UPHESC Hindi Quiz: सिलेबस के निबंधों पर आधारित महत्वपूर्ण MCQs

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UPHESC हिंदी प्रश्नोत्तरी

UPHESC Assistant Professor Hindi परीक्षा की तैयारी में सिलेबस में शामिल निबंधों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निबंध केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे साहित्यिक दृष्टिकोण, शैली और लेखक के चिंतन को भी दर्शाते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए यह 75 MCQs का quiz तैयार किया गया है, जो Hindi literature के महत्वपूर्ण निबंधों पर आधारित है। इसमें दिए गए प्रश्न परीक्षा के पैटर्न के अनुरूप बनाए गए हैं, जिससे आपकी परीक्षा तैयारी अधिक प्रभावी हो सके। यह quiz आपके ज्ञान का आकलन करने, revision करने और महत्वपूर्ण topics को मजबूत करने का एक बेहतरीन माध्यम है।

1. भारतेंदु हरिश्चंद्र कृत ऐतिहासिक निबंध ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ किस पत्रिका में प्रकाशित हुआ?
ब्राह्मण
सदादर्श
हरिश्चंद्र चंद्रिका
यह निबंध मूलतः 1884 ई. में बलिया के ददरी मेले में भाषण हेतु लिखा गया था और उसी वर्ष दिसंबर में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ में प्रकाशित हुआ।
कविवचन सुधा
2. ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ निबंध में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदुस्तानियों को ‘रेल की गाड़ी’ कहकर किस विडंबना की ओर संकेत किया है?
भारतीयों का विदेशी सत्ता के प्रति पूर्ण समर्पण
नेतृत्व के अभाव में सामर्थ्यवान होने पर भी जड़ता की स्थिति
लेखक का तर्क है कि जैसे रेलगाड़ी बिना इंजन के गतिहीन है, वैसे ही भारतीय समाज में प्रतिभा की कमी नहीं है, किंतु उसे उचित नेतृत्व और दिशा देने वाले ‘इंजन’ का अभाव है।
भारतीयों की गतिशीलता और औद्योगिक प्रगति की प्रशंसा
भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव का चरमोत्कर्ष
3. चंद्रधर शर्मा गुलेरी कृत ‘धर्म और समाज’ निबंध का प्रकाशन किस पत्रिका में हुआ था?
नागरी प्रचारिणी पत्रिका
सरस्वती पत्रिका
मर्यादा पत्रिका
प्रतिभा पत्रिका
‘धर्म और समाज’ का प्रकाशन जून, 1920 की ‘प्रतिभा’ पत्रिका में हुआ था।
4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘श्रद्धा और भक्ति’ निबंध के आलोक में ‘प्रेम’ और ‘श्रद्धा’ के मध्य तात्विक अंतर का आधार क्या है?
प्रेम में कोई मध्यस्थ अपेक्षित नहीं होता, किंतु श्रद्धा में मध्यस्थ अनिवार्य है
शुक्ल जी के अनुसार श्रद्धा के लिए ‘श्रद्धालु’, ‘श्रद्धेय’ और उनके मध्य ‘कर्मों का विधान’ रूपी मध्यस्थ आवश्यक है, जबकि प्रेम दो व्यक्तियों के बीच सीधा संवेगात्मक संबंध है।
प्रेम सामाजिक भाव है और श्रद्धा वैयक्तिक आकर्षण
प्रेम में कारण ज्ञात होता है, जबकि श्रद्धा अनिर्दिष्ट होती है
प्रेम विस्तार की अपेक्षा रखता है और श्रद्धा घनत्व की
5. बालमुकुंद गुप्त का निबंध ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ (बनाम लार्ड कर्जन) कब प्रकाशित हुआ?
वर्ष 1905, हिंदी बंगवासी
वर्ष 1902, अभ्युदय
वर्ष 1903, भारत मित्र
लार्ड कर्जन को संबोधित यह ऐतिहासिक चिट्ठा 11 अप्रैल, 1903 ई. को ‘भारत मित्र’ में प्रकाशित हुआ था।
वर्ष 1904, स्वतंत्रता
6. हजारीप्रसाद द्विवेदी कृत ‘नाख़ून क्यों बढ़ते हैं?’ निबंध में नाखूनों का बार-बार बढ़ना किस दार्शनिक सत्य को उद्घाटित करता है?
मनुष्य की रचनात्मक और सृजनात्मक शक्तियों का विकास
मनुष्य के भीतर विद्यमान आदिम पाशवी वृत्ति का अवशेष
द्विवेदी जी नाखूनों को पशुता का प्रतीक मानते हैं और उन्हें काटना मनुष्यता की निशानी बताते हैं, जो ‘स्व’ के बंधन का संकेत है।
मनुष्य की वैज्ञानिक प्रगति और आधुनिकता का बोध
सौंदर्य बोध के प्रति मानव की चिरंतन अभिलाषा
7. विद्यानिवास मिश्र कृत ‘अस्ति की पुकार-हिमालय’ किस निबंध संकलन में संकलित है?
चितवन की छाँह
अग्नि-शिखा
राहुल स्मृति ग्रंथ
वसन्त आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं
इसकी रचना 1968 ई. में हुई और यह उनके ‘वसन्त आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं’ निबंध संग्रह का हिस्सा है।
8. महावीर प्रसाद द्विवेदी कृत ‘कवि कर्तव्य’ निबंध में कविता के ‘अर्थ’ के संदर्भ में किस तत्व को उसका ‘प्राण’ माना गया है?
अश्लीलता और ग्राम्यता से युक्त मनोरंजक वर्णन
केवल शब्दों का आडंबर और तुकांत रचना
सौरस्य और वर्ण्य-विषय के साथ कवि का पूर्ण तादात्म्य
द्विवेदी जी स्पष्ट करते हैं कि बिना अर्थ-सौरस्य और पाठक के हृदय को द्रवित करने वाले रस के, कविता मात्र तुकबंदी है।
अलंकारों का जटिल और चमत्कारिक प्रयोग
9. बालकृष्ण भट्ट के निबंध ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ के आलोक में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
साहित्य जनसमूह के चित्त का चित्रपट है, जो उनके आंतरिक भावों को व्यक्त करता है
इतिहास, साहित्य की तुलना में किसी समाज की मानसिक अवस्थाओं का अधिक सटीक बोध कराता है
भट्ट जी के अनुसार, साहित्य ही वह माध्यम है जो इतिहास से कहीं अधिक सूक्ष्मता से समाज के हृदय और उसके क्रमिक विकास को प्रतिबिंबित करता है।
किसी देश का इतिहास केवल बाहरी हाल बताता है, जबकि साहित्य कौम के आभ्यंतरिक भावों को
वैदिक साहित्य आर्यों की शैशवावस्था का निष्कपट और भोला हृदय-विकास है
10. विद्यानिवास मिश्र के निबंध ‘अस्ति की पुकार-हिमालय’ में राहुल सांकृत्यायन को ‘आस्तिक’ किस संदर्भ में कहा गया है?
क्योंकि वे ईश्वर और कर्मकांडों में अटूट विश्वास रखते थे
क्योंकि वे सदैव धार्मिक यात्राओं पर हिमालय जाया करते थे
क्योंकि वे कर्मफल और पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार करते थे
क्योंकि वे हिमालय को भारतीय जीवन-प्रवाह और संस्कृति का जीवंत ‘अस्ति’ मानते थे
मिश्र जी के अनुसार, राहुल जी का हिमालय के ‘होने’ (अस्ति) और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता में विश्वास उन्हें सच्चा आस्तिक बनाता था।
11. ‘कवि कर्तव्य’ में द्विवेदी जी ने किस भाषा में कविता करने का समर्थन किया है?
ब्रजभाषा
अवधी
बोलचाल की हिंदी
लेखक का तर्क है कि बोलना एक भाषा और कविता दूसरी भाषा में करना प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। यह निश्चित है कि किसी समय बोलचाल की हिंदी-भाषा, ब्रजभाषा की कविता के स्थान को अवश्य छीन लेंगी।
संस्कृत
12. कुबेरनाथ राय के निबंध संग्रह ‘महाकवि की तर्जनी’ की संरचनात्मक व्यवस्था के संदर्भ में कौन-सा तथ्य सत्य है?
यह तीन भागों— वाल्मीकि संदर्भ, रामायण छाया प्रतिछाया संदर्भ और मानस संदर्भ में विभक्त है
‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध संग्रह में कुल 19 निबंध हैं, जिन्हें तीन विशिष्ट संदर्भ खंडों (वाल्मीकि, रामायण छाया प्रतिछाया, और मानस) में विभाजित किया गया है।
इस संग्रह में कुल 21 निबंध संकलित हैं जो केवल रामायण के विभिन्न प्रसंगों पर आधारित हैं
यह संग्रह दो मुख्य भागों—’आर्य संदर्भ’ और ‘अनार्य संदर्भ’ में विभक्त है
इसमें केवल ‘वाल्मीकि संदर्भ’ के अंतर्गत 19 निबंधों का एक ही खंड प्रस्तुत किया गया है
13. ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ में हरिशंकर परसाई ने ‘श्रद्धेय’ बनने को ‘अव्यक्ति’ हो जाना क्यों कहा है?
क्योंकि समाज में श्रद्धेय का स्थान सर्वोपरि माना गया है
क्योंकि श्रद्धेय वह है जो यथास्थिति को स्वीकार कर विरोध की शक्ति खो देता है
परसाई जी के अनुसार चरित्र की पहचान विरोध से है, और श्रद्धेय बनकर व्यक्ति निष्क्रिय और दयनीय होकर रह जाता है।
क्योंकि श्रद्धेय व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली हो जाता है
क्योंकि श्रद्धा प्राप्त करने के बाद व्यक्ति का अहंकार नष्ट हो जाता है
14. ‘अस्ति की पुकार-हिमालय’ में राहुल सांकृत्यायन को क्या कहा गया है?
बौद्ध भिक्षु
यायावर
महान आस्तिक
विद्यानिवास मिश्र के अनुसार हिमालय की ‘अस्ति’ में अटूट विश्वास रखने के कारण वे बहुतों से बड़े आस्तिक थे।
परम नास्तिक
15. सरदार पूर्ण सिंह के निबंध ‘आचरण की सभ्यता’ के अनुसार कौन-सा कथन त्रुटिपूर्ण है?
आचरण की प्राप्ति हेतु केवल वेदों और शास्त्रों का गहन पठन और शब्द-ज्ञान ही पर्याप्त है
लेखक मानते हैं कि सारे वेद-शास्त्र घोलकर पी लेने पर भी आचरण की प्राप्ति नहीं होती; यह केवल जीवन के मौन व्याख्यानों से संभव है।
आचरण की सभ्यतामय भाषा सदैव मौन रहती है और इसका प्रभाव चिरस्थायी होता है
सच्चा आचरण साहित्य के लंबे व्याख्यानों या केवल धर्म चर्चा से नहीं गढ़ा जा सकता
प्राकृतिक सभ्यता के आने पर ही मानसिक सभ्यता का आगमन और स्थिरीकरण संभव है
16. आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के अनुसार ‘श्रद्धा’ कैसा भाव है?
व्यक्तिगत
एकांतिक
स्वार्थपरक
सामाजिक
शुक्ल जी ने श्रद्धा को एक ‘सामाजिक भाव’ और ‘आनंदपूर्ण कृतज्ञता’ माना है।
17. महावीर प्रसाद द्विवेदी के “कवि कर्तव्य” निबंध की स्थापनाओं में कौन-सा कथन सही नहीं है?
कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषतः उसके अर्थ और रस-बाहुल्य पर अवलम्बित है
पादान्त में अनुप्रास या तुकबंदी का न होना कविता को सर्वथा निर्जीव और अर्थहीन बना देता है
द्विवेदी जी अनुप्रास-हीन छंद का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि अनुप्रास कविता का आधार नहीं है।
बोलना एक भाषा में और कविता दूसरी भाषा में करना प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है
कविता का विषय मनोरंजक होने के साथ-साथ उपदेशजनक भी होना चाहिए
18. ‘धोखा’ निबंध में प्रताप नारायण मिश्र ने ईश्वर को ‘धोखे का पुतला’ क्यों कहा है?
क्योंकि निराकार होकर भी वह नाना रूप धारण कर लीला करता है
लेखक का तर्क है कि सृष्टि की उत्पत्ति माया (धोखे) से हुई है, अतः सगुण रूप में ईश्वर भी उसी माया का आश्रय लेता है।
ईश्वर द्वारा भक्तों को छलने और उन्हें दंडित करने के कारण
नास्तिकों द्वारा ईश्वर के अस्तित्व पर किए गए प्रहारों के कारण
संसार में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनैतिकता के कारण
18. ‘नाख़ून क्यों बढ़ते हैं?’ में ‘बंदरिया’ किसका प्रतीक है?
चंचलता का
प्रकृति का
अवांछनीय पुराने मोह का
हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार मरे बच्चे को ढोने वाली बंदरिया जैसा ‘पुराने का मोह’ प्रगति में बाधक है।
ममता का
20. बालमुकुंद गुप्त कृत ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ के ‘बनाम लार्ड कर्जन’ अंश में कौन-सा कथन असत्य है?
दिल्ली-दरबार की प्रदर्शनी भारतवासियों की दृष्टि में ‘बुलबुलों के स्वप्न’ के समान थी
लार्ड कर्जन के शासनकाल के नुमाइशी काम ही भारत की उन्नति के मूल आधार सिद्ध हुए
गुप्त जी ने कर्जन के आडंबरपूर्ण कार्यों को ‘शो’ कहा है और उन्हें कर्तव्य से विमुख बताया है।
लार्ड रिपन की स्मृति भारतीयों के ‘स्मृति-मंदिर’ (हृदय) में आज भी सुरक्षित है
धातु की मूर्तियों से मैदान भर देने की अपेक्षा प्रजा के हित में असली काम करना श्रेष्ठ है
21. ‘धोखा’ निबंध के अनुसार ‘सत्यानाश की जड़’ क्या है?
अशिक्षा
आलस्य
गरीबी
बहुत ज्ञान छाँटना
प्रताप नारायण मिश्र व्यंग्य करते हैं कि बहुत ज्ञान छाँटने से संसार का भ्रम/आनंद नष्ट हो जाता है।
22. बालकृष्ण भट्ट के अनुसार, वैदिक साहित्य और आधुनिक साहित्य के मध्य मुख्य भाषाई संधि-स्थल कौन-सा है?
स्मृतियों और आर्य ग्रंथों की भाषा जिसे वैदिक और लौकिक के बीच का कहा गया
भट्ट जी पाणिनि के सूत्रों के आधार पर लोक और वेद के भाषाई विभाजन और उनके मध्य के क्रमिक विकास को स्पष्ट करते हैं।
प्राकृत और अपभ्रंश की मिश्रित भाषा शैलियाँ
तुलसी और सूर की भक्तिपरक ब्रजभाषा
केवल कालिदास और भवभूति के संस्कृत नाटक
23. चंद्रधर शर्मा गुलेरी के ‘धर्म और समाज’ निबंध के संदर्भ में कौन-सा कथन असत्य है?
‘मतवाद’ या संप्रदाय विशेष ही धर्म का वास्तविक और शास्त्रीय स्वरूप है।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि मतवाद को धर्म समझना विदेशियों से सीखा गया भ्रम है; धर्म का वास्तविक अर्थ कर्तव्य पालन है।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में धर्म का अर्थ ‘स्वभाव’ और ‘कर्तव्य’ के रूप में प्रयुक्त हुआ है
पश्चिम में धर्म को केवल उपासनालयों और वैयक्तिक विश्वास तक सीमित कर दिया गया है
धर्म ही संसार की प्रतिष्ठा का कारण है और प्रत्येक पदार्थ का अपना विशिष्ट धर्म होता है
24. ‘अस्ति की पुकार’ के अनुसार शहरों में क्या बढ़ गया है?
ज्ञान का प्रकाश
नैतिकता
मछली हटूटे का शोर
विद्यानिवास मिश्र के अनुसार शहरों का यांत्रिक कोलाहल ‘अस्ति’ की पुकार सुनने नहीं देता।
सुख-सुविधा
25. ‘कवि कर्तव्य’ निबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘अनुप्रास’ के संदर्भ में कवियों को क्या परामर्श दिया है?
अनुप्रास और यमक के बिना कविता सर्वथा निर्जीव हो जाती है
ब्रजभाषा में अनुप्रास का प्रयोग पूर्णतः वर्जित होना चाहिए
अनुप्रास के मोह में अर्थ की हानि नहीं होनी चाहिए; अनुप्रासहीन छंद भी ग्राह्य हैं
द्विवेदी जी अर्थ की प्रधानता पर बल देते हुए कहते हैं कि केवल तुबंदी के चक्कर में भावों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।
कवियों को कठिन शब्दाडंबर हेतु निरंतर प्रयास करना चाहिए
26. ‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध के आरंभिक संवाद में ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ के दैविक तादात्म्य के संदर्भ में ‘देवी’ (सरस्वती) की क्या भूमिका बताई गई है?
देवी और कवि के मध्य कोई तादात्म्य संभव नहीं है क्योंकि दोनों पृथक सत्ताएं हैं
कवि केवल भाव या अर्थ दे सकता है, उसे ध्वन्यात्मक रूप या शब्द देना देवी का कार्य है
निबंध के अनुसार, कवि (अर्थ रूप) स्वीकार करता है कि उसे ध्वन्यात्मक वाणी या शब्द का संयोजन प्रदान करना देवी के माध्यम से ही संभव है।
देवी केवल अर्थ प्रदान करती हैं, जबकि वाणी का संयोजन मनुज स्वयं करता है
देवी केवल पौराणिक छंदों के निर्माण हेतु शब्द-शक्ति को विनष्ट कर देती हैं
27. ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ निबंध के अनुसार ‘वेद’ के समय साहित्य कैसा था?
कुटिल
राजनीतिक
श्रृंगारिक
भोला और निष्कपट
भट्ट जी के अनुसार वैदिक साहित्य आर्यों की शैशवावस्था का सरल और पवित्र विकास था।
28. भारतेंदु कृत ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ निबंध के ऐतिहासिक मतों में कौन-सा कथन असत्य है?
वैष्णव मत केवल उत्तर भारत के कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही प्रभावी रहा है
भारतेंदु जी ने 36 से अधिक उदाहरण देकर सिद्ध किया है कि पूरा भारतवर्ष और उसकी परंपराएँ वैष्णवता से ओत-प्रोत हैं।
भारतवर्ष का सबसे प्राचीन मत वैष्णव है और यह भारतीय जनजीवन में रचा-बसा है
सूर्य की किरणें जलों और मनुष्यों में व्याप्त होने के कारण उनका नाम ‘नारायण’ पड़ा
यूरोप के विद्वानों का मत है कि लिंगपूजा और रुद्र के भयंकर रूप अनार्यों के देवता थे
29. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता किस तत्व में निहित है?
बिना किसी प्रतिबंध के उच्छृंखल आचरण करने की स्वतंत्रता
‘स्व’ का बंधन अर्थात अपने ऊपर स्वयं के द्वारा लगाया गया अनुशासन
लेखक के अनुसार ‘इंडिपेंडेंस’ अनधीनता है, किंतु ‘स्वाधीनता’ हमारे संस्कारों का फल है जो हमें आत्म-संयम की ओर ले जाती है।
विदेशी शासन के विरुद्ध निरंतर संघर्ष और युद्ध
पश्चिमी देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था का पूर्ण अनुकरण
30. प्रतापनारायण मिश्र के निबंध ‘आप’ की भाषाई विवेचना में कौन-सा कथन असत्य है?
प्रेम-समाज में ‘आप’ शब्द का आदर नहीं है, वहाँ ‘तू’ शब्द ही अधिक प्रिय और अपनत्वपूर्ण है
‘आप्त’ वह पुरुष है जो समस्त विद्या, बुद्धि और सत्यभाषणादि सद्गुणों से संयुक्त हो
‘आप’ शब्द अरबी भाषा के ‘अब्ब’ या अंग्रेजी के ‘एबाट’ का ही अपभ्रंश है
यद्यपि लेखक ने व्यंग्य में इनका ध्वनि-साम्य दिखाया है, किंतु वे स्पष्ट स्थापना देते हैं कि यह संस्कृत के ‘आप्त’ से ही बना है।
‘आप’ शब्द संस्कृत के ‘आप्त’ शब्द का रूपांतर है जो माननीय अर्थ का सूचक है
31. ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ निबंध के अनुसार ‘नारायण’ शब्द का संबंध किससे है?
जलों (नारा:) से
भरतेंदु ने इस निबंध में लिखा है कि सूर्य की किरणें जलों और मनुष्यों में व्याप्त होने के कारण उनका नाम नारायण पड़ा।
आकाश से
पाताल से
वायु से
32. ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ निबंध में भारतेंदु जी ने ‘दरिद्र कुटुंबी’ का उदाहरण किस संदर्भ में दिया है?
विदेशी व्यापार द्वारा भारतीय धन के बहिर्गमन की व्याख्या हेतु
आलस्य के कारण नष्ट हुई प्राचीन भारतीय विद्याओं के संदर्भ में
अपनी मर्यादा को फटे कपड़ों में छिपाने वाली भारत की दीन दशा हेतु
लेखक ने भारत की तुलना उस लज्जावती बहू से की है जो दरिद्रता में भी अपनी कुल-मर्यादा बचाने का विफल प्रयास करती है।
भारतीय किसानों के ऋण और आर्थिक शोषण के चित्रण हेतु
33. ‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध के दूसरे भाग में वर्णित ‘सावित्री मंत्र भूल जाने वाले ब्राह्मण’ को कुबेरनाथ राय ने किसका प्रतीक माना है?
वह प्राचीन वैदिक ऋषियों की विस्मृत परंपरा का प्रतीक है
वह समाज के उस वर्ग का प्रतीक है जो केवल कर्मकांडों में विश्वास रखता है
वह एक ऐसे राजा का प्रतीक है जिसने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार कर लिया है
वह उस आधुनिक साहित्यकार का प्रतीक है जो वर्तमान में रचना करने के ‘मूड’ में नहीं है
लेखक ने उस ब्राह्मण को आधुनिक साहित्यकार के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसका ध्यान मंत्र (साधना) से हटकर क्रौंच मिथुन (बाह्य संवेदना) पर चला जाता है।
34. प्रतापनारायण मिश्र के निबंध ‘धोखा की वैचारिकी में कौन-सा कथन सही नहीं है?
ईश्वर भी सृष्टि की उत्पत्ति हेतु माया का आश्रय लेता है, अतः वह भी ‘धोखे का पुतला’ है
संसार का व्यवहार भ्रम या धोखे के कारण ही सुचारु रूप से चलता है
मनुष्य को ‘ब्रह्मज्ञानी’ बनकर संसार के माया-जाल को तुरंत नष्ट कर देना चाहिए
मिश्र जी के अनुसार, पूर्ण ज्ञानी बनना सत्यानाश की जड़ है; भ्रम में ही संसार का आनंद और कार्यशीलता सुरक्षित है।
लोक और परलोक का आनंद धोखे या भ्रम में पड़े रहने से ही प्राप्त होता है
35. ‘धोखा’ निबंध के अनुसार ‘माया-वपुधारी’ का अर्थ क्या है?
संन्यासी
धोखे का पुतला
सगुण अवतार की दशा में ईश्वर को प्रताप नारायण मिश्र ने ‘धोखे का पुतला’ कहा है।
ज्ञानी पुरुष
मायावी राक्षस
36. ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ के ‘बनाम लार्ड कर्जन’ अंश में लेखक ने लार्ड रिपन की स्मृति को ‘स्मृति-मंदिर’ क्यों कहा है?
क्योंकि उनके शासनकाल में भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ था
क्योंकि उनकी धातु की मूर्तियाँ पूरे भारत के मैदानों में स्थापित थीं
क्योंकि उन्होंने विक्टोरिया मेमोरियल हॉल जैसी विशाल इमारतें बनवाई थीं
क्योंकि उन्होंने अपनी नीतियों से भारतीयों के हृदय में स्थान बनाया था
लेखक धातु की मूर्तियों की अपेक्षा हृदय के प्रेम और लोक-कल्याणकारी नीतियों को चिरस्थायी स्मृति मानते हैं।
37. बालकृष्ण भट्ट के निबंध ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
I. साहित्य को जन-समूह के चित्त का ‘चित्रपट’ कहा गया है।
II. वेदों में बालकों के समान भोलापन और निष्कपट व्यवहार परिलक्षित होता है।
III. रामायण काल भारतीय सभ्यता का ‘नूतन यौवन’ था, जबकि महाभारत काल ‘वार्द्धक्य भाव’ का सूचक है।
विकल्प:
केवल कथन I और II सत्य हैं
केवल कथन I और III सत्य हैं
उपर्युक्त तीनों कथन हैं।
भट्ट जी के अनुसार साहित्य समाज के आभ्यंतरिक भावों का दर्पण है और उन्होंने वैदिक, रामायण तथा महाभारत कालीन साहित्यों के माध्यम से सभ्यता के क्रमिक विकास और ह्रास को स्पष्ट किया है।
केवल कथन II और III सत्य हैं
38. शुक्ल जी के अनुसार ‘श्रद्धा’ में कितने पक्ष होते हैं?
चार
तीन
शुक्ल जी के अनुसार प्रेम में दो पक्ष होते हैं, किंतु श्रद्धा में श्रद्धालु, श्रद्धेय और मध्यस्थ (कर्म) सहित तीन पक्ष होते हैं।
एक
दो
39. आचार्य शुक्ल के अनुसार ‘साधन संपत्ति संबंधिनी श्रद्धा’ किस पर आधारित होती है?
साध्य की पूर्णता और उसके द्वारा हृदय पर पड़े मधुर प्रभाव पर
लोक-कल्याण के उद्देश्यों की प्राप्ति और धर्म के विस्तार पर
व्यक्ति के नैतिक आचरण और चारित्रिक श्रेष्ठता पर
नियम पालन के अभ्यास, श्रम और कार्य की बारीकी पर
शुक्ल जी के अनुसार, ऐसी श्रद्धा साध्य के सौंदर्य पर नहीं, बल्कि उसे साधने हेतु किए गए तकनीकी अभ्यास और परिश्रम पर होती है।
40. ‘विकलांग श्रद्धा का दौड़’ में परसाई जी ने ‘अव्यक्ति’ किसे कहा है?
श्रद्धेय को
परसाई जी ने श्रद्धेय को ‘अव्यक्ति’ कहा है। श्रद्धेय बनने का अर्थ है विरोध की शक्ति खोकर जड़ या निष्क्रिय हो जाना।
नास्तिक को
क्रांतिकारी को
लेखक को
41. ‘आचरण की सभ्यता’ निबंध के आधार पर सरदार पूर्ण सिंह की स्थापनाओं पर विचार कीजिए:
I. आचरण की सभ्यतामय भाषा सदा मौन रहती है और उसका निघण्टु शुद्ध श्वेत पत्रों वाला है।
II. सच्चा आचरण न तो साहित्य के लंबे व्याख्यानों से गढ़ा जा सकता है, न ही केवल धर्मचर्चा से।
III. आचरण का विकास ही जीवन का परमोद्देश्य है।
विकल्प:
केवल कथन II और III सही हैं
केवल कथन I और III सही हैं
कथन I, II और III तीनों ही सही हैं
पूर्ण सिंह के अनुसार प्रभाव शब्द का नहीं, बल्कि सदाचरण का पड़ता है और आचरण का निर्माण प्रकृति व जीवन के ‘मौन व्याख्यानों’ से होता है।
केवल कथन I और II सही हैं
42. ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?’ में वैष्णवता और भारतवर्ष’ ने विकास के लिए क्या अनिवार्य माना है?
राजभक्ति
धर्म की उन्नति
भारतेंदु के अनुसार सबसे पहले धर्म (आचरण/नीति) की उन्नति करनी उचित है क्योंकि वही सब उन्नतियों का मूल है।
केवल राजनीति
विदेशी सहायता
43. ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ निबंध में ‘डायबिटीज’ और ‘टूटी टांग’ के प्रसंग से लेखक ने क्या व्यंग्य किया है?
भारतीय समाज में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव की समस्या पर
लेखकों और साहित्यकारों के शारीरिक रुग्णता के प्रति सहानुभूति पर
समाज की उस रुग्ण मानसिकता पर जो असमर्थता को श्रद्धा का आधार मानती है
परसाई जी व्यंग्य करते हैं कि लोग दयनीयता और बीमारी में श्रद्धा तलाशते हैं, जो एक विकलांग समाज का लक्षण है।
बुढ़ापे में आने वाली शारीरिक असमर्थता और उसके कष्टों पर
44. हजारीप्रसाद द्विवेदी कृत ‘नाख़ून क्यों बढ़ते हैं?’ निबंध के आलोक में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
I. नाखूनों का बढ़ना ‘पशुत्व’ का प्रमाण है और उन्हें काटना ‘मनुष्यता’ की निशानी है।
II. अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है।
III. ‘स्वाधीनता’ शब्द में ‘स्व’ का बंधन हमारी संस्कृति की विशेष पहचान है।
विकल्प:
केवल कथन I और II सही हैं
कथन I, II और III सही हैं
द्विवेदी जी ने नाखूनों के माध्यम से पाशवी वृत्ति और आत्म-बंधन (संयम) के मध्य के चिरंतन द्वंद्व को प्रस्तुत किया है।
केवल कथन III सही है
कथन I और III सही हैं
45. ‘कवि कर्तव्य’ निबंध के अनुसार ‘अनुप्रास’ के पीछे पड़ने से किसकी हानि होती है?
अर्थांश की
द्विवेदी जी का मत है कि अनुप्रास ढूँढने के प्रयास में कविता की चारुता और अर्थ नष्ट हो जाता है।
छंद की
शब्द की
कवि की कीर्ति की
46. ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ निबंध में हरिशंकर परसाई के व्यंग्य के विषय में सत्य कथनों का चुनाव कीजिए:
I. श्रद्धेय बनने का तात्पर्य व्यक्ति के चरित्र का सक्रिय हो जाना है।
II. समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और नेतृत्व के गिरते स्तर के कारण श्रद्धा ‘पुराने अखबार की तरह रद्दी’ में बिक रही है।
III. वर्तमान समय चरण छूने का नहीं, बल्कि ‘लात मारने’ (विरोध करने) का मौसम है।
विकल्प:
केवल कथन I और III सही हैं
केवल कथन II सही है
उपरोक्त तीनों कथन सही हैं
केवल कथन II और III सही हैं
परसाई जी ने श्रद्धा के नाम पर व्याप्त पाखंड और निष्क्रियता पर प्रहार करते हुए चरित्र की पहचान ‘विरोध’ से सिद्ध की है। उनका स्पष्ट मत है कि, श्रद्धेय बनने का तात्पर्य व्यक्ति के चरित्र का निष्क्रिय (अव्यक्ति) हो जाना है।
47. ‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध के वैचारिक विन्यास में ‘ब्राह्मण’ और ‘निषाद’ क्रमशः किन दो तत्वों के सतीर्थ (सहचर) रूप में उपस्थित होते हैं?
ब्राह्मण धर्म का प्रतीक है और निषाद अधर्म का
ब्राह्मण केवल भक्ति का बोधक है और निषाद केवल शक्ति का
ब्राह्मण काव्य का प्रतीक है और निषाद इतिहास का
निबंध के तीसरे भाग में ब्राह्मण रूपी काव्य और निषाद रूपी इतिहास के मध्य संवाद होता है, जहाँ दोनों को एक-दूसरे का सहचर (सतीर्थ) माना गया है।
ब्राह्मण आदिम चेतना का प्रतीक है और निषाद आधुनिक विज्ञान का
48. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘जागरण’ किसे कहा है?
श्रद्धा को
शुक्ल जी का प्रसिद्ध सूत्र है— ‘यदि प्रेम स्वप्न है तो श्रद्धा जागरण है’।
प्रेम को
भक्ति को
ज्ञान को
49. ‘नाख़ून क्यों बढ़ते हैं?’ निबंध के अंत में लेखक ने ‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ में क्या अंतर स्पष्ट किया है?
सफलता और चरितार्थता दोनों का अर्थ भौतिक उन्नति प्राप्त करना है
सफलता अस्त्रों के संचयन में है, जबकि चरितार्थता उनके विनाश में
सफलता बाह्य उपकरणों के बाहुल्य में है, जबकि चरितार्थता प्रेम और मैत्री में
द्विवेदी जी के अनुसार मनुष्य अस्त्र बढ़ाकर सफल तो हो सकता है, किंतु उसकी वास्तविक चरितार्थता त्याग और लोक-मंगल में है।
सफलता व्यक्ति की निजी उपलब्धि है और चरितार्थता समाज का लाभ
50. ‘अस्ति की पुकार-हिमालय’ में ‘अस्ति’ किसका मूर्तीकरण है?
मानवीय सिसृक्षा का
विद्यानिवास मिश्र हिमालय को भारत की सृजनात्मक शक्ति या ‘सिसृक्षा’ का जीवंत रूप मानते हैं।
हिमालय के भूगोल का
भारत के इतिहास का
सैन्य शक्ति का
51. ‘धोखा’ निबंध के अनुसार, ‘सत्यानाश की जड़’ किसे कहा गया है?
ईश्वर और धर्म पर संदेह करने वाली नास्तिकता को
समाज में फैलने वाले अनैतिक छल-प्रपंच और भ्रष्टाचार को
अत्यधिक ज्ञान छाँटने और भ्रम के पर्दे को पूर्णतः हटाने की चेष्टा को
मिश्र जी मानते हैं कि लोक और परलोक का आनंद भ्रम में ही है; पूर्ण ज्ञानी बनकर व्यक्ति संसार के लिए अनुपयोगी हो जाता है।
अज्ञानता और अशिक्षा में डूबे रहने वाले समाज को
52. हरिशंकर परसाई को अपनी श्रद्धा पर संदेह क्यों है?
उनकी विद्वत्ता के कारण
टूटी टांग के कारण
लेखक व्यंग्य करते हैं कि लोग उनकी असमर्थता और बीमारी (टूटी टांग) के कारण उन्हें श्रद्धेय बना रहे हैं।
उनके व्यंग्य के कारण
समाज सेवा के कारण
53. ‘आप’ निबंध में महाराष्ट्रीय भाषा के ‘आपा जी’ और अंग्रेजी के ‘एबाट’ के संदर्भ में लेखक ने क्या स्थापना की है?
ये शब्द विदेशी संस्कृतियों के थोपे गए नाममात्र के सर्वनाम हैं
ये सभी श्रेष्ठता के द्योतक शब्द मूलतः ‘आप्त’ या ‘आप’ से ही निसृत हैं
लेखक ने तुलनात्मक भाषाविज्ञान का पुट देते हुए ‘आप’ की व्याप्ति को वैश्विक सिद्ध करने का प्रयास किया है।
ये सभी शब्द भाषाई रूप से एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं
ये शब्द केवल संयोगवश एक जैसा ध्वनि-साम्य रखते हैं
54. ‘धर्म और समाज’ निबंध के अनुसार धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है?
स्वभाव और कर्तव्य
गुलेरी जी धर्म को ‘रिलीजन’ से इतर वस्तु का ‘स्वभाव’ और मनुष्य का ‘कर्तव्य’ मानते हैं।
उपासना पद्धति
मतमतांतर
परलोक चिंता
55. ‘कवि कर्तव्य’ निबंध में द्विवेदी जी ने ‘गद्य और पद्य की भाषा’ के संबंध में क्या निर्देश दिया है?
गद्य में मुहावरों का प्रयोग सर्वथा वर्जित होना चाहिए
दोनों की भाषा पृथक न होकर सभ्य समाज की बोलचाल की हिंदी होनी चाहिए
लेखक का तर्क है कि बोलना एक भाषा और कविता दूसरी भाषा में करना प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है।
पद्य की भाषा ब्रज और गद्य की भाषा खड़ी बोली होनी चाहिए
पद्य में सदैव अत्यंत क्लिष्ट और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली अनिवार्य है
56. ‘कवि कर्तव्य’ निबंध में कविता का ‘प्राण’ किसे माना गया है?
छंद-बद्धता को
अर्थ-सौरस्य को
महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुसार जिस पद्य में अर्थ का चमत्कार नहीं, वह कविता नहीं है।
अलंकारों को
व्याकरण शुद्धि को
57. ‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध में काव्य रूपी ब्राह्मण की ‘तर्जनी’ इतिहास रूपी निषाद की ओर कब और क्यों उन्मुख होती है?
जब इतिहास काव्य के सौंदर्य पक्ष की उपेक्षा कर केवल यथार्थ का वर्णन करता है
जब इतिहास केवल प्राचीन राजाओं की वंशावली को महिमामंडित करने का प्रयास करता है
जब इतिहास विवेक-भ्रष्ट होकर राज्य-लिप्सा और अर्थ-लोभ के कारण मुंडपात करता है
कुबेरनाथ राय के अनुसार, जब इतिहास (सत्ता/राज्य) क्रूर और विवेकहीन हो जाता है, तब काव्य की ‘तर्जनी’ (क्रोध श्लोक) उसके विरोध में उठ खड़ी होती है।
जब इतिहास अपनी सीमाओं को लांघकर काव्य के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगता है
58. ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ में ‘आदि देव’ किसे माना गया है?
सूर्य को
भारतेंदु जी के अनुसार आर्यों ने आदिकाल में सूर्य को ही अपना उपकारी और प्राणदाता (नारायण) माना।
अग्नि को
वायु को
इंद्र को
59. ‘अस्ति की पुकार’ निबंध में ‘शिव की बारात’ के प्रसंग से लेखक ने किस वर्ग की संस्कृति को ‘सुहाग’ का रक्षक माना है?
अहम्मन्य अभिजात वर्ग जो अपनी संपत्ति पर गर्व करता है
उच्च शिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग जो निरंतर शोध में लीन रहता है
वह अकिंचन और अज्ञानी वर्ग जहाँ देश का अस्ति सुरक्षित है
मिश्र जी के अनुसार सच्ची भारतीयता और ऊर्जा उन अभावग्रस्त लोगों में है जो पुराने स्रोतों को नवजीवन दे रहे हैं।
हैसियतदारी में डूबा हुआ पैमाल मध्यम वर्ग
60. ‘धोखा’ निबंध के अनुसार संसार का ‘चर्खा’ कैसे चलता है?
धोखे के कारण
प्रताप नारायण मिश्र के अनुसार भ्रम या धोखा ही वह शक्ति है जो संसार के व्यवहार को गतिमान रखती है।
सत्य के द्वारा
विज्ञान के द्वारा
श्रम के द्वारा
61. ‘आचरण की सभ्यता’ निबंध के अंत में लेखक ने ‘स्वदेश’ किसे कहा है?
वह भौगोलिक भूमि जहाँ व्यक्ति का जन्म हुआ हो
वह देश जहाँ शारीरिक और आध्यात्मिक युद्ध चरम पर हों
वह सुनहरा देश जहाँ आचरण की सभ्यता का अखंड राज्य हो
पूर्ण सिंह के अनुसार जहाँ प्रेम, एकता और सभ्याचरण की दिव्य ध्वनियाँ (बाँसुरी, वीणा) हों, वही मनुष्य का असली घर है।
वह स्थान जहाँ वेदों और कुरान का निरंतर पाठ होता हो
62. ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ निबंध के अनुसार, ‘आदि देव’ सूर्य का ‘नारायण’ नाम क्यों पड़ा?
क्योंकि उनकी पूजा केवल ‘नर’ (मनुष्य) ही करते थे
क्योंकि उनकी किरणें जलों (नारा:) और मनुष्यों में व्याप्त रहती हैं
भारतेंदु जी ने ‘आपो नारा इति प्रोक्ता’ श्रुति के माध्यम से सूर्य की सर्वव्यापकता को नारायणत्व से जोड़ा है।
क्योंकि वे केवल नारद और अन्य देवताओं के गुरु थे
क्योंकि वे आकाश में निरंतर भ्रमण करने वाले नक्षत्र थे
63. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने श्रद्धा और प्रेम के योग को क्या नाम दिया है?
भक्ति
शुक्ल जी के अनुसार— ‘श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है’।
योग
समर्पण
वात्सल्य
64. बालकृष्ण भट्ट के निबंध ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ के संदर्भ में ‘वेद’ के साहित्य को ‘शैशवावस्था का साहित्य’ क्यों कहा गया है?
क्योंकि उस समय के कवियों में परिपक्व बुद्धि का सर्वथा अभाव था
क्योंकि वेदों की भाषा अत्यंत क्लिष्ट और आधुनिक संस्कृत के समान है
क्योंकि उसमें बालकों के समान भोलापन, उदार भाव और निष्कपट व्यवहार है
लेखक के अनुसार प्राचीन आर्यों का साहित्य (वेद) उनकी सरलता और प्रकृति के प्रति सहज आकर्षण का प्रतिबिंब है।
क्योंकि उस काल में केवल बाल-सुलभ क्रीड़ाओं का ही चित्रण किया गया था
65. ‘आचरण की सभ्यता’ निबंध किस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था?
सरस्वती
अध्यापक पूर्ण सिंह का यह प्रसिद्ध निबंध ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।
हरिश्चंद्र चंद्रिका
हिंदी प्रदीप
भारत मित्र
66. चंद्रधर शर्मा गुलेरी के निबंध ‘धर्म और समाज’ के अनुसार, ‘धर्म’ का वास्तविक अर्थ जो प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, वह क्या है?
धर्म का अर्थ ‘स्वभाव’ और ‘कर्तव्य’ है, जो समाज की प्रतिष्ठा का कारण है
गुलेरी जी के अनुसार प्रत्येक पदार्थ का स्वभाव ही उसका धर्म है, जैसे मनुष्य का धर्म ‘मनुष्यता’ है।
धर्म का अर्थ किसी विशेष मत, संप्रदाय या रिलीजन में विश्वास करना है
धर्म केवल मंदिरों में की जाने वाली उपासना की पद्धति है
धर्म का अर्थ केवल परलोक सुधारने के लिए किए गए कर्मकांड हैं
67. विद्यानिवास मिश्र के निबंध ‘अस्ति की पुकार-हिमालय’ में हिमालय को किस रूप में प्रस्तुत किया गया है?
पर्यटन और मनोरंजन का एक केंद्र
सिसृक्षा का मूर्तीकरण और जीवंत अस्ति
लेखक के अनुसार हिमालय न भूगोल है न इतिहास, वह शुद्ध ‘अस्ति’ है जो हमारी वर्चस्विनी शक्ति का स्रोत है।
उत्तरी प्रहरी और एक भौगोलिक नक्शा
प्राचीन इतिहास का एक मृत खंड या अवशेष
68. ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ (बनाम लार्ड कर्जन) में ‘बुलबुलों के स्वप्न’ रूपक का प्रयोग किस कूटनीतिक यथार्थ को प्रकट करने हेतु किया गया है?
लार्ड कर्जन द्वारा भारतीय जनता के आर्थिक उत्थान हेतु किए गए प्रयासों हेतु
ब्रिटिश साम्राज्य की शाश्वतता और उसकी सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था हेतु
शासक की आत्ममुग्धता और प्रदर्शनप्रिय कार्यों की क्षणभंगुरता हेतु
बालमुकुंद गुप्त ने दिल्ली-दरबार जैसी नुमाइशी चीजों को ‘शो’ और क्षणभंगुर स्वप्न बताया है, जो प्रजा के वास्तविक कष्टों को दूर करने में असमर्थ थे।
भारतीय क्रांतिकारियों की स्वाधीनता प्राप्ति की अलौकिक कल्पना हेतु
69. ‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध का मूल उद्देश्य है?
केवल प्राचीन रामायण की कथा का आधुनिक गद्य में रूपांतरण करना
आधुनिक साहित्यकारों को केवल शब्द और अर्थ के जटिल व्याकरण से अवगत कराना
विघटित पौराणिक मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठित करना और नई साहित्यिक सृष्टि रचना
‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध के माध्यम से लेखक आधुनिक साहित्यकारों को सचेत करते हुए पुराने मूल्यों के आधार पर नवीन सृजन हेतु उत्सुक दिखाई देते हैं।
भारतीय राजनीति के गिरते हुए स्तर पर केवल एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी करना
70. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘श्रद्धा और भक्ति’ के संदर्भ में कौन-सा कथन असत्य है?
श्रद्धा एक सामाजिक भाव है, जबकि प्रेम एक एकांतिक और वैयक्तिक भाव है
यदि प्रेम स्वप्न है तो श्रद्धा जागरण है, क्योंकि यह संसार का कुछ अंश सामने रखकर की जाती है
प्रेम में केवल दो पक्ष होते हैं, जबकि श्रद्धा में तीन पक्ष होते हैं
श्रद्धालु व्यक्ति अपने श्रद्धाभाजन पर अनन्य अधिकार चाहता है, जैसा प्रेमी चाहता है
शुक्ल जी के अनुसार, श्रद्धालु अपनी श्रद्धा को संसार के साथ साझा करना चाहता है, जबकि प्रेमी अपने प्रिय पर एकाधिकार चाहता है।
71. हरिशंकर परसाई के निबंध ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के व्यंग्य के संदर्भ में कौन-सा कथन असत्य है?
श्रद्धेय बनने का अर्थ है ‘अव्यक्ति’ होकर विरोध की शक्ति खो देना
वर्तमान समय में श्रद्धा रद्दी के पुराने अखबारों की तरह मूल्यहीन हो चुकी है
चरित्र की पहचान इससे होती है कि व्यक्ति किन अनैतिक चीजों का विरोध करता है
श्रद्धा और विश्वास का वर्तमान दौर भारतीय इतिहास का सर्वश्रेष्ठ काल है
परसाई जी कहते हैं कि वर्तमान में कानून, अदालत और नेतृत्व से विश्वास उठ चुका है और श्रद्धा की टांग टूट गई है।
72. ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ निबंध में ‘अश्वत्थामा हतः’ का उदाहरण किस संदर्भ में है?
प्रवंचना
इस निबंध में ‘अश्वत्थामा हतः’ का उदाहरण प्रवंचना (धोखा) के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। भट्ट जी ने इसे महाभारत काल की नैतिकता के ह्रास और कूटनीति का प्रमाण माना है।
सत्यनिष्ठा
वीरता
धर्म-रक्षा
73. बालकृष्ण भट्ट के अनुसार साहित्य किसका ‘चित्रपट’ है?
राजनीति का
जनसमूह के चित्त का
भट्ट जी साहित्य को जनसमूह के हृदय का विकास और उनके आंतरिक भावों का प्रतिबिंब मानते हैं।
व्यक्तिगत सुख का
प्राकृतिक सौंदर्य का
74. ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ में ‘का चुप साधि रहा बलवाना’ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
भारतीयों को अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करने की चेतावनी देना
हनुमान जी की महिमा का बखान कर धार्मिक प्रचार करना
भारतीयों को उनके विस्मृत सामर्थ्य और बल का स्मरण कराना
लेखक का मानना है कि भारतीयों को केवल उनके बल की याद दिलाने वाले की आवश्यकता है, सामर्थ्य तो उनमें असीम है।
विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध मौन धारण करने की नीति
75. ‘महाकवि की तर्जनी’ निबंध के अंत में ‘मरा हुआ पक्षी’ किस नवीन साहित्यिक चेतना के रूप में पुनर्जीवित होता है?
वह पक्षी केवल एक मृत अवशेष के रूप में इतिहास का हिस्सा बन जाता है
वह पक्षी प्रकृति के विनाश और मानवीय क्रूरता के स्थायी मौन का प्रतीक बनता है
वह पक्षी केवल पौराणिक कथाओं के पुनर्कथन हेतु एक माध्यम मात्र बनकर रह जाता है
वह शब्द, भाव और चिरकाल व्यापी छंद बनकर मनुष्य की गरिमा का रथ बनता है
निबंध का निष्कर्ष है कि निषाद (क्रूर इतिहास) द्वारा मारा गया पक्षी, काव्य का वाहन बनकर लौटता है और अनंत काल तक सृजन की रचना करता रहता है।

निबंधों पर आधारित यह MCQ quiz UPHESC Assistant Professor Hindi अभ्यर्थियों के लिए एक उपयोगी अभ्यास सामग्री है। इस quiz को हल करके आप अपने तैयारी स्तर को परख सकते हैं और कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं। नियमित अभ्यास से आपकी समझ और आत्मविश्वास दोनों में वृद्धि होगी। इसलिए इस quiz को अवश्य attempt करें और अपनी परीक्षा तैयारी को और अधिक मजबूत बनाएं।

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