जागो फिर एक बार (1) कविता की व्याख्या और समीक्षा | निराला

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जागो फिर एक बार कविता की व्याख्या और समीक्षा

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘जागो फिर एक बार’ (भाग- 1) कविता ‘परिमल’ नामक संग्रह से ली गई है जो गंगा पुस्तक माला लखनऊ से 1929 ई. में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक की हेडिंग के ठीक नीचे लिखा है: ‘सरस कविताओं का संग्रह’।

कविता के पाठ और व्याख्या में चलने से पहले यह रेखांकित करने की ज़रूरत है कि ‘जागो’ का अर्थ क्या है? सवाल यह भी है कि जागो के साथ फिर लगाने की क्यों ज़रूरत पड़ी? पहले कभी जाग चुके थे या कभी जागते थे क्या? यह कैसी नींद है या क्या है? जो हजार बरस से चल रहा है और जगाने की तमाम कोशिशों के बावजूद जारी है?

ध्यान दें कि निराला ने अपनी इस कविता में कहीं भी अँग्रेजों की गुलामी का या भारत देश का नाम नहीं लिया है लेकिन इस कविता की जितनी व्याख्या उपलब्ध है- किताबों से लेकर इंटरनेट तक- सब जगह देशवासियों को भारत की आज़ादी के लिए जगा दिया गया है यानी व्याख्याकारों ने अपना मनचाहा अर्थ कवि के मुँह में ठूँस दिया है।

इस कविता में, निराला के लिए ‘जागो’ का प्रश्न अँग्रेज़ी राज से बढ़कर देसी अंधकार से सम्बद्ध है- जिसके पीड़ित ये व्याख्याकार लोग भी हैं- लेकिन उसके विस्तार में आने से पहले कविता पर आइए-

जागो फिर एक बार कविता की व्याख्या

“जागो फिर एक बार!

प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें

अरुण-पंख तरुण-किरण

खड़ी खोलती है द्वार—

जागो फिर एक बार!

निराला कह रहे हैं कि ओ प्यारे! सब तारे तुम्हें जगा जगाकर थक गए, हार गए। सूर्य की नवोदित किरण तुम्हारे दर पर खड़ी है, तुम्हारा द्वार खोल रही है, जागो, उठो।

“आँखे अलियों-सी

किस मधु की गलियों में फँसी,

बन्द कर पाँखें

पी रही हैं मधु मौन

या सोयी कमल-कोरकों में

बन्द हो रहा गुंजार—

जागो फिर एक बार!

जो सो रहा है, उसकी आँखें भौरों की तरह हैं। आँखों के फँस जाने का मतलब उलझ जाना है। आँख का उलझ जाना दृष्टि का उलझ जाना है। कवि कह रहा है कि किस मधु की गली में क्या चल रहा है चुपचाप? पखना बन्द है। आँखें मधुपान कर रही हैं या सोई हैं कमल के फूल में? बाहर गुंजार बन्द हो रहा है, उठो, जागो।

“अस्ताचल ढले रवि,

शशि-छवि विभावरी में

चित्रित हुई है देख

यामिनी गन्धा जगी,

एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय,

आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी

घेर रहा चन्द्र को चाव से,

शिशिर-भार-व्याकुल कुल

खुले फूल झूके हुए,

आया कलियों में मधुर

मद-उर-यौवन-उभार

जागो फिर एक बार!

सूर्य अस्त हो चुका है। तारों से भरी हुई चाँदनी रात है। रातरानी गमकने लगी है। चकोर अपने प्रिय की एक झलक पाने के लिए एकटक निहार रहा है। उसका मौन बहुत से भावों से भरा हुआ है। प्रिय के दरस की आशा घेरती जा रही है। फूलों का कुनबा शीत के भार से व्याकुल हो रहा है। खिले हुए फूल झुके जा रहे हैं। कलियों में यौवन का मद आ गया है। ऐसे में तुम उठो, जागो।

पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे,

सेज पर विरह-विदग्धा वधू

याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की

मूँद रही पलकें चारु,

नयन-जल ढल गये,

लघुतर कर व्यथा-भार—

जागो फिर एक बार!

सहृदय समीर जैसे

पोछों प्रिय, नयन-नीर

शयन-शिथिल बाँहें

भर स्वप्निल आवेश में,

आतुर उर वसन-मुक्त कर दो,

सब सुप्ति सुखोन्माद हो;

छूट-छूट अलस

फैल जाने दो पीठ पर

कल्पना से कोमल

ऋजु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ।

तन-मन थक जायँ,

मृदु सरभि-सी समीर में

बुद्धि-बुद्धि में हो लीन,

मन में मन, जी जी में,

एक अनुभव बहता रहे

उभय आत्माओं मे,

कब से मैं रही पुकार—

जागो फिर एक बार!

पपीहा पिउ पिउ बुला रहा है। सेज पर विरह में जल रही वधू प्रिय से मिलन की बातें याद करके अपनी पलकें मूँद ले रही है। उसकी व्यथा आँसुओं में छलक पड़ी है। तुम उठो।

दिलदार समीर की तरह तुम वधू के आँसू पोंछ दो। सोने से शिथिल पड़ी उसकी बाँह धरकर तुम उसे अपनी धड़कती गोद में भर लो। उसके ह्रदय की आतुरता का शमन कर दो। सुप्ति को सुख के उन्माद से भर दो। कल्पना की तरह कोमल घुँघराले बालों को पीठ पर इस तरह फैल जाने दो कि सारा आलस्य दूर हो जाए। तन को-मन को थका दो। सुगंधित वायु चल रही है। सूर्य की नवोदित किरण कह रही है कि मैं तुम्हें कब से पुकार रही हूँ। बुद्धि को, मन को, प्राण को तृप्ति-तोष के सूत्र में बाँधने के लिए, सबको भय से मुक्त करने के लिए एक बार फिर जागो।

उगे अरुणाचल में रवि

आयी भारती-रति कवि-कंठ में,

क्षण-क्षण में परिवर्तित

होते रहे प्रकृति-पट,

गया दिन, आयी रात,

गयी रात, खुला दिन,

एक ही संसार के बीते दिन, पक्ष, मास,

वर्ष कितने ही हजार—

जागो फिर एक बार!

भारत की जो भारती है, वह हिंदी है। वह अलसुबह के ललमुँहे सूर्य की तरह कवि-कण्ठ में उतर आयी है। प्रकृति अपना रूप बदलती रही है। लेकिन प्रिय का संसार वही एक ही है, यानी वह नहीं बदला, जबकि उसे समय के साथ बदलना था। दिन, पखवारा, महीना क्या, तुम्हारे उठने की प्रतीक्षा में कितने हजार बरस बीत गए। जागो, एक बार फिर उठो।

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निराला के काव्य में अन्धकार, रामविलास जी के कथनानुसार, नियति की तरह व्याप्त है। वह सुख में भी है, दुख में भी है। यह अन्धकार, अंधकार से उपजा यह त्रास, तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों से टकराहट की बदौलत तो है ही, इसमें औपनिवेशिक गुलामी का पक्ष तो है ही, हमारा कहना है कि इस अंधकार की, इस ‘दिगम्बरी निराशा’ की जड़ें ‘पतनघाती संस्कृति’ के ठाकुरद्वारे तक फैली हुई हैं। निराला इस बात को साफ-साफ कह रहे हैं, बार-बार कह रहे हैं, लेकिन हिंदी आलोचना में इस अंधकार की कोई समझ आज तक नहीं है, अब तक नहीं है।

इसकी वजह क्या है? हिंदी में माना जाता है कि समाज की तमाम समस्या की जड़ अँग्रेज़ी राज है। उसके पहले सांस्कृतिक उत्कर्ष का भक्तिकाल चल रहा था। जबकि उसी समय यहाँ तुर्कों-मुगलों की सत्ता क़ायम हुई, उसी समय यहाँ वैष्णववादी संस्कार-विचार जड़ीभूत हुए यानी जब हीनता, निम्नता और दास्य भाव की चेतना मजबूत हुई, तब हिंदी में बताया जाता है कि सांस्कृतिक जागरण हुआ। यह जो अन्तर्विरोध है, इस अन्तर्विरोध ने हिंदी की आलोचनात्मक चेतना को अभी भी, आज भी जकड़ रखा है। खुद वैष्णववादी और प्रखर हिन्दू-हिंदीवादी निराला, संस्कृत साहित्य के अपने गहन अध्ययन की बदौलत जिस तथ्य को सहज ही देख रहे हैं, उसे ध्यान से समझ लीजिए। निराला के काव्य बोध को समझने के लिए यह ज़रूरी है। दोनों बातें एकसाथ हैं: निराला वैष्णववादी संस्कार से ग्रस्त भी हैं, दूसरी तरफ वही निराला वैष्णववादी अंधकार से लड़ भी रहे हैं। पूरी छवि देखिए तब पूरी बात साफ होगी। ‘परिमल’ की भूमिका में निराला ने लिखा है कि अंधकार की यह स्थिति ‘चित्रप्रियता’ के कारण उत्पन्न हुई। सातवीं आठवीं शताब्दी तक आते-आते भारतीय मनीषा में जिस सांस्कृतिक स्मृतिलोप की दशा पैदा की गई, वह निराला के लिए चित्रप्रियता की स्थिति है। हजारी प्रसाद द्विवेदी इसे ‘जब्दी मनोवृत्ति’ कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि वहाँ वस्तु पक्ष ओझल हो गया और चेतना हर संदर्भ में आत्मगत दायरे में ही पक्ष-विपक्ष करने लगी, यही वैचारिक अंधकार का सबब है। निराला की उक्ति है कि मकड़े ने दूसरों को फाँसने के लिए जो जाल बुना, उसमें वह खुद भी उसी बुरी तरह फँसा हुआ है।

आप पढ़ेंगे तो पाएँगे कि निराला की कविताओं में रात ही रात है। वहाँ स्पर्श है, गंध है, रस है- लेकिन वहाँ रोशनी नहीं है। कवि ने अपने उद्यम से, अपने संघर्ष से, अपने श्रम से जहाँ जहाँ रोशनी पैदा कर दिया है, वहाँ वहाँ कालजयी रचना घटित हो गई है। निराला के काव्य बोध में वैष्णववादी संस्कृति का यह अंधकार, सटीक मात्रा में डाले गए नमक की तरह घुला हुआ है- ‘काल खलता रहा, कला खिलती रही’।

-डॉ. बृजेश कुमार

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