्वी’ शब्द उस अर्थ का व्यंजक नहीं हो सकता जो अर्थ ‘वामा’ इत्यादि शब्दों का होता है। परन्तु यदि कहें कि “तन्वी अपने प्रियतम का वियोग बड़े धैर्य से सहन कर रही है” तो यहाँ ‘तन्वी’ शब्द की गर्भित शक्ति से वियोग उद्योग अर्थ को सहायता पहुँचती है। अंत: ऐसे स्थल पर इस शब्द का प्रयोग बहुत प्रशस्त है। अर्थ-सौरस्य के लिए, जहाँ तक सम्भव हो, ऐसे ही शक्तिमान शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।

घनाक्षरी और सवैया आदि लिखने वाले कुछ कवियों की कविता में कभी-कभी अनेक निरर्थक शब्द आ जाते हैं। कभी-कभी शब्दों के ऐसे विकृत रूप प्रयुक्त हो जाते हैं कि उनका अर्थ ही समझ में नहीं आता। कभी-कभी पादान्त में समान अक्षर लाने ही के लिए निरर्थक अथवा अपभ्रंश शब्द लाए जाते हैं। ब्रजभाषा की कविता, अथवा घनाक्षरी या सवैया के हम प्रतिकूल नहीं, परन्तु हमारा मत यह है कि अर्थ के सौरस्य ही की ओर कवियों का ध्यान अधिक होना चाहिए, शब्दों के आडम्बर की ओर नहीं। अर्थ-हीन अथवा अनुपयोगी शब्द न लिखे जाने चाहिए और न शब्दों के प्रकृत रूप को बिगाड़ना चाहिए। शब्दों के बिगाड़ने से उनके बिगड़े हुए रूप पढ़ने वालों के कान को खटकते हैं और जिस अर्थ में वे प्रयुक्त होते हैं, उस अर्थ की वे कभी-कभी पोषकता भी नहीं करते।

अश्लीलता और ग्राम्यता-गर्भित अर्थों से कविता को कभी न दूषित करना चाहिए और न देश, काल तथा लोक आदि के विरुद्ध कोई बात कहनी चाहिए। कविता को सरस बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। नीरस पद्यों का कभी आदर नहीं होता। जिसे पढ़ते ही पढ़ने वाले के मुख से ‘वाह’ न निकले, अथवा उसका मस्तक न हिलने लगे, अथवा उसकी दंत-पंक्ति न दिखलाई देने लगे, अन्यथा जिस रस की कविता है, उस रस के अनुकूल वह व्यापार न करने लगे, तो वह कविता, कविता ही नहीं, वह तुकबंदी मात्र है। कविता के सरस होने ही से ये उपर्युक्त बातें हो सकती हैं, अन्यथा नहीं। रस ही कविता का सबसे बड़ा गुण है।

श्रीकण्ठचरित के कर्ता ने ठीक कहा है-

तैस्तैरलंकृतिशतैरवतंसितोऽपि

रूढ़ो महत्यपि पदे धृतसौष्ठवोऽपि।

नूनं विना घनरसप्रसराभिषेक

काव्याधिराजापदमर्हति न प्रबन्ध:।।

अर्थात्‌ सैकड़ों अलंकारों से अलंकृत होकर भी, शब्द-शास्त्र के उच्चासन पर अधिरूढ़ होकर भी और सब प्रकार के सौष्ठव को धारण करके भी, रस-रूपी अभिषेक के बिना कोई भी प्रबन्ध काव्याधिराज पदवी को नहीं पहुँचता।

विषय:

कविता का विषय मनोरंजक और उपदेशजनक होना चाहिए। यमुना के किनारे-किनारे केलि-कौतूहल का अद्भुत-अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबन्ध लिखने की अब कोई आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के ‘गतागत’ के पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथीपर्यन्त पशु; भिक्षुक से लेकर राजापर्यन्त मनुष्य; बिन्दु से लेकर समुद्रपर्यनत जल; अनन्त आकाश; अनन्त पृथ्वी; अनन्त पर्वत- सभी पर कविता हो सकती है सभी से उपदेश सभी के वर्णन से मनोरंजन हो सकता है। फिर क्‍या कारण है कि इन विषयों को छोड़कर कोई-कोई कवि स्त्रियों की चेष्टाओं का वर्णन करना ही कविता की चरम सीमा समझते हैं? केवल अविचार और अन्धपरम्परा ‘मेघनाद-वध’ अथवा ‘यशवन्तराव महाकाव्य’ वे लिख नहीं सकते, तो उनको ईश्वर की निःसीम सृष्टि में से छोटे-छोटे सजीव अथवा निर्जीव पदार्थों को चुनकर उन्हीं पर छोटी-छोटी कविताएँ करनी चाहिए। अभ्यास करते-करते शायद कभी, किसी समय, वे इससे अधिक योग्यता दिखलाने में समर्थ हों और दण्डी कवि के कथनानुसार शायद कभी वाग्देवी उन पर सचमुच ही प्रसन्न हो जाएँ। नायिका के हाव भावादि के वर्णन का अभ्यास करने वालों पर भी सरस्वती की कृपा हो सकती है; परन्तु तदर्थ उसकी उपासना न करना ही अच्छा है।

संस्कृत में सहस्रश: उत्तमोत्तम काव्य विद्यमान है। अंत: उस भाषा में काव्यप्रकाश, ध्वन्यालोक, कुवलयानन्द, रसतरंगिणी आदि साहित्य के अंनेक लक्षण- ग्रन्थों का होना अनुचित नहीं। परन्तु हिंदी भाषा में सतकाव्य का प्राय: अभाव है। इस कारण अलंकार और रस-विवेचन के झगड़ों से जटिल ग्रन्थों के बनने की हम कोई आवश्यकता नहीं देखते। ‘हेला’ हाव का लक्षण और उसका चित्र देखने से क्या लाभ? अथवा दीपकालंकार व उसके सूक्ष्म से भी सूक्ष्म भेदों को जानने का क्या उपयोग? हिंदी में ऐसे कितने काव्य हैं जिनमें ये भेद पाये जाते हैं? हमारी अल्प-बुद्धि के अनुसार रस-कुसुमाकर और जसवन्तजसो भूषण के समान ग्रन्थों की इस समय आवश्यकता नहीं। इनके स्थान में यदि कोई कवि किसी आदर्श-पुरुष के चरित्र का अवलम्बन करके एक अच्छा काव्य लिखता तो उससे हिंदी-साहित्य को अलभ्य लाभ होता। कनिष्ठा और ज्येष्ठा का भेद और उनके चित्र देखे तो क्‍या और न देखे तो क्‍या? और उत्प्रेक्षा अलंकार का लक्षण नामानुसार सिद्ध हो गया तो क्या और न सिद्ध हुआ तो क्या? नायिकाओं के भी झगड़ों में उलझने से हानि के अतिरिक्त लाभ की कोई संभावना नहीं। हिंदी काव्य की हीन दशा को देखकर कवियों को चाहिए कि वे अपनी विद्या, अपनी बुद्धि और अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग इस प्रकार के ग्रन्थ लिखने में न करें। अच्छे काव्य लिखने का उन्हें प्रयत्न करना चाहिए। अलंकार, रस और नायिका-निरूपण बहुत हो चुका।

इस समय कवियों का एक दल कवि-समाजों और कवि-मण्डलों में बद्ध होकर समस्या-पूर्ति करने में व्यग्र हो रहा है। इन पूर्तिकारों में से कुछ को छोड़कर शेष, कविता के नाम की भी बड़ी ही अवहेलना कर रहे हैं। इनको चाहिए कि बिना योग्यता सम्पादन किए समस्‍यापूर्ति करने के झगड़े में न पड़ें। अच्छी समस्यापूर्ति करना असाधारण प्रतिभावान्‌ का काम है। एक साधारण कवि अपने मनोऽनुकूल विषय पर एक ही घड़ी में चाहे 50 पद्य लिख डाले और वे सब चाहे अच्छे भी हों, परन्तु किसी समस्या के टुकड़े पर अच्छी कविता करने में वह शायद ही सफल-मनोरथ होगा। समस्यापूर्ति के लिए असामान्य कौशल और प्रबल प्रतिभा की आवश्यकता है। इस समय प्रतिभा का पूरा-पूरा विकास बहुत कम देखा जाता है, इसलिए समस्याओं की पूर्ति भी प्रायः अच्छी नहीं होती। हमारी यह सम्मति है कि समस्‍या-पूर्ति के विषय को छोड़कर अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार विषयों को चुनकर, कवि को यदि बड़ी न हो सके, तो छोटी ही छोटी स्वतन्त्र कविता करनी चाहिए; क्योंकि इस प्रकार की कविताओं का हिंदी में अभाव है।

संस्कृत और अंग्रेजी काव्यों का अनुवाद हिंदी में करने की ओर भी कवियों की रुचि बढ़ने लगी है; परन्तु स्वतन्त्र कविता की अपेक्षा दूसरे की कविता का अनुवाद अन्य भाषा में करना बड़ा कठिन काम है। एक शीशी में भरे हुए इत्र को जब दूसरी शीशी में डालने लगते हैं तब डालने में ही पहले कठिनता उपस्थित होती है; और यदि बिना दो-चार बूंद इधर-उधर टपके वह शीशी में चला भी गया, तो इस उलट-फेर में उसके सुवास का विशेषांग अवश्य उड़ जाता है। एक भाषा की कविता का दूसरी भाषा में अनुवाद करना मूल कवि का अपमान करना है; क्‍योंकि अनुवाद के द्वारा उनके गुणों का ठीक-ठीक परिचय न होने के कारण पढ़ने वालों, की दृष्टि में वह हीन हो जाता है। इसलिए किसी पुस्तक का अनुवाद आरम्भ करने के पहले अनुवादक को अपनी योग्यता का विचार कर लेना नितान्‍त आवश्यक है। सच है कि जो अच्छा कवि है वही अच्छा अनुवाद करने में समर्थ हो सकता है; दूसरा नहीं। परन्तु अच्छा कवि होना भी दुर्लभ है। महाकवि मखक ने ठीक कहा है-

तान्‍ययरत्नानि न सन्ति येषां सुवर्णसंघेन च ये न पूर्णा:।

ते रीतिमात्रेण दरिद्रकल्पा यान्तीश्वरत्वं हि कथं कवीनाम्‌।।

अर्थात्‌- अर्थ-रत्न और स्वर्ण-समूह से जो परिपूर्ण नहीं है, वे महादरिद्री लोग केवल रीति-मात्रा का अवलम्बन करके कवीश्वर की पदवी कदापि नहीं पा सकते।

काव्य के गुणों और दोषों की विवेचना संस्कृत की जिन पुस्तकों में है, उनमें कवियों के कर्तव्य और अकर्तव्य पर बहुत-कुछ कहा गया है। परन्तु उन सब बातों का विचार हम यहाँ पर नहीं कर सकते। केवल स्थूल-स्थूल बातों ही के विचार की इच्छा से हमने यह लेख आरम्भ किया था। अतएव, अब हम इसे यहीं समाप्त करते हैं।

[2]

संसार में ईश्वर या देवताओं का अवतार कई प्रकार का और कई कामों के लिए होता है। अलौकिक कार्य करने वाले प्रतिभाशाली मनुष्य ही अवतार हैं। स्वाभाविक कवि भी एक प्रकार के अवतार हैं। इस पर कदाचित्‌ कोई प्रश्न करे कि अकेले कवि ही क्यों अवतार माने गए; और लेखक इस पर न बिठाए गए? तो यह कहा जा सकता है कि लेखक का समावेश कवि में है, पर कवियों में कुछ ऐसी विशेष शक्ति होती है, जिसके कारण उनका प्रभाव लोगों पर बहुत पड़ता है। अब मुख्य प्रश्न यह है कि कवि का अवतार होता ही क्‍यों है? पहुँचे हुए पण्डितों का कथन है कि कवि भी ‘धर्मसंस्थापनार्थाय’ उत्पन्न होते हैं। उनका काम केवल तुक मिलाना या ‘पावस-पचासा’ लिखना ही नहीं है। तुलसीदास ने कवि होकर वैष्णव-धर्म की स्थापना की है; मतमतान्तरों का भेद मिटाया है और ‘ज्ञान के पन्थ को क॒पाण की धार’ बताया है। प्रायः उसी प्रकार का काम, दूसरे रूप में सूरदास, कबीर और लल्लूलाल ने किया है। हरिश्चन्द्र ने शूरता, स्वदेश-भक्ति और सत्य प्रेम का धर्म चलाया है। जिन कवियों ने केवल संस्कृत भाषा का ही भण्डार भरा है वे भी, किसी न किसी रूप में, लोगों के उपदेशक थे। हिंदी के जितने कवि प्रसिद्ध हैं, उन्होंने देश, काल, अवस्था और पात्र के अनुसार ही कविता की है। दूसरे देशों और दूसरी भाषाओं के कवियों का नाम लेने की यहाँ आवश्यकता नहीं, क्योंकि हिंदी के पूर्ववर्ती कवियों ने समय-समय पर अपने कर्तव्य को समझा है और उसका पालन भी किया है।

राजा शिवप्रसाद-सदृश इतिहासकारों ने भी अवतार का काम किया है, यद्यपि उनके विचारों को लोग मानते नहीं। सारांश यह कि कवियों को ऐसा करना पड़ता है- वे स्वभाव ही से ऐसा करते हैं- कि संसार का कल्याण हो और इस प्रकार उनका नाम आप ही आप अमर हो जाय। भूषण के समान कवियों ने तो राजनीतिक आन्दोलन तक उपस्थित कर दिया है। ‘पूर्ण’ कवि ने हमें यह उपदेश दिया है कि जो लोग बोलचाल की भाषा से किसी प्रकार अप्रसन्न हैं, वे भी अपनी पुरानी ब्रज (कविता) की बोली को बिना तोड़े-मरोड़े काम में ला सकते हैं, और यदि वे चाहें तो बोल-चाल की भाषा में कविता कर सकते हैं। सारांश यह है कि कविता ही के लिए कविता करना एक तमाशा है। हिंदी में कविता-संबंधी इस प्रकार के लेख पढ़कर बाहर के लोग यह अनुमान कर सकते हैं कि कदाचित्‌ हिंदी के कवि अपना कर्तव्य नहीं जानते, नहीं तो उनके लिए ऐसा लेख न लिखा जाता। यदि कोई मराठी या बँगला के समाचार-पत्र या मासिक-पत्र पढ़े, तो उसे उनमें ऐसे लेख न मिलेंगे। ऐसे लेख उन भाषाओं में कम से कम चालीस वर्ष पहले निकल चुके हैं। और उन लेखों के अनुसार उन भाषाओं की कविता इतने समय में इतनी ऊँची हो गई है, कि समालोचकों के लिए जन्म भर विचार करने की सामग्री तैयार है।

भाषा या साहित्य की जब जैसी अवस्था होती है, तब उसमें उसी प्रकार के लेख निकलते हैं। हम यहाँ पर इस विषय का एक उदाहरण देते हैं। एक बार ‘छत्तीसगढ़-मित्र’ में हिंदी-व्याकरण के विषय में कुछ लेख निकले थे। उस पर एक महाराष्ट्र सज्जन ने बम्बई से (सम्पादक से) पूछा कि क्‍या हिंदी में व्याकरण नहीं है? इस पर सुनने में आया कि सम्पादक ने उनको यह उत्तर दिया कि और-और भाषाओं के समान, हिंदी में कोई व्याकरण है परन्तु इस विषय का निरूपण विदेशियों ने किया है। हिन्दुस्तानी लोग न उसे खोज सके हैं और न खोज हो जाने पर भी उसकी ओर ध्यान देते हैं।

कवि की कल्पना-शक्ति तीव्र होती है। इस कल्पना-शक्ति के द्वारा वह कठिन बातों को ऐसे अनोखे ढंग से सबके सामने रखता है कि वे सहज ही समझ में आ जाती हैं। इसी शक्ति से वह अनजाने हुए पदार्थों का दृश्यों का चित्र इतना मनोहर खींचता है कि पढ़ने या सुनने वाले एकाग्रचित हो जाते हैं और उस बात पर प्रेमपूर्वक विचार करते हैं। फिर कवि अपने अवलोकन और अपनी कल्पना से ऐसी शिक्षा देते हैं कि वह न तो आज्ञा का रूप धारण करती है, और न अपना स्वाभाविक रूखापन ही प्रकट करती है, किन्तु भीतर ही भीतर मन को उकसा देती है। ताजमहल का वर्णन करते समय वह इस बात पर ध्यान न देगा कि यह किस सन्‌ में बना था, इसकी लम्बाई-चौड़ाई कितनी है, या इसका पत्थर कहां से आया है? इमारत को देखकर उसका मन कदाचित्‌ उसके भीतर भी ऊँचा बढ़ जायगा और वह उस समय की कल्पना करने लगेगा जब बादशाह की बेगम मरते समय, रौजे की वसीयत कर रही थी। उसके मन में पुराने और नये समय के मिलान का भी चित्र खिंच जायगा और वह समय के फेर की घटनाओं को सोचने लगेगा।

मनोहर वर्णन और शिक्षा के साथ-साथ कवि अपने शब्द और वाक्य भी ऐसे मनोहर बनाता है कि पढ़ने वाले के आनन्द की सीमा नहीं रहती। कविता लिखते समय जो-जो भाव कवि के हृदय में उदित होते हैं, वही भाव पढ़ने वाले के हृदय में उत्पन्न हो सकते हैं। इसके लिए पढ़ने वाला सहृदय होना चाहिए, नहीं तो भैंस के आगे बीन बजने लगेगी। यदि स्वतः कवि में सहृदयता न हो तो फिर उसका श्रम ही वृथा है। मनोविज्ञानी लोग कदाचित्‌ किसी समय हमको यह बता सकेंगे कि मनोविकार प्रकट करने के लिए छंद ही का उपयोग क्‍यों होता है? गद्य में भी कोई-कोई लेखक- विशेषकर उपन्यास लेखक- ऐसा मनोहर वर्णन करते हैं और ऐसे भाव प्रकट करते हैं कि उनका गद्य पद्य हो जाता है। जो हो, अभी तो कवि लोग ही विशेषकर यह काम करते हैं और उसके लिए छंद काम में लाते हैं।

आजकल हिंदी संक्रान्ति की अवस्था में है। हिंदी कवि का कर्तव्य यह है कि वह लोगों की रुचि का विचार रखकर अपनी कविता ऐसी सहज और मनोहर रचे कि साधारण पढ़े-लिखे लोगों में भी पुरानी कविता के साथ-साथ नई कविता पढ़ने का अनुराग उत्पन्न हो जाय। पढ़ने वालों के मन में नई-नई उपमाओं को, नये-नये शब्दों को और नये-नये विचारों को समझने की योग्यता उत्पन्न करना कवि ही का कर्तव्य है। जब लोगों का झुकाव इस ओर

होने लगे तब, समय-समय पर कल्पित अथवा सत्य आख्यानों के द्वारा सामाजिक, नैतिक और धार्मिक विषयों की मनोहर शिक्षा दे। जब जो विषय उसके अवलोकन में आवे, तब उसी पर अपनी स्वाभाविक शक्ति से कविता लिखकर लोगों को परोक्ष रूप से सचेत करे। कविता के प्रभाव का एक छोटा-सा उदाहरण सुनिए। पद्माकर कवि के घराने के लोगों में विवाह के समय कवित्त पढ़ने की चाल है। उनकी जाति के लोग कहते हैं कि वह चाल पद्माकर के समय से चली है और वह अब तक चली आती है। क्या यह बात आजकल के कवियों में नहीं हों सकती? जान पड़ता है कि “अब के कवि खद्योत सम जहँ-तहँ करहिं प्रकाश”- जिसने यह दोहा लिखा है उसको बड़ी दूर की सूझी है। बोल-चाल की भाषा में आज तक कोई कविता ऐसी नहीं बनी, जिसका प्रचार ‘चन्द्रकान्ता’ के समान साधारण पढ़े-लिखे लोगों में भी हुआ हो। सदोष होने पर भी इस उपन्यास के कारण पुरुषों और स्त्रियों में उपन्यास पढ़ने की रुचि उत्पन्न हुई है। इसी प्रकार जब बोलचाल की भाषा की कविता को, या आजकल के और दूसरे पद्यों को साधारण लोग भी पढ़ने लगें; तब. समझना चाहिए कि कविता और कवि लोकप्रिय हैं। आजकल तो संस्कृत-भरी कविता का रचा जाना और भी अधिक हानिकारक है।

सारांश यह है कि यदि आजकल की कविता में शास्त्रोक्‍त गुणों को छोड़कर नीचे लिखे हुए गुण हों तो सम्भव है कि वह लोकप्रिय होगी-

(1) कविता में साधारण लोगों की अवस्था, विचार और मनोविकारों का वर्णन हो।

(2) उसमें धीरज, साहस, प्रेम और दया और आदि गुणों के उदाहरण रहें।

(3) कल्पना, सूक्ष्म और उपमादिक अलंकार गूढ़ न हों।

(4) भाषा सहज, स्वाभाविक और मनोहर हो।

(5) छंद सीधा, परिचित, सुहावना और वर्णन के अनुकूल हो।

न विदयते पूर्व वासना गुणानुबन्धि प्रतिभयानमद्युतम्‌।

द श्रुतेन यत्नेन च वागुपासिता ध्रवं करोत्येव कमप्युराग्रहम्‌।

-काव्यादर्श

अर्थात्‌- पूर्वासना और अद्भुत प्रतिभा न होने पर भी शास्त्र के अनुशीलन और यत्न के अभिनिवेश द्वारा उपासना कीं गई तो सरस्वती अनुग्रह अवश्य ही करती है।

यह आसना अब ‘भारत-भारती’ और ‘जयद्रथ-वध’ को मिल गया है।

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