देवरानी जेठानी की कहानी की समीक्षा और सारांश | पं. गौरी दत्त

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देवरानी जेठानी की कहानी की समीक्षा

देवरानी जेठानी की कहानी एक उपन्यास है जिसके लेखक पंडित गौरी दत्त हैं। इस उपन्यास का प्रकाशन 1870 ई. में मेरठ के एक लीथो प्रेस ‘छापाखान-ए-जियाई’ में प्रकाशित हुआ और इसकी 500 प्रतियाँ प्रकाशित की गयी थीं और मूल्य केवल बारह आने था। छोटे अकार के इस उपन्यास में कुल 35 पृष्ठ हैं। इसकी प्रति अभी भी ‘नेशनल लाइब्रेरी’ कलकत्ता में सुरक्षित है।

पंडित गौरी दत्त का जन्म पंजाब के लुधियाना में सन् 1836 में हुआ था एवं निधन 1906 ई. में हुआ था। पंडित गौरी दत्त शुक्ल ने मेरठ में ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना किया था। नागरी लिपि परिषद ने उनके सम्मान में ‘गौरीदत्त नागरी सेवी सम्मान’ की शुरुआत की। दत्तजी देवनागरी लिपि के प्रचारक रहे, इन्होंने साहित्य जगत में उल्लेखनीय कार्य किए एवं 1892 ई. में ‘देवनागरी प्रचारक’ नामक पत्र का संपादन एवं प्रकाशन किया। गौरीदत्त जी का चर्चित उपन्यास ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ एक सामाजिक उपन्यास है।

इस उपन्यास (devrani jethani ki kahani) को सरकार द्वारा प्रोत्साहन भी दिया गया। “संयुक्त प्रान्त के अँगरेज जन शिक्षा निदेशक एन.केमसन की ‘आज्ञा’ से इसका प्रकाशन हुआ और सरकार ने न केवल इसकी दो सौ प्रतियाँ खरीद लीं वरन् लेखक को एक सौ रूपये का पुरस्कार भी दिया।”[1]

हिंदी के प्रथम उपन्यास को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने श्री निवास दास के ‘परीक्षा गुरु’ (1882) को हिंदी का पहला उपन्यास मानते हैं। वहीँ विजय शंकर मल्ल ने श्रद्धाराम फिल्लौरी के भाग्यवती (1877) और गोपाल राय ने पं. गौरीदत्त के ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ (1870) को हिंदी का प्रथम उपन्यास माना है।[2] गोपाल राय ने लिखा है कि देवरानी जेठानी की कहानी’ में यथार्थवादी आग्रह पहली बार दिखाई देता है, जो उपन्यास की पहचान है।

देवरानी जेठानी की कहानी के पात्र

devrani jethani ki kahani upanyas ke nimn patra hai-

  1. सर्वसुख- सर्व सुख उपन्यास का नायक है, जो मेरठ का रहने वाला अग्रवाल बनिया है, जिसकी की मंडी में आड़त की दुकान है। सर्व सुख उपन्यास का मुख्य पात्र है।
  2. पार्वती- सर्वसुख की बड़ी बेटी जो कि दिल्ली में विवाहित हैं।
  3. सुखदेई- यह सर्वसुख की छोटी बेटी है।
  4. दौलतराम- दौलतराम सर्वसुख का बड़ा बेटा है।
  5. छोटेलाल- छोटेलाल सर्वसुख का छोटा बेटा हैं।
  6. ज्ञानो- बड़ी बहू अर्थात जेठानी, जो दौलतराम की पत्नी है। यह लालची स्वभाव की है, जिसके कारण अपने पति दौलतराम और सास को छोटी बहू के खिलाफ भड़काकर घर का बँटवारा करवा देती है।
  7. छोटी बहू अर्थात देवरानी, जो छोटेलाल की पत्नी है। यह ज्ञानो अर्थात अपनी जेठानी की तरह लालची नहीं है।
  8. कन्हैया- दौलतराम का पुत्र
  9. नन्हे- छोटेलाल का बड़ा बेटा
  10. मोहन- छोटेलाल का छोटा बेटा
  11. शिवदयाल- सुखदेई का बेटा
  12. वंशीधर कबाड़ी- इनके यहाँ सुखदेई का विवाह हुआ है
  13. ज्ञानचंद- सुखदेई का भानजा
  14. डूंगर- ज्ञानो का पिता, जो एक गरीब बनिया है
  15. तहसीलदार- आनंदी का पिता
  16. राम प्रसाद- आनंदी का बड़ा भाई
  17. गंगाराम- आनंदी का छोटा भाई
  18. भगवानदेई- आनंदी की छोटी बहन
  19. दिल्ला पाण्डेय- पुरोहित
  20. मिसरानी- दिल्ला पाण्डेय की पत्नी
  21. मुंशी टिकट नारायण- शहरी अमीर
  22. हर सहाय काबली- शहरी अमीर
  23. अन्य पात्र- लालदीन दयाल, किरपी(बाल विधवा), झल्ला मल्ल, लाला बुलाकीदास (मदरसे में नौकर)

‘देवरानी जेठानी की कहानी’ उपन्यास का सारांश

उपन्यास एक अग्रवाल बनिया परिवार को प्रस्तुत करता हुआ आगे बढ़ता है। सर्व सुख बनिया जो कि परिवार का मुखिया है, यह परिवार मेरठ का सुखी संपन्न एवं समृद्ध परिवार है। सर्व सुख के दो बेटे बड़ा बेटा दौलतराम तथा छोटा बेटा छोटेलाल है। इसके माता-पिता की मृत्यु हैजे की वजह से हो गई थी इसलिए इनका पालन-पोषण चाचा ने किया। सर्वसुख पहले गलियों में घूम-घूम कर फेरी लगाते थे लेकिन बाद में परचून की दुकान खोल ली जो चल निकली। सर्वसुख की दो बेटियां बड़ी का नाम पार्वती जो कि दिल्ली विवाहित है, और छोटी बेटी सुखदेई है। बड़े बेटे, दौलत राम की पत्नी ज्ञानी एक अनपढ़ लालची एवं स्वार्थी स्त्री है जो कि मोहल्ले में अपनी देवरानी और सास की आलोचना करती रहती है।

जबकि छोटे बेटे, छोटे लाल की पत्नी आनंदी अत्यंत संस्कारी पढ़ी-लिखी एवं समझदार है। वह घर की चिट्ठी लिखने तथा पढ़ने का कार्य भी करती है। बालविवाह का प्रचलन होने के बावजूद भी छोटेलाल और उसकी पत्नी आनंदी अपने पुत्रों का बालविवाह नहीं करवाया।

उपन्यास परिवार की समस्याओं को प्रदर्शित करते हुए आगे बढ़ता है। दौलत राम को एक बेटी एवं एक बेटा है जबकि छोटेलाल के दो बेटे हैं- नन्हे एवं मोहन। दौलत राम की पत्नी अत्यंत जुझारू एवं लालची प्रवृत्ति की है, वह अपने देवरानी एवं सास के प्रति ईर्ष्या का भाव रखती है। उपन्यास के अंत में परिवार की समस्या के चलते सर्व सुख के परिवार का विखंडन हो जाता है। जहाँ दौलतराम अपनी बहू को लेकर अलग हो जाता है।

उपन्यास के अंत में स्वार्थ की स्थिति को दर्शाया गया है, जहाँ संपत्ति का बंटवारा होता है। दौलत राम के हिस्से में दुकान तथा छोटेलाल के हिस्से में हवेली आती है। परंतु संतुष्टि ना होने पर हवेली का आधा हिस्सा भी दौलत राम ले लेता है। हवेली से जाते समय बड़ी बहू हवेली की दो खिड़कियों के दरवाजे और चौखट भी अपने साथ लेते जाती है। devrani jethani ki kahani ka saransh यही है।

देवरानी जेठानी की कहानी के महत्वपूर्ण कथन

प. गौरीदत्‍त शर्मा ने उपन्यास की भूमिका में एक कविता भी लिखा है-

‘दया उनकी मुझ पर अधिक वित्‍त से

जो मेरी कहानी पढ़ें चित्‍त से।

रही भूल मुझसे जो इसमें कहीं,

बना अपनी पुस्‍तक में लेबें वहीं।

दया से, कृपा से, क्षमा रीति से,

छिपावें बुरों को भले, प्रीति से॥’

सुखदेई की माँ- तुम दौलत राम की सगाई रख लो। आई हुई लक्ष्‍मी घर से कोई नहीं फेरता। और रुपया-पैसा हाथ-पैरों का मैल है। आगे लौंडिया लौंडे का भाग है।

ज्ञानो बड़ी बहू- बहिन जिस पै जैसी आती होगी वैसी करेगी। और यह मेरी देवरानी बड़ी खोट और चुपचोट्टी है। मेरा देवर सत्‍तर चीजें लावे है। दोनों खसम-जोरू खावे हैं। किसी को एक चीज़ नहीं दिखलाते।

छोटी बहू- तुम्‍हारा कैसा स्‍वभाव है बाहर की लुगाइयों के सामने तो बोली-ठाली की बात मत कहा करो। इसमें घर की बदनामी है। (ज्ञानो से )

सास ने कहा मैं क्‍या कहूँ? हमारी वह कहावत है कि अपना मरण जगत की हांसी।

सर्वसुख- बिरादरी के लोग हँसेंगे और ठट्ठे मारेंगे कि फलाने के घर लुगाइयों में लड़ाई हुई थी तो उसने अपने बड़े बेटे को जुदा कर दिया। देखो यह कैसी बहु आई इसने हमारी बात में बट्टा लगाया और घर तीन तेरह कर दिया।

पुरोहित- यह लड़का बड़ा बुद्धिमान और भाग्‍यवाला होगा क्‍योंकि इसके छीदे दाँत हैं, चौड़ा माथा है और हँसमुख है।

ज्ञानो- भगवान उत्‍ते बैरी यहाँ भी चैन नहीं देते!

लाला सर्वसुखजी- मनुष्‍य को चाहिए कि जितनी चादर देखे उतने पॉंव पसारे। मुझे यह बात अच्‍छी नहीं लगती। जैसे और हमारे बनिये हाट-हवेली गिर्वी रखके वा दूकान में से हजार दो हजार रुपये जो बड़ी कठिनाई से पैदा किये हैं, बिवाह में लगाकर बिगड़ जाते हैं।

छोटेलाल- लाला जी अब तुम बैठ के भगवान का भजन करो और इस जगत की माया मोह को छोड़ो।

लाला सर्वसुख- हमारी वह कहावत है- दांत घिसे और खुर घिसे, पीठ बोझ ना ले। ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस दे।

जब कोई बैअर-बानी बाहर की आती, न तो बैठने को पीढ़ा देती और न उसकी बात पूछती। और जो कुछ कहती भी, तो ऐसी बोलती जैसे कोई लड़े है। सास से तो रात दिन खटपट रक्‍खे थी और जब कोई देवरानी को इसके सामने सराहती तो कहती हाँ जी, वह तो अमीर की बेटी है। मैं तो गरीब बनिये की बेटी हूँ। मुँह से कुछ नहीं कहती पर देवरानी को देख-देख फुँकी जाती। और जभी से छोटी ननद से भी जलने लगी। बड़ी ननद पारबती से बड़ा प्‍यार था। (और वह विवाह में बुलाई हुई आयी थी) और प्‍यार होने का कारण यह था कि वह भी लगावा-बझावा थी। उधर की इधर और इधर की उधर।

जब बच्‍चे को दाँत निकलते है तो बड़ा ही दु:ख होता है। जो दूध पीता है डाल देता है। दस्‍त आया करते हैं। शरीर दुर्बल हो जाता है। बच्‍चा रोता बहुत है। दूध नहीं पीता। ये ही हालत नन्‍हें की हुई।

जब सायंकाल को सारे दिन का हारा-थका घर आता, नून-तेल का झीकना ले बैठती। कभी कहती मुझे गहना बना दे, रोती-झींकती, लड़ती-भिड़ती, उसे रोटी न करके देती। कहती कि फलाने की बहु को देख, गहने में लद रही है। उसका मालिक नित नयी चीज़ लावै है। मेरे तो तेरे घर में आके भाग फूट गए। वह कहता, अरी भागवान, जाने भगवान रोटियों की क्‍यों कर गुजारा करे है। तुझे गहने-पाते की सूझ रही है? (दौलतराम और ज्ञानो)।

देवरानी जेठानी की कहानी के महत्वपूर्ण तथ्य

1. उपन्यास में सामाजिक एवं पारिवारिक स्थिति का भलीभांति चित्रण किया गया है।

2. पारिवारिक विघटन एवं घर के बंटवारा का वर्णन।

5. स्त्री शिक्षा का चित्रण।

7. स्त्रियों की आभूषण प्रियता का चित्रण।

3. बाल एवं अनमेल विवाह का चित्रण।

4. विधवाओं की दशा का चित्रण किया गया है। परंतु विधवा विवाह का समर्थन वह दबी जबान से ही करता है।

6. विवाह में फिजूलखर्ची का चित्रण।

8. वृद्ध की समस्या, बहुओं की समस्या।

‘देवरानी जेठानी की कहानी’ उपन्यास की समीक्षा

गोपाल राय ने ‘हिंदी उपन्यास का इतिहास’ में लिखा है कि ‘देवरानी जेठानी की कहानी की रचना उपन्यास के रूप में नहीं, बल्कि बालिकाओं के लिए उपयोगी पाठ्य पुस्तक के रूप में हुई थी।’[3] उनके अनुसार इस उपन्यास का मकसद स्त्री-शिक्षा का विकास और आदर्श स्त्री चरित्र को प्रस्तुत करना था। इसी परम्परा में वामा शिक्षक (1872) और भाग्यवती (1877) पुस्तकें भी लिखीं गई थीं। ‘स्त्री-उद्वार भारतीय नवजागरण का प्रमुख मुद्दा था जिसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति इन कथापुस्तकों में हुई।’[4]

परंतु यह केवल स्त्री शिक्षा की कहानी भर नहीं है, बल्कि इसमें मध्यवर्गीय बनिया समाज का यथार्थ पूर्ण चित्र भी है। बाल-विवाह, विधवा-विवाह, विवाह में फिजूलखर्ची, स्त्रियों की आभूषणप्रियता की वृत्ति, परिवारों में अलग्योझा की समस्या, वृद्धों का बहुओं द्वारा रखा जाना आदि समस्याएं नारी शिक्षा की समस्या के साथ अंकन किया गया है। इस उपन्यास में जो पात्र और स्थान आयें हैं, वे भी वास्तविक व्यक्ति और वास्तविक भौगोलिक स्थिति हैं।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पहली बार परम्परा से हट कर कथा कहने का प्रयास किया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें किसी राजा, सेठ, सामंत की कथा न कहकर साधारण मध्यवर्गीय वैश्य परिवार की देवरानी-जेठानी (सुखदेई और ज्ञानों) की कहानी कही गई है।

गोपाल राय के अनुसार ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ की रचना के पीछे नवजागरण की प्रेरणा और ‘देशोन्नति’ का भाव प्रमुख था। जिसकी वजह से समाज में फैली अनेक कुरीतियों के प्रति लोगों की सोंच में बदलाव आ रहा था, जिसका चित्रण इस उपन्यास में भी हुआ है। बालविवाह, विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा और कुरीतियों को लेकर थोडा-बहुत बदलाव हो रहा था, जिसका अंकन ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में हुआ है। “स्त्री के बेहतर रूप की जो कल्पना की, वह उस समय को देखते हुए बहुत प्रगतिशील थी।”[5]

कथाकार ने जेठानी के चरित्र द्वारा तत्कालीन स्त्रियों में व्याप्त अशिक्षा, अंधविश्वास, कलह, अज्ञान आदि का विश्वसनीय अंकन किया है। इसका चरित्र वास्तविक और विश्वसनीय इसलिए है क्योंकि इसमें उस समय के भारतीय स्त्रियों की झलक दिखती है। इस उपन्यास में चरित्र चित्रण बिम्ब के रूप में न होकर वर्णन के रूप में हुआ है। कहना न होगा कि इस उपन्यास के केंद्र में स्त्री की सामाजिक-पारिवारिक स्थिति है।

देवरानी जेठानी की कहानी का भाषा और शिल्प

उपन्यास की भाषा जनभाषा एवं शैली किस्सागोई है। इसमें मुहावरे लोकोक्ति एवं लोक भाषा का प्रचुर मात्रा में उपयोग मिलता है। “देवरानी जेठानी की कहानी की भाषा का जन-भाषा से सहज जुड़ाव, किस्सागोई का अनूठा संस्कार, लोकभाषा के अर्थ-गर्भित शब्दों का सचेत प्रयोग, बोलचाल या कहें बोली-बानी का टटका रंग और उसमें मुहावरेदानी और लोकोक्तियों का जड़ाव— ये सब विशिष्टताएं उपन्यास के कथा-मिजाज की भाषा का सृजन करती हैं।”[6] जैसे-

‘जब सायंकाल को सारे दिन का हारा-थका घर आता, नून-तेल का झींकना ले बैठती। कभी कहती मुझे गहना बना दे, रोती-झींकती, लड़ती-भिड़ती। उसे रोटी न करके देती। कहती कि फलाने की बहू को देख, गहने में लद रही है। उसका मालिक नित नयी चीज लावै है। मेरे तो इस घर में आके भाग फूट गये।’

लेखक ने भूमिका में लिखा है कि ‘मैंने इस कहानी को नए रंग-ढंग से लिखा है।’ जो कहानी की विषयवस्तु और भाषा दोनों में दिखाई देती है। उपन्यासकार के शब्दों में “इस पुस्तक में स्त्रियों की ही बोलचाल और वही शब्द जहाँ जैसा आशय है लिखें हैं और यह वह बोली है जो इस जिले के बनियों के कुटुंब में स्त्री-पुरुष वा लड़के वाले बोलते चालते हैं।”[7]

अर्थात मेरठ जिले की खड़ी बोली जो वहाँ के मध्यवर्गीय बनिया परिवार में बोली जाती है, का प्रयोग हुआ है। संस्कृत और पुस्तकीय शब्दों से लेखक ने परहेज किया है क्योंकि उसे न कोई चित्त से पढ़ता है और न सुनता है। “यह उपन्यास अपने कथ्य में गहरी सामाजिक संपृक्ति और यथार्थ के खांटी रूप को प्रस्तुत करने में बेजोड़ है ही, भाषा-शैली और शिल्प की दृष्टि से भी अपने समय से बहुत आगे की रचना है।”[8]

‘देवरानी जेठानी की कहानी’ में अंग्रेजी पढ़ने की वकालत की गई है, क्योंकि अंग्रेजी पढ़ने से सरकारी नौकरियाँ मिलती थीं। फिर भी नागरी या हिंदी पढ़ने पर लेखक का अधिक जोर है। हलाँकि यह उपन्यास शिल्प के लिहाज से निराश करता है, औपन्यासिक शिल्प की विशेषताओं का इसमें अभाव है।

निष्कर्ष रूप में उपन्यास अपनी जनभाषा में एक पारिवारिक स्थिति का यथार्थ चित्रण करता है। इस दृष्टि से दत्त जी का यह उपन्यास आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए है।

-संगीता मिर्धा (शोधार्थी)

विक्रम यूनिवर्सिटी, उज्जैन, मप्र

नेट / जे.आर.एफ. 2020

प्रश्नोत्तरी

‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ के लेखक हैं?

‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ के लेखक पं. गौरीदत्त हैं।

‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ उपन्यास कब प्रकाशित हुआ?

पं. गौरीदत्त का उपन्यास ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ 1870 ई. में प्रकाशित हुआ था।

‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ को हिंदी का पहला उपन्यास किसने माना है?

डॉ. गोपाल राय और पुष्पपाल सिंह पं. गौरीदत्त की रचना ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ को हिंदी का पहला उपन्यास मानते हैं।

‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ उपन्यास का पात्र नहीं है?

(A) लाला सर्वसुख
(B) छोटेलाल
(C) ज्ञानो
(D) गंगादेई
Ans: गंगादेई इस उपन्यास की पात्र नहीं है बल्कि सुखदेई है।

“दांत घिसे और खुर घिसे, पीठ बोझ ना ले। ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस दे।”- यह कहावत ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’ के किस पात्र ने कहा है?

(A) पुरोहित
(B) सर्वसुख
(C) बड़ी बहू
(D) दौलतराम
Ans: सर्वसुख


[1] देवरानी जेठानी की कहानी- पं. गौरी दत्त, भूमिका से

[2] हिंदी उपन्यास का विकास- मधुरेश, पृष्ठ- 12

[3] हिंदी उपन्यास का इतिहास- गोपाल राय, पृष्ठ- 21

[4] वही

[5] वही, पृष्ठ- 27

[6] नारी-शिक्षा विषयक ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’- पुष्पपाल सिंह, dainiktribuneonline.com

[7] देवरानी जेठानी की कहानी- पं. गौरी दत्त, भूमिका से

[8] नारी-शिक्षा विषयक ‘देवरानी-जेठानी की कहानी’- पुष्पपाल सिंह, dainiktribuneonline.com

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